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PRATYAY

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प्रत्यय

‘ प्रत्यय ‘ उन चिन्हों ( अक्षर ) को कहते है जिनको शब्दों ( संज्ञा , सर्वनाम , विशेषण ) या धातुओं के आगे लग जाने से नये अर्थ वाले शब्द बन जाते हैं ।
प्रत्यय का स्वतन्त्र अपना प्रयोग नहीं होता है – प्रत्ययों की संख्या अपरिमित है ।
ये प्रत्यय ही वस्तुत : संस्कृत भाषा के वैभव का मूल है।

1 ) णिच् प्रत्यय –

” हेतुमति च ३/१/२६ ।। “

प्रयोजक प्रेरक कर्ता के व्यापार वाच्य होने पर धातु से णिच् प्रत्यय होता है । भ्वादि से लेकर चुरादि तक के दश गणीय धातुओं से ही णिच् प्रत्यय होता है । उन धातुओं से प्रेरणा अर्थात् कराना अर्थ में णिच् किया जाता है ।
कराने के अर्थ में णिच् प्रत्यय करके क्रमश : पठति से पाठयति , करोति से कारयति , लिखति से लेखयति , खादति से खादयति बनता है ।

उदाहरण – दा + णिच् = दापयति ।
धा + णिच् = धापयति ।
अद् – णिच् = आदयति ।
भू + णिच् = भावयति ।
दृश् + णिच् = दर्शयति ।
नम् + णिच् = नमयति ।
स्था – णिच् = स्थापयति ।
सद् + णिच् = सादयति ।

2)क्त प्रत्यय

“क्तक्तवतु निष्ठा १/१/२६ ।।”

सूत्र से क्त और क्तवतु प्रत्ययों की निष्ठा संज्ञा होती है ।
निष्ठासंज्ञक क्त और क्तवतु प्रत्यय भूतकाल अर्थ में सभी धातुओं से कर्मवाच्य अथवा भाव और कर्म अर्थ में क्त प्रत्यय होने से इसका कर्ता तृतीयान्त होता है । क्त प्रत्ययान्त के रूप पुल्लिंग में रामवत् , स्त्रीलिङ्ग में रमावत् और नपुंसकलिङ्ग में गृहवत् चलेंगे ।

उदाहरण
भू + क्त :- भूतः ।
कथ् + क्तः = कथितः ।
जन् + क्तः = जात :।
दा + क्त : – दन्तः ।

3 ) क्तवतु प्रत्यय –

“निष्ठा ३/२/१०२ ।।”

धातु के बाद क्तवतु ‘ प्रत्यय जोड़ने पर . ‘ क्तवतु ‘ में से क और उका लोप हो जाता है । तवत् शेष रहता है ।

जैसे –
स्मृतवतु – स्मृतवत् ।
जि + क्वत = जितवत् ।

क्तवतु प्रत्ययान्त शब्द पुल्लिंग में भवत् की तरह चलेंगे । स्त्रीलिंग में नही शब्द की तरह चलते हैं । नपुसंकलिङ्ग में जगत् शब्द की तरह चलते हैं ।
उदाहरण -श्रु + क्तवतु – श्रुतवान् ।
याच् + क्तवतु – याचितवान् ।
शी + क्तवतु – शयितवान् ।
युध् + क्तवतु – युद्धवान् ।
मुज् + क्तवतु – युक्तवान् ।
सेव् + क्तवतु = सेवितवान् ।

4 ) क्त्वा प्रत्यय

“समानकर्तृकयोः पूर्वकाले ३/४/२१ ।। “

समानकर्तृक धात्वर्थों में पूर्वकाल में विद्यमान धातु से क्त्वा प्रत्यय होता है ।
एक ही कर्ता द्वारा दो क्रियाएँ होने पर पूर्वकालिक क्रिया के अर्थ में प्रथम क्रिया में क्त्वा प्रत्यय लगता है ।
क्त्वा प्रत्यय करने के लिए केवल दो ही क्रियायें होना आवश्यक नहीं है , अपितु दो से अधिक क्रियायें हो तो भी उनमें पूर्वकालिक क्रियाओं में क्त्वा प्रत्यय होता है । इसमें धातु से पूर्व उपसर्ग नहीं लगता है । क्त्वा का त्वा शेष रहता है । अर्थात् क् का लोप हो जाता है । क्त्वा अव्यय है । अत : इसके रूप नहीं चलते हैं । जैसे- भू – क्त्वा भूत्वा ।

उदाहरण- अस् + क्त्वा = भूत्वा ।
आस् + क्त्वा – आसित्वा ।
कथ् + क्त्वा = कथयित्वा ।
कृ + क्त्वा – कृत्वा ।
क्री + क्त्वा – क्रीत्वा ।
तन् + क्त्वा = तनित्वा ।

5 ) अनीयर प्रत्यय –

“तव्यत्तव्यानीयरः ३ / १ / ९ ६ ।।”

‘ चाहिए ‘ अर्थ में धातु से परे कर्मवाच्य और भाववाच्य में ‘ अनीयर ‘ प्रत्यय लगता है । ‘ अनीयर ‘ का अनीय ‘ शेष रहता है । अनीयर् प्रत्यय से बनने वाले शब्दों के रूप तीन लिङ्गों में चलते हैं , निम्नलिखित शब्दों को स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग में भी समझने चाहिए । यथा- करणीय , करणीया , करणीयम् ।

उदाहरण- कृ + अनीयर – करणीय ।
अर्च + अनीयर – अर्चनीय ।
चर् + + अनीयर – चरणीय ।
रह + अनीयर = रहनीय ।
दा + अनीयर – दानीय ।
दिश् + अनीयर = देशनीय ।

6 ) इक प्रत्यय

खेलने वाला , जीतने वाला , जीता गया इन अर्थो में तृतीयान्त प्रातिपदिकों से इक् प्रत्यय होता है । यह साक्षात विधीयमान प्रत्यय न होकर ठक् , ठप् , ठन् , ठ प्रत्ययों के आदेश के रूप में होता है ।

उदाहरण – मास् + इक् = मासिकः ।।
षण्मास् + इक् = पाण्मासिकः ।
वर्ष + इक् – वार्षिक :।
काल + इक् = कालिकः ।
तत्काल + इक् = तात्कालिकः ।
प्रात : + इक् = प्राप्तः कालिकः ।

7 ) टाप् प्रत्यय

“अजाद्यतष्टाप् ४/१/४ ।।”

अज् आदिगण में पढ़े गये शब्द अथवा हस्व अकारान्त शब्दों में स्त्रीत्व की विवक्षा में टाप प्रत्यय होता है ।

उदाहरण – अज + टाप् = अजा ।
अश्व + टाप् = अश्वा ।
ज्येष्ठ + टाप् = ज्येष्ठा ।
वत्स + टाप् = वत्सा ।
कोकिल + टाप् = कोकिला ।
क्षत्रिय + टाप् = क्षत्रिया ।

8 ) डीप् प्रत्यय

“उगितश्च ४/१/६ ।। “

जिससे उक् अर्थात् उ ऋ ल् की इत्संज्ञा हो गई हो गई हो ऐसे प्रातिपदिकों से स्त्रीत्व की विवक्षा में ङीप् प्रत्यय होता है ।

उदाहरण – कर्तृ + ङीप् – की ।
मालिन् + ङीप् = मालिनी ।।
रातृ + ङीप् = रात्री ।
क्रोष्टु + ङीप् = कोष्ट्री ।
दण्डिन् + ङीप् – दण्डिनी ।
जनयिन् + ङीप् = जनयित्री ।

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