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RASBHEDIYA ADHYAY

by

रसभेदीयध्यायं

• मधुरादि रसों की उत्पत्ति-

दो – दो महाभूतों की अधिकता ( उल्बणैः ) से क्रमश : मधुरादि छ : रसों की उत्पत्ति होती है , जैसे क्ष्मा ( पृथ्वी ) और अम्भ ( जल ) की अधिकता से ‘ मधुर रस ‘ , पृथ्वी और अग्नि की अधिकता से ‘ अम्ल रस ‘ , जल और अग्नि की अधिकता से लवण रस ‘ , आकाश ( ख ) और वायु की अधिकता से ‘ तिक्त रस ‘ , अग्नि और वायु की अधिकता से कटु रस ‘ तथा पृथ्वी और वायु की अधिकता से ‘ कषाय रस ‘ की उत्पत्ति होती है ।

• मधुर ( Sweet – पृथ्वी + जल ) रस के लक्षण-

जिसे खाने पर वह मुख ( वक्त्र ) में लिपट जाये , शरीर में प्रसन्नता उत्पन्न करे , इन्द्रियों ( अक्ष ) को तृप्त करे और पिपीलिका ( चींटी ) आदि को प्रिय हो उसे मधुर रस समझना चाहिये ।

• अम्ल ( Sour – पृथ्वी + अग्नि ) रस के लक्षण-

यह मुख को घोता ( क्षालयते- मुख में स्राव निकालता- Salivation ) है । रोमांच ( रोम का उत्तेजित हो जाना ) और दन्तहर्ष तथा नेत्र और भौहों को संकुचित करता है ।

•  लवण ( Salt – जल + अग्नि ) रस के लक्षण-

मुख से स्राव ( Salivation ) होना , कपोल ( Temporal region ) और ( Throat ) में दाह होता है ।

• तिक्त ( Bitter – वायु + आकाश ) रस के लक्षण-

यह मुख ( आस्य ) को स्वच्छ ( विशद ) करता है और जिहा के रस ग्रहण की शक्ति को नष्ट ( प्रतिहन्ति ) करता है । 

• कटु ( Pungent- वायु + अग्नि ) रस के लक्षण-

मुख में चिमचिमाहट के साथ जिहा के अग्र भाग को उत्तेजित करता है , नेत्र , नासिका और मुख से स्राव कराता है और कपोलों ( Temporal region ) में जलन उत्पन्न करता है ।

• कषाय ( Astringent- वायु + पृथ्वी ) रस के लक्षण-

यह जिह्वा को जड़ बनाता है और कण्ठ ( Throat ) तथा स्रोतों को बन्द करता है ।

• मधु ( Sweet ) रस के कार्य-

ये रसों के रूप ( लक्षण ) हैं , अब मधुर रस के कर्मों को कहते है जन्म से शरीर में सात्म्य ( अनुकूल ) होने के कारण यह सम्पूर्ण धातुओं को बढ़ाता है , बलवर्द्धक , बालक – वृद्ध – क्षत ( उर : क्षत ) और क्षीण व्यक्तियों के लिये लाभकारक , केश , इन्द्रिय और ओज को बढ़ाने वाला है ।

यह बृंहण ( पुष्टिकारक ) , कण्ठ के लिये हितकारक , स्तन्य ( दुग्ध को बढ़ाने वाला ) , सन्धान करने ( जोड़ने ) वाला और गुरु होता है । यह आयुष्य ( आयु को बढ़ाने वाला ) , जीवन के लिये हितकर , स्निग्ध ( चिकना ) , पित्त – वात और विष को नष्ट करने वाला होता है ।

 ‘ अतिमात्रा में सेवन करने से मेद और कफ के रोगों को उत्पन्न करता है । स्थूलता ( Obesity ) , अग्निसाद ( मन्दाग्नि ) , संन्यास ( मूर्छा ) , मेह ( प्रमेह ) , गलगण्ड ( Goiter ) और अर्बुद ( Tumour ) आदि रोगों को उत्पन्न करता है ।

