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RAS DHATU

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रस धातु

•उत्पत्ति

पाचन के पश्चात् अन्न का जो सार अंश आंत्र में अवशोषित हो जाता है , अन्न रस कहलाता है ।

•रस का स्थान

रस धातु का स्थान हृदय है । हृदय से रसधातु धमनियों [ धमनियां 24 कही गई हैं -10 ऊपर की ओर जाने वाली , 10 नीचे की ओर जाने वाली तथा 4 तिरछी जाने वाली ] में प्रवेश कर पूर्व कर्म के प्रभाव से शरीर को प्रतिदिन तृप्त करता है अर्थात् पोषण प्राप्त कराता है , बढ़ता है , धारण करता है तथा यापन करता है अर्थात् ऊतकों को सजीव रखता है

रस धातु का शरीर में प्रमाण

आहार के पाक के पश्चात् जो प्रथम धातु बनती है उसे रस कहते हैं तथा इसका शरीर में नौ अञ्जलि प्रमाण होता है ।

शरीर में रस का यह प्रमाण मध्य ( average ) है । आहार – विहार तथा अन्य विपरीत परिस्थितियों में यह मात्रा कम अथवा अधिक भी हो सकती है , सामान्य व्यक्ति की अञ्जलि में लगभग 16 तोला ( 180 मि ० ली ० के लगभग ) जल आता है । नौ अञ्जलि प्रमाण नवीन माप के अनुसार 1.75 = 2.0 लीटर के लगभग होता है ।

रससार पुरुष के लक्षण

शरीर में रस का प्रमाण अनुमान द्वारा जाना जाता है । अनुमान का भी कोई आधार होता है । यहां व्यक्ति की त्वचा को देखकर रसधातु के सम्बन्ध में अनुमान किया जाता है , अतः रससारता के जानने के लिए त्वक्सार पुरुष का वर्णन किया गया है ।
त्वकसार पुरुष की त्वचा स्निग्ध , श्लक्ष्ण , मृदु , सूक्ष्म ( पतली ) तथा अल्प एवं कोमल लोमवाली और प्रभायुक्त होती है । यह सारता सुख , सौभाग्य , ऐश्वर्य , उपभोग , बुद्धि , विद्या , आरोग्य प्रसन्नता तथा दीर्घायु को बताती है।

रस वृद्धि के लक्षण

शरीर में रस धातु के सामान्य से अधिक हो जाने पर जी मिचलाना , मुख से स्राव का अधिक उत्पन्न होना तथा श्लेष्मा ( कफ ) की वृद्धि के समान मन्दाग्नि , आलस्य , शीतता , अंगों में शिथिलता , श्वास , कास एवं निद्रा की अति आदि लक्षण प्रकट होते हैं ।

रस क्षय के लक्षण

शरीर में रसधातु के क्षय होने की दशा में जरा – सी चेष्टा करने पर हृदय में पीड़ा होने लगती है । ऊंचे स्वर में बोलना सहन नहीं होता । जरा – जरा सी बातों पर हृदय की धड़कन बढ़ जाती है । शरीर में कम्पन तथा शून्यता प्रतीत होती है । मामूली से परिश्रम से थकावट आ जाती है ।
मुख सूख जाता है , प्यास अधिक लगती है । शरीर में रूक्षता बढ़ जाती है । अपने से ही ग्लानि उत्पन्न हो जाती है ।

रसज विकार

क्षीण अथवा भोजन के प्रति अश्रद्धा , अरुचि , मुख में रस का विकृत हो जाना , हृल्लास ( जी मिचलाना- nausea ) , भारीपन , तन्द्रा , अंगों में पीड़ा , ज्वर , नेत्रों के आगे अन्धकार होना , पाण्डुता , स्रोतों में अवरोध , मैथुनशक्ति में हास शिथिलता , शरीर का दुबला हो जाना , तृप्ति ( पेट भरा हुआ प्रतीत होना , थकान तथा हृदय रोग होना।

रसवह स्रोतस एवं दुष्टि के कारण

भारी , शीतल , अत्यन्त स्निग्ध , अत्यधिक मात्रा में भोजन करने में तथा बहुत अधिक चिन्ता करने से रसवाही स्रोत दुष्ट हो जाते हैं ।

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