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RECHAN

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रेचन

"तत्र दोषहरणम् अधोभागं विरेचन संज्ञकम्" । ( च ० क ० अ ०1 )

•शरीर के अधोमार्ग से दोषों ( दोषों एवं मलों ) का हरण ( निष्कासन ) करना विरेचन कर्म कहलाता है।
पर्याय – रेचन , विरेचन , अधोभागहर , अनुलोमनीय ।

विरेचन द्रव्यों के गुण – आचार्य चरक ने कल्पस्थान के अध्याय -1 में विरेचन द्रव्यों के निम्नलिखित गुण बताए है

रस – सर्वरस वीर्य – उष्ण गुण – तीक्ष्ण , सूक्ष्म , व्यवायी , विकासी ।

भौतिक संघटन – सुश्रुत ने रेचन द्रव्यों में पृथ्वी और जल महाभूत का प्राधान्य कहा है ।

  1. छेदन कर्म (Expectorant)
" श्लिष्टान् कफादिकान् दोषानुन्मूलयति यद् बलात् । छेदनं तद्यथा क्षारा मरिचानि शिलाजतु"।।
( शा ० सं ० पू ० अ ०4 / 10 )

•जो द्रव्य शरीर के स्त्रोतों में श्लिष्ट ( चिपके हुए ) कफादि दोषों को अपने प्रभाव के कारण शरीर से बाहर निकालता है उसे छेदन कहते हैं , जैसे – क्षार , मरिच , शिलाजतु , हींग आदि ।

पर्याय – श्लेष्महर एवं कफ निस्सारक ।

• छेदन द्रव्यों के गुण – गंगाधर सेन के अनुसार
छेदन द्रव्य प्राय : अम्ल , लवण और कटु रस तथा तीक्ष्ण गुण से युक्त होते हैं ।

• छेदन द्रव्यों के आमयिक प्रयोग – जीर्ण प्रतिश्याय , कफज कास , श्वसन संस्थानगत कफज व्याधियों में।

  1. लेखन
"धातून् मलान् वा देहस्य विशोष्योल्लेखयेच्च यत् । लेखनं तद्यथा क्षौद्रं नीरमुष्णं वचा यवाः" ।।
( शा ० पू ० ख ० अ ०4 / 11 )

• जो द्रव्य सम्पूर्ण शरीर की धातुओं और मलों को सुखाकर , उखाड़ या छील कर शरीर से बाहर निकाल देता है , उसे लेखन कहते हैं , जैसे – शहद , गरम पानी , वचा और यव । इस कर्म को ‘ लेखन ‘ कर्म कहते हैं । ।

•“ पर्याय – लेखन , कर्शन , कफ मेदावशोषण ( सुश्रुत ) , पतलीकरण ।

•लेखन द्रव्यों के गुण – ये लघु , रूक्ष एवं सूक्ष्म गुण युक्त होते है तथा प्राय : उष्ण वीर्य होते हैं ।

• भौतिक संघटन – सुश्रुत ने लेखन द्रव्यों को वायु और अग्नि महाभूत प्रधान बताया है ।

• लेखन द्रव्यों का कार्मुकत्व – वायु और अग्नि महाभूत की प्रबलता के कारण लेखन द्रव्यों के गुण ( लघु , रूक्ष , सूक्ष्म , उष्ण ) कफ और मेद नाशक होते हैं ।

• उदाहरण शहद , उष्ण जल , वचा , यव , सालसारादि गण ( सुश्रुत ) आदि । चरक ने सूत्र स्थान के अध्याय -4 में लेखन कर्म करने वाले दस द्रव्यों को एकत्र रूप में लेखनीय महाकषाय ‘ की संज्ञा दी है । ये द्रव्य हैं – मुस्तक , कुष्ठ , हरिद्रा , दारूहरिद्रा , वचा , अतिविषा , कटुका , चित्रक , चिरबिल्व और हैमवती (बाल वच ) ।

  1. ग्राही
"दीपनं पाचनं यत् स्यादुष्णत्वाद् द्रवशोषकम् । ग्राहितञ्च यथा शुण्ठी जीरकं गजपिप्पली" ।।
( शा ० पू ० ख ० अ ० 4/11 )

• जो द्रव्य दीपन ( अग्निवर्धक ) हो , पाचक हो और उष्ण होने से द्रव ( मल के पतलेपन ) को सुखाने वाला हो , उसे ‘ ग्राही ‘ कहते हैं , जैसे – शुण्ठी , जीरा और गजपीपल ।

पर्याय – ग्राही , संग्राही , उष्णग्राही , आमग्राही , संग्राहक आदि ।

• ग्राही द्रव्यों के गुण – ग्राही द्रव्यों के भौतिक संघटन ( अग्निवायव्य ) के आधार पर निम्नलिखित गुण निर्धारित किये जाते हैं

रस– कटु रस प्रधान विपाक- कटु वीर्य – उष्ण गुण- लघु दोषकर्म- वातकफ शामक ।

भौतिक संघटन *
• आचार्य सुश्रुत ने ग्राही द्रव्यों में अग्नि और वायु महाभूत की बहुलता बताई है और इन दोनों में भी अग्नि की प्रधानता होती है । * नागार्जुन ने ग्राही द्रव्यों को पृथ्वी और वायु महाभूत प्रधान बताया है ।

• उदाहरण जातीफल , शुण्ठी , जीरक , गजपीपल आदि ।

युनानी संज्ञा – काबिज़ ।

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