• अम्ल ( Sour ) रस के कार्य-

 यह जठराग्नि को तीव्र करने वाला , स्निग्ध ( Oily ) . हृद्य ( हृदय के लिये लाभकारक ) , पाचन ( Digestion ) करने वाला , रुचि उत्पन्न करने वाला , वीर्य में उष्णा , स्पर्श में शीतल , प्रीणन ( पुष्टिकारक ) , क्लेदक ( क्लिन्न- गीला करने वाला ) , लघु ( Light ) . कफ – पित्त और रक्त ( अन ) को बढ़ाने वाला और मूढ़ वायु का अनुलोमक ( अपने उचित मार्ग से निकालने वाला ) होता है ‘ अतिमात्रा ‘ में सेवन करने से यह शरीर ( तनोः ) में शिथिलता ( Dullness ) , तिमिर ( नेत्रों के सामने अन्धेरा ) , भ्रम ( चक्कर आना – Dizziness ) , कण्डू ( Itiching ) , पाण्डु ( Anaemia ) , विसर्प , शोफ ( Oedema ) , विस्फोट , प्यास और ज्वर की उत्पत्ति होती ।

• लवण ( Salt ) रस के कर्म-

यह स्तम्भ ( अवरोध ) , सङ्घात ( कठिनता Hardness ) , बन्धन को नष्ट ( विध्मापन ) करता है , अग्नि को बढ़ाता है । स्नेहन , स्वेदन , तीक्ष्णता , रुचि उत्पन्न करने वाला , छेदन और भेदन करने वाला है । ‘ अतिमात्रा ‘ में सेवन करने पर वातरक्त ( Gout ) , खलित ( गंजापन- Baldness ) , पलित ( बालों का सफेद होना ) , बलिम ( झुर्रियां पड़ना- Wrinkles ) , प्यास ( तृट ) , कुष्ठ ( Skin diseases ) – विष ( Poison का वेग बढ़ाना ) और विसर्प को बढ़ाता है तथा का नाश ( क्षपयेत् ) करता है ।

• तिक्त ( Bitter ) रस के कार्य-

यह स्वयं में अरुचिकारक होता है , किन्तु अरुचि ( भोजन आदि में ) को नष्ट करता है , कृमि ( worms ) , तृट् ( प्यास ) , विष , कुष्ठ , मूर्छा , ज्वर ( Fever ) , उत्क्लेश , दाह ( Burning ) , पित्त और कफ को शान्त ( जयेत् ) करता है । क्लेद ( गीलापन ) -मेद – वसा ( Fat ) – मज्जा ( Marrow ) – मल ( शकृत ) और मूत्र को सुखाता है । यह लघु ( Light ) , मेध्य ( मेधा को बढ़ाने वाला ) , शीत वीर्य , रूक्ष ( Dry ) , स्तन्य ( दुग्ध ) और कण्ठ को शुद्ध करने वाला है । ‘ अतिमात्रा ‘ में सेवन करने पर धातुओं का क्षय और वातज व्याधियाँ होती हैं ।

• कटु ( Pungent ) रस के कार्य-

यह गले के रोग ( गल + आमय ) , उदर्द ( शीतपित्त- Urticaria ) , कुष्ठ ( Skin diseases ) , अलसक और शोफ ( Oedema ) को नष्ट करता है , व्रणों ( Abscess ) को दबाने ( अवसादन ) वाला है स्नेह – मेद और क्लेद ( गीलापन ) का शोषण करता है । जठराग्नि को तीव्र करने वाला , पाचन ( Digestive ) , रुचिकारक , शोधन करने वाला और अन्न का शोषण करने वाला है । यह बन्धनों ( अन्न ) को छिन्न – भिन्न करता है , स्रोतसों को विवृणोति ( फैलाता ) है और कफ को नष्ट करता है । ‘ अतिमात्रा ‘ में सेवन करने से प्यास , शुक्र और बल का क्षय , मूर्छा ( Unconsciousness ) , आकुंचन ( Contraction ) , कम्पन , कटि ( Waist ) और पीठ ( Back ) में पीड़ा की उत्पत्ति होती है ।

• कषाय ( Astringent ) रस के कार्य-

यह पित्त और कफ को नष्ट करता है , गुरु , रक्त ( अस्र ) शोधक , पीडक ( व्रण को दबाने वाला ) , रोपण ( Healing ) करने वाला , वीर्य में शीत , क्लेद ( गीलापन ) और मेद को सुखाता है । आम ( कच्चे ) को रोकता है , ग्राही ( स्तम्भित करना ) , रूक्ष ( Dry ) , और त्वचा को अत्यन्त शीतल करता है ।

अतिमात्रा ‘ में सेवन करने विष्टम्भन ( मलावरोध ) , आध्मान ( पेट फूलना- Tympanitis ) , हृद्रुज : ( हृद् + रुज : हृदय में वेदना ) , प्यास , कृशता , शुक्रक्षय ( पौरुषभ्रंश ) , स्रोतों का अवरोध और मल का अवरोध ( मलग्रहान् ) होता है ।

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