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Ras Kriya

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• रसक्रिया – फाणित , अवलेह – प्राश 

क्वाथ , स्वरस , हिम आदि को पुनः पकाकर गाढ़ा ( घन ) कर लेने को रसक्रिया , अवलेह और लेह कहते हैं ।

“क्वाथादीनां पुनः पाकाद् घनत्वं सा रसक्रिया ।

सोऽवलेहश्च लेहः स्यात्तन्मात्रा स्यात्पलोन्मिता ।।” ( शा . सं . म . ख . 8/1 )

रसक्रिया – फाणित – अवलेह – प्राश – घन एक ही कल्पना के अवस्थानुसार सूक्ष्म भेद है ।

आचार्य शार्ङ्गधर ने रसक्रिया के अवलेह और लेह दो पर्याय बताये हैं । जो चाटने योग्य हो , उसे लेह या अवलेह कहते हैं । प्राशन क्रिया की जाने से प्राश कहते हैं ।

रसक्रिया को फाणित ( राव ) जैसा बनाया जाता है । अतः जो रसक्रिया राव या फाणित के समान मृदु हो , उसको फाणित कहते हैं तथा जो रसक्रिया उससे थोड़ी गाढ़ी चाटने योग्य बनती है , उसे अवलेह या लेह और उससे भी अधिक गाढ़ी गोली ( वटी ) बनने योग्य रसक्रिया को घन कहते हैं । घन बनाने के लिए रसक्रिया को अवलेह जैसा बन जाने पर अग्नि से नीचे उतारकर तथा थाली में फैलाकर व धूप में सुखाकर गोली ( वटी ) बनने योग्य होने पर गोली बना लेनी चाहिए ।

• मात्रा : –

शार्ङ्गधर संहिता में रसक्रिया , अवलेह ( लेह ) की मात्रा 1 पल ( 48 ग्राम ) बताई है ।

• प्रक्षेपद्रव्य मात्रा :- अवलेह एवं रसक्रिया में प्रक्षेप द्रव्य की मात्रा समान बताई है ।

• रसाञ्जन :

आयुर्वेद में रसाञ्जन निर्माण की दो विधियाँ प्राप्त होती है ।

सर्वप्रथम दारुहरिद्रा काष्ठ के यवकुट चूर्ण को 16 गुने जल में रात्रिपर्यन्त भिगोकर मध्यमाग्नि द्वारा क्वाथ बनाते हैं । षोडशांशावशेष द्रव रहने पर क्वाथ को स्वच्छ वस्त्र से छान लेते हैं । तत्पश्चात् क्वाथ के समान गोदुग्ध मिलाकर मन्दाग्नि पर गाढ़ा होने तक पाक करते हैं । फिर उसे थाली में फैलाकर धूप में सूखा लेते हैं । यही रसाञ्जन है । इसे दारिसक्रिया भी कहते हैं ।

आयुर्वेद प्रकाश में दारूहरिद्रा के क्वाथ में चतुर्थांश अजादुग्ध मिलाकर रसाञ्जन निर्माण करने का वर्णन मिलता है।

• गुण

रसाञ्जन रस में तिक्त , कटु एवं उष्णवीर्य है । यह श्लेष्म , विष एवं नेत्र रोगनाशक है । यह रसायन , छेदन एवं व्रणदोषहर्ता है ।

• गुडूचीघन ( गुडूची रसक्रिया – संशमनी वटी ) :

ताजी हरी एवं अंगुली जितनी मोटी गुडूची को पानी से धोकर एवं छोटे – छोटे टुकड़े करके उदूखल यन्त्र ( इमामदस्ता ) में कूट लेते हैं । फिर इसे चतुर्गुण जल में रात्रिपर्यन्त भिगोकर दूसरे दिन अग्नि पर रखकर क्वाथ करते हैं । चतुर्थांश जल शेष रहने पर छानकर , पुनः अग्नि पर रखकर पाक करते हैं । पाक करने पर जब क्वाथ गाढ़ा होने लगे तो उसे बार – बार कड़छुल ( दी ) से चलाते रहते हैं ।

पुनः धूप में सुखा लेते हैं या गोली बनाकर सुखा लेते हैं । आचार्य यादवजी ने इसे ‘ संशमनी वटी ‘ कहा है इसे गुडूचीघन वटी भी कहते हैं । इसका प्रयोग ज्वर , जीर्णज्वर , वातरक्त आदि रोगों में लाभकारी है । तथा अन्य जीर्ण व्याधियों के शमनार्थ सहायक औषधि के रूप में दिया जाता है ।

•मात्रा : – 500 मि.ग्रा . तक ।

• कुटजघन ( कुटज रसक्रिया )

अर्थात् कुटज की छाल 1 पल को यवकुट करके आठ गुना जल में क्वाथ करने के बाद छान ले , फिर उसमें क्वाथ के समान मात्रा में दाडिम स्वरस मिलाकर अर्धघन ( मधु – सदृश ) गाढ़ा करके काँच पात्र में सुरक्षित रख लें ।

•मात्रा : – 1/2 तोला की मात्रा में तक्र के साथ

•अनुपान :- दाडिमस्वरस

• उपयोग : – रक्तातिसार

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