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RAS SHASTRA KA ITIHAS

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रस शास्त्र का ऐतिहासिक विवेचन

 रस शब्द की नियुक्ति

1. पारद को स्वर्ण , रजत आदि सभी धातुओं को खा जाने से रस कहते है ।

2. शिव के शरीर का वीर्य ( रस ) होने के कारण पारद को रस कहते है ।

3. इस पारद का सेवन करने पर रोग , वृद्धावस्था और मृत्यु का नाश होने से इसे रस कहते है ।

रस शास्त्र का इतिहास

रस शास्त्र का इतिहास निम्न कालो मे विभक्त है-

1. प्राकवैदिक काल –  पुरातत्व की खुदाई में मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की घाटी में कुछ ऐसे प्रमाण मिले जो उनके रासायनिक ज्ञान को दर्शाते हैं।

2.  वैदिक काल-  इसमें केवल एकल वनस्पतियों और औषधियों का प्रयोग किया जाता था जिसमें खनिज और जंतु तत्वों का प्रयोग भी एकल औषधियों के रूप में होता था लेकिन मिश्रित औषधि का प्रयोग नहीं बताया गया है।

 वैदिक काल में 4 औषधियों का प्रयोग होता था-

1.आथर्वणी

2. अंगिरसी

3. दैवी

4. मनुष्यजा

3.  संहिता काल –

• चरक संहिता – यह ग्रन्थ बृहत्त्रयी में सर्वाधिक प्राचीन है , जिसका समय ईसा पूर्व 1200 शताब्दी का है ।

इसमें द्रव्यों के औद्भिद् , जाङ्गम और पार्थिव तीन भेद किये गये है ।

पार्थिव द्रव्यों में सुवर्ण , रजत , ताम्र , त्रपु , सीसक और लौह – इन छ : धातुओं का उल्लेख मिलता है ।

रत्नों में माणिक्य , मुक्ता , पुष्पराग , प्रवाल , हीरक , , वैदूर्य , सूर्यकान्त , सर्पमणि , स्फटिक , शंख और शक्ति का प्रयोग मिलता है।

• सुश्रुत संहिताः- यह ग्रन्थ आयुर्वेद में ऐतिहासिकता के आधार पर द्वितीय स्थान पर है ।

इस ग्रन्थ में रसशास्त्रीय द्रव्यों का विशेष उल्लेख मिलता है । इस ग्रन्थ में पारद का स्पष्ट रूप से बाह्म प्रयोगार्थ उल्लेख हुआ है ।

फेनाश्म ( सङ्खिया ) का इस ग्रन्थ में सर्वप्रथम उल्लेख मिलता है ।

इस ग्रन्थ में धातुओं एवं रत्नों का प्रयोग चरक की अपेक्षा अधिक स्थानों पर कुछ नवीन रूप में मिलता है।

• अष्टाङ्ग संग्रह एवं अष्टाङ्ग हृदयः- ये दोनों ग्रन्थ आचार्य वाग्भट्ट ने चरक सुश्रुत को आधार मानकर लिखे है ।

इस ग्रन्थ में रसशास्त्रीय औषधियों का अधिक विकसित स्वरूप देखने को मिलता है ।

इसमें धातुओं के रस , गुण , वीर्य , विपाक का वर्णन मिलता है ।

नेत्ररोगों में वैदूर्य , स्फटिक , शंख , मुक्ता , विद्रुम , रजत , लौह , त्रपु , ताम्र , सीसा , हरताल , मैनशिल , समुद्रफेन , रसाञ्जन , सैंधवलवण इन सभी को अजा दुग्ध में पीसकर वर्ति बनाने का उल्लेख किया है ।

4. रस शास्त्र का उद्भव काल –

 आठवीं शताब्दी इसका काल है इस शताब्दी में रस शास्त्र का विकास प्रारंभ हो चुका था।

11वीं 12वीं शताब्दी तक यह विकास चरम पर पहुंच चुका था।

12 वीं शताब्दी के बाद इसका प्रयोग चिकित्सा के रूप में होने लगा था।

5.  आधुनिक काल –

 वर्तमान का काल आधुनिक काल कहा जाता है ।

इस काल में रस शास्त्र के अंतर्गत नई-नई खोजें हो रही है

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