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RAKTA DHATU

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रक्त धातु

• रक्त की उत्पत्ति

“रसाद्रक्त ………. प्रजायते ।।” ( च.चि. 15/15 , सू.सू. 14/10)

रस से रक्त उत्पन्न होता है ।

“तेजो रसानां सर्वेषां मनुजानां यदुच्यते ।
पित्तोष्मणः स रागेण रसो रक्तत्वमृच्छति ।।”( च.चि .15 / 27 )

समस्त मनुष्यों में जो रसों का तेज अग्नि होता है उससे तथा पित्त की ऊष्मा दोनों से पाक होकर रस रक्तता को प्राप्त होता है ।

•रक्त का स्वरूप

विशुद्ध रक्त सुवर्ण ( सोने ) की आभा वाला , वीरबहूटी , लाल कमल , अलक्तक ( लाख में रंजित रूई ) , गुञ्जाफल , भेड़ अथवा शशक के रक्त के समान अथवा किंचिद् विविध वर्ण असंहत ( गाढ़ा ) होता है । शुद्ध रक्त मधुर एवं लवणरसयुक्त स्वभाव में शीतोष्ण होता है ।

• रक्त के कार्य

अपनी सिराओं [ रक्तवाहिकाओं ] में संचार करता हुआ रक्त धातुओं का पोषण करता है , इस प्रकार धातुओं की क्षय एवं वृद्धि रक्त अधीन है । वह वर्ण का प्रसादन करता है।

• शरीर में रक्त का अञ्जलि प्रमाण

“अष्टौ ( अञ्जलयः ) शोणितस्य । (च . शा .7 / 16)

रक्त का शरीर में आठ अंजलि प्रमाण होता है अर्थात् सामान्य मनुष्य में यह मात्रा 8×16 = 128 तो . = 1.5 लीटर के लगभग होती है एक [ अञ्जलि -16 तोला । आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से रक्त धातु [ R.B.C. ] शरीर में लगभग 1.8 लीटर से 2.5 लीटर होती है ।

•रक्तसार पुरुष के लक्षण ‘

“कर्णाक्षिमुखजिहानासौष्टपाणिपादतलनखललाटमेहनं स्निग्यरक्तवर्ण श्रीमत् भ्राजिष्णु रक्तसाराणाम् । सा सारता सुखमुदग्रता मेधा मनस्वित्वं सौकुमार्यमनतिबलमक्ले शसहिष्णुत्वमुष्णसहित्वं चाचष्टे ।। “(च चि .8 / 114)

रक्तसार पुरुष के कान , नेत्र , मुख , जिहा . नासिका , औष्ठ , हाथों की हथेली , पैरों के तलवे , नाखून , ललाट और मूत्रेन्द्रिय स्निग्ध , रक्त वर्ण के , शोभायुक्त तथा उज्ज्वल होते हैं ।
यह [ रक्त सारता सुख , उदग्रता , मेधा , मनस्विता तथा सुकुमारता प्रदान करती परन्तु इन व्यक्तियों में बल अधिक नहीं होता है तथा इनमें क्लेश एवं उष्णना के प्रति असहनशीलता रहती है ।

• रक्त वृद्धि के लक्षण

रक्त के ( सामान्य ) से अधिक बढ़ जाने से विसर्प , प्लीहावृद्धि , विद्रधि , कुष्ठ , वातरक्त , रक्तपित्त गुल्म , उपकुश नामक दन्त रोग , कामला , व्यंग , अग्निमान्द्य तथा मूर्छा उत्पन्न होती है । त्वचा , नेत्र और मूत्र का वर्ण लाल हो जाते हैं |

• रक्तक्षय के लक्षण

शरीर में रक्त की कमी होने से त्वचा खुरदरी , फटी हुई सी ( स्फुटिता ) , म्लान तथा रूक्ष हो जाती है । मूर्छा आ जाती है । मधुर एवं अम्ल पदार्थों के सेवन की इच्छा होती है । वातवृद्धि के कारण उन्मार्गगामिता की दशा उत्पन्न हो जाती है।

• रक्त का मल

“किट्टमसृजः पित्तम् ।। “

पित्त रक्त का मल है ।

• निराम ( अदूषित ) पित्त ( bile )

ताम्र आभायुक्त पीले वर्ण का , वीर्य में अत्यन्त उष्ण , कटुरसयुक्त , अस्थिर [ पतला ] , गन्धरहित , रुचिवर्धक , पाचकाग्निवर्धक तथा बलवर्धक पित्त [ bile ] निर्दोष होता है।

• साम ( दूषित ) पित्त ( bile )

साम पित्त दुर्गन्धयुक्त , हरे – काले वर्ण का , स्वाद में अम्ल एवं गाढ़ा भारी होता है । साम पित्त में खट्टी डकारें आती हैं तथा कण्ठ , हृदय [ वक्ष ] में दाह [ जलन होती है ।

• रक्त की उपधातुयें

कण्डरा तथा सिराओं की उत्पत्ति और पुष्टि रक्त द्वारा होती है । ये दोनों रक्त धातु की उपधातुयें , आयुर्वेद की कही गई हैं ।

• कण्डरा

त्वचा आदि के साथ कण्डरा की गणना भी शरीर के प्रत्यंगों में की गई है ।

•कण्डराओं की संख्या
“षोडश – कण्डराः ।। “

कण्डरायें 16 होती हैं । (सु . शा 5/10)

•कण्डराओं के कार्य

शरीर में प्रसारण [ extension ] तथा आकुंचन [ contraction , flexion ] कण्डराओं के द्वारा होता है । कण्डरा पेशियों [ muscles ] के बन्धन का कार्य करती हैं जिनके कारण कंकाल [ skeletonmuscles ) प्रसारण तथा आंकुचन कम होते हैं । अतः कण्डराओं को नवीन मतानुसार टेण्डन [ tendon ] कह सकते हैं ।

•सिरा
जिनमें धमन कार्य होता है वे धमनियां हैं ।
जिनमें स्रवण [ secretion ] कर्म होता है वे स्रोत हैं ।
जिनमें सरण [ गति ] कर्म होता है वे सिरा हैं ।

•सिराओं की संख्या तथा कार्य

“सप्तसिराशतानि भवन्ति ।।”( च . सू . 7/15)

सिराओं की संख्या सात सौ है ।

•दश मूलसिरायें और उनके कार्य

हृदय में लगी हुई दश मूलसिरायें जो अन्य सिराओं के मूलभूत होने के कारण सम्पूर्ण देह में चारों ओर से व्याप्त हैं । ये दश मूल सिरायें रस , रूप ओज का वहन करती हैं और इन्हीं के आश्रय सम्पूर्ण कायिक , वाचिक तथा मानसिक चेष्टायें निबद्ध हैं।

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