fbpx

रस

by

रस

"रसनेन्द्रियग्राह्यवस्तुनि रसः । "
रसनेन्द्रिय से जिस वस्तु का ग्रहण किया जाता है , उसे ' रस ' ( इन्द्रियार्थ ) कहते हैं।

•संख्या

"स्वादुरम्लोऽथ लवणः कटुकस्तिक्त एव च । कषायश्चेति षट्कोऽयं रसानां संग्रहः स्मृतः ।।"
( च.सू. 1.65)


रस

  1. स्वादु अर्थात् मधुर Sweety
  2. अम्ल Soury
  3. लवण Salty
  4. तिक्त Bittery
  5. उष्ण अर्थात् कटु Pungent
  6. कषाय Astringent

रस का पाञ्चभौतिक संगठन
चरक मतेन
मधुर -जल + पृथिवी
अम्ल- पृथिवी + अग्नि
लवण -जल + अग्नि
कटु -वायु + अग्नि
तिक्त -वायु + आकाश
कषाय- वायु + पृथिवी

ऋतु प्रभाव
-ऋतु मे रस उत्पत्ति
शिशिर में तिक्त, बसंत में कषाय, ग्रीष्म में कटु ,वर्षा में अम्ल, शरद में लवण ,हेमंत में मधुर रस की उत्पत्ति होती है।

  • रस और अनुरस में अंतर
    द्रव्य में स्थित व्यक्त रस रस है तथा अंत में व्यक्त होने वाला अनुरस है।

रस तथा उनके कर्म

  1. मधुर रस
    –आजन्म सात्म्य होने से धातुओं को प्रबल बल देना
    –बाल , वृद्ध , क्षत , क्षीण , वर्ण , केश और इन्द्रियाँ तथा ओज के लिये प्रशस्त
    –बृहण – कण्ठ्य – स्तन्यवर्धक सन्धानकृत् – गुरु
    –आयुवर्धक – जीवन – स्निग्ध पित्त , वायु और विष को नष्ट करने वाला
  2. अम्ल रस
    –अग्निदीपक – स्निग्ध – हृद्य – पाचन – रोचन – उष्णवीर्य – शीत स्पर्श वाला – प्रीणन क्लेदन लघु
    –कफ , रक्त एवं पित्तवर्धक
    –मूढ वात का अनुलोमन
  3. लवण रस
    -स्तम्भ , संघात और बन्ध का नाशक – अग्निवर्धक – स्नेहन – स्वेदन तीक्ष्ण – रोचन – छेदन – भेदन
  4. तिक्त रस
    –स्वयं ही अरोचक होने पर भी अरुचिनाशक
  • कृमि – तृष्णा – विष – कुष्ठ – मूर्छा – ज्वर – उत्क्लेश- दाह और पित्तकफ नाशक
    — क्लेद , मेद , वसा , मज्जा , मल , मूत्र का शोषक
    — लघु – मेध्य – शीत – रूक्ष – स्तन्यशोधक कण्ठशोधक
  • 7.कटु रस
    –गलरोग – उदर्द – कुष्ठ – अलसक – शोफ नाशक –व्रणावसादन नाशक
    — स्नेह , मेद और क्लेद उपशोषक
    –दीपन – पाचन – रुचिकर शोधन – अन्न शोषक -अवरोधों को दूर करना – स्रोतों को फैलाना – कफघ्न

6.कषाय रस
— पित्तकफहर – गुरु – रक्तशोधक – पीडन – रोपण – शीत – क्लेद और मेद का शोषक आमस्तम्भ ग्राही – रुक्ष त्वचा को अतिनिर्मल करने वाला

Leave a Comment

error: Content is protected !!