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RASSHALA NIRMAN

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रसशाला निर्माण

RASSHALA NIRMAN

•रसशाला स्थान चयन : –

जो स्थान भय और आतंक रहित , धर्मराज्य , जहाँ शिव एवं पार्वती का पूजा स्थल हो , समृद्ध और शुभ लक्षणों युक्त नगरी में विद्वान रसशास्त्री को रसशाला का निर्माण कराना उपयुक्त होता है ।

ऐसे नगर में चारदीवारी एवं चार द्वारा वाला विस्तृत रमणीक उपवन में सम्यक् वातायन ( खिड़कियों ) युक्त तथा दिव्य चित्रों से युक्त विशाल रसशाला का निर्माण करना चाहिए ।

•रसशाला में कार्यो का विभाजन : –

रसशाला की पूर्व दिशा में रसभैरव की स्थापना करना ,

आग्नेयकोण में सभी अग्निकार्यो का प्रबन्ध ,

दक्षिण दिशा में कूटने , पीटने एवं घोटने का प्रबन्ध ,

नैऋत्यकोण में शस्त्रकर्म ,

पश्चिम दिशा में प्रक्षालन कर्म ,

वायव्य कोण में द्रव्यों एवं उपकरणों को सुखाना ,

उत्तरदिशा में वेधकर्म संस्कार तथा

ईशान कोण में समस्त सिद्ध औषधियों एवं रससाधन में उपयुक्त पदार्थों का संग्रह करना चाहिए ।

•’ रसशाला में संग्रह योग्य औषधियाँ : –

सभी महारस , उपरस , साधारण रस , धातुएँ , उपधातुएँ , रत्न , उपरत्न , सुधावर्ग के द्रव्य , पारद , पश्चलवण , त्रिक्षार , अम्लवर्ग द्रव्य तथा काष्ठौषधियों में त्रिकटु , त्रिफला , त्रिमद , सरसों , राई , आर्द्रक , मूली , सोमवल्ली , सोमवृक्ष , रुद्रवन्ती , उच्चटा , ईश्वरी , भूतकेशी , कृष्णलता आदि आवश्यकतानुसार अनेक औषधियों का संग्रह करना चाहिए ।

• रसशाला में संग्रहयोग्य उपकरण : – सत्त्वपातन कोष्ठी , आसवारिष्ट क्वाथ निर्माणार्थ कोष्ठी , विविध प्रकार की टंकियाँ , दो भाथी , मिट्टी एवं लौहे की दो नालियाँ , स्वर्ण , लौह , कांस्य , ताम्र , पत्थर या चमड़े से बनी हुई कुंडियाँ , संडासी , चिमटी , उलूखल यन्त्र , खल्वे , चक्की , सिलबट्टा , चलनियाँ , वस्त्र , छोटी – बड़ी शलाकाएँ , घड़ा रखने का स्टेण्ड , मूषानिर्माण योग्य मृत्तिका , तुष , रूई , वन्योपल , कोयले , गोर्बर , बालुका , काँच , लोहा , मिट्टी , काँच की बोतलें , प्याले , टोकरियाँ , बांस की खुरपी , करना चाहिए । छुरी , कूर्चिका , पालिका तथा रसशाला में प्रयुक्त अन्य आवश्यक वस्तुओं का संग्रह करना चाहिए।

• रसवैद्य के लक्षण : – संपूर्ण रसशास्त्र का अध्ययन करने वाला , वनस्पतियों के नाम , रूप , भेद , गुण , दोषादि को जानने वाला , खनिज , लौह रत्नादि की पहचान ,गुणकर्म को जानने वाला , सभी देशों की भाषाओं को जानने वाला , धर्मनिष्ठ , सत्यवादी , विद्वान् , शिव एवं विष्णु का उपासक , दयालु तथा पद्महस्त श्रेष्ठ रसवैद्य होता है ।

• भेषज आहरणकर्ता के लक्षण : – प्रत्येक औषधि के विभिन्न भाषाओं के नाम एवं पर्यायों को जानने वाला , पवित्र आचार विचार वाला , छलकपट रहित , अनेक भाषा एवं शास्त्रों के ज्ञाता को औषधियों के क्रय एवं वितरण में नियुक्त करना चाहिए ।

• ‘ शुद्ध आचार – विचार , सत्यवादी , आस्तिक , अपने मन को नियंत्रित रखने वाला , संशय रहित व्यक्ति को रसशाला में रखने से रसकर्म में सिद्धि प्राप्त होती है ‘।

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