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PRATYAKSHAPRAMAN NIROOPAN

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प्रत्यक्षप्रमाण – निरूपण

प्रत्यक्ष शब्द दो शब्दों – प्रति + अक्ष से मिलकर बना है ‘ प्रति ‘ का अर्थ है ‘ सामने ‘ और ‘ अक्ष ‘ का अर्थ है ‘ नेत्र ‘ अर्थात् जो नेत्र के सामने है वही ‘ प्रत्यक्ष ‘ है ।

किन्तु यहां ‘ अक्ष ‘ शब्द से केवल नेत्र ही नहीं अपितु इससे अन्य चारों ज्ञानेन्द्रियों – कर्ण , त्वचा , रसना और घ्राण को भी लिया गया है । क्योंकि ये भी शब्द , स्पर्श , रस और गन्ध के द्वारा अपना – अपना ज्ञान प्राप्त करते हैं , अत : प्रत्यक्ष के ही अन्तर्गत आते हैं ।

• लक्षण –
आचार्य चरक के मतानुसार – आत्मा , इन्द्रिय , मन और इन्द्रियार्थों ( शब्द , स्पर्श , रूप , रस और गन्ध ) का जब संयोग होता है , उसी समय ( व्यक्ता तदात्वे ) जो बुद्धि या ज्ञान उत्पन्न होता है उसे ‘ प्रत्यक्ष ‘ कहते है ।

•इन्द्रियां

“इन्द्र आत्मा तस्य साधनं इन्द्रियम् ।”

जो परम ऐश्वर्य से युक्त होता है उसे इन्द्र कहते हैं । आत्मा को शरीर रूपी सम्पूर्ण ऐश्वर्य से सम्पन्न होने के कारण इन्द्र कहते है । जिस साधन से आत्मा की सत्ता का ज्ञान होता है । उसे इन्द्रिय कहते हैं ।

इन्द्रिय संख्या एवं श्रेणी विभाजन

इन्द्रिय ग्यारह है ।
पांच ज्ञानेन्द्रिया ,
पांच कर्मेन्द्रिया एवं
ग्यारहवां उभयेन्द्रिय मन कहलाती है ।

ज्ञानेन्द्रिय पांच हैं ।
1 ) श्रोत्रेन्द्रिय – शब्द ग्रहण करने वाली इन्द्रिय को श्रोत्रेन्द्रिय कहते हैं श्रोत्रेन्द्रिय का द्रव्य आकाश है ।
2 ) स्पर्शनेन्द्रिय – स्पर्श ग्रहण करने वाली इन्द्रिय को स्पर्शनेन्द्रिय कहते हैं ।
3 ) चक्षुरिन्द्रिय – रूपग्रहण करने वाली इन्द्रिय को चक्षुरिन्द्रिय कहते हैं । चक्षुरिन्द्रिय का द्रव्य अग्नि है । इसकी उत्पति अग्नि से होती है । इस इन्द्रिय की रचना में आकाश तथा वायु की भी भूमिका है ।
4 ) रसनेन्द्रिय – रस ग्रहण करने वाली इन्द्रिय को रसनेन्द्रिय कहते हैं । रसनेन्द्रिय का द्रव्य जल है । इस इन्द्रिय की रचना में आकाश वायु अग्नि की भी भूमिका है ।
5 ) गन्धेन्द्रिय – गन्ध ग्रहण करने वाली इन्द्रिय को गन्धेन्द्रिय कहते हैं । इस का द्रव्य पृथ्वी है ।

कर्मेन्द्रिय – वचन एवं विहार आदि कर्मो की साधन भूत इन्द्रियों को कर्मन्द्रिय कहते है । हाथ , पाव , वाणी , मलेन्द्रिय और मूत्रेन्द्रिय कर्मेन्द्रिय पांच है ।
1 ) – हाथ द्वारा वस्तुओं का आदान – प्रदान रूप विभिन्न कर्म होते है ।
2 ) पाद – गमनागमन रूप क्रियाएं सम्पन्न होती है ।
3 ) पायु मलोत्सर्ग रूप कर्म होता है ।
4 ) मूत्रेन्द्रिय – मूत्र व प्रजनन कर्म होता है ।
5 ) वाक् – बोलने की क्रिया सम्पन्न होती है ।

उभयेन्द्रिय मन – कर्मेन्द्रिय व ज्ञानेन्द्रिय दोनो के कार्य में सहायक होने के कारण मन को उभयेन्द्रिय स्वीकार किया गया है । इन्द्रिय द्वारा ग्राहय विषय को आत्मा तक पहुचाने में व्यापार रूप कार्य करता है ।
“सुखाद्युपलब्धि साधनमन्द्रिय : मन : “
जिससे मनन किया जाए या बाहय इन्द्रिय द्वारा ग्रहण किए जाने वाले गुणों को ग्रहण किया जाए उसे मन कहते हैं।

प्रत्यक्ष प्रमाण के भेद –

यह दो प्रकार का होता है
१. सविकल्प ( Determinate ) और
२. निर्विकल्प ( Indeterminate ) |

१. सविकल्प ( Determination ) – इसमें वस्तु का नाम स्वरूप , जाति और गुण आदि का स्पष्ट और पूर्ण ज्ञान होता है , जैसे — यह व्यक्ति है , पशु है या पक्षी है ।
सविकल्पक प्रत्यक्ष प्रमाण के दो भेद है—
( क ) लौकिक ( Normal or usual ) और
( ख ) अलौकिक ( Abnormal or unusual ) प्रत्यक्ष ।

( क ) लौकिक ( Normal or usual ) प्रत्यक्ष – यह वह प्रत्यक्ष है जो लोक ( संसार ) व्यवहार में प्रचलित होता है । यह पुन : दो प्रकार का होता है –
१ . बाह्येन्द्रिय प्रत्यक्ष और
२. अन्तरिन्द्रिय प्रत्यक्ष ।
इन्हें बाह्य और आभ्यन्तर ( मानस ) प्रत्यक्ष भी कहते हैं।

१ . बाह्येन्द्रिय लौकिक- प्रत्यक्ष – पांचो ज्ञानेन्द्रियों ( कर्ण , त्वचा , चक्षु , रसना और प्राण ) द्वारा ग्रहण किये जाने के कारण यह पांच ( ५ ) प्रकार का होता है –
१. श्रवण प्रत्यक्ष ( Auditory Perception ) – यह प्रत्यक्ष कर्णेन्द्रिय द्वारा किया जाता है । इसके द्वारा शब्द का ज्ञान होता है ।
२. त्वक् प्रत्यक्ष ( Tactile Perception ) – यह ज्ञान त्वचा द्वारा किया जाता किया जाता है । है । इससे किसी भी द्रव्य की शीतलता , उष्णता , रूक्षता या खरता आदि गुणों का ज्ञान
३. चाक्षुष प्रत्यक्ष ( Visual Perception ) – यह प्रत्यक्ष अपने चक्षुरीन्द्रिय द्वारा रूप दर्शन करके किया जाता है ।
४. रासन प्रत्यक्ष ( Gustatory Perception ) – जब किसी द्रव्य का जिह्वा से संयोग होता है , तब इसे रासन प्रत्यक्ष कहते हैं ।
५. घ्राणज प्रत्यक्ष ( Olfactory Perception ) – जब किसी द्रव्य के गन्ध का ज्ञान किया जाता है , तब इसे घ्राणज प्रत्यक्ष कहते है ।

आभ्यन्तर लौकिक प्रत्यक्ष – इसे मानस प्रत्यक्ष ( Mental Perception ) भी कहते हैं , क्योंकि इसमें विषय को मन द्वारा ग्रहण किया जाता है । इसमें सुख , दुःख , इच्छा , द्वेष आदि का ज्ञान मन के द्वारा होता है ।

अलौकिक प्रत्यक्ष के भेद – यह तीन प्रकार का होता है-
1 ) सामान्यलक्षण प्रत्यासत्ति
2 ) ज्ञानलक्षणप्रत्यासत्ति
3 ) योगज

1)सामान्यलक्षण प्रत्यासत्ति –
जिस अलौकिक प्रत्यक्ष द्वारा किसी भी पदार्थ , जाति , वर्ग अथवा विषय के एक अंश का प्रत्यक्षात्मक ज्ञान होने पर उस सम्पूर्ण पदार्थ , जैसे एक गौ देखने से विश्व की समस्त गौ अथवा उसके वर्ग व जाति का ज्ञान हो जाता है ।

2) ज्ञानलक्षण प्रत्यासत्ति
जिस अलौकिक प्रत्यक्ष द्वारा किसी भी वस्तु की इन्द्रिय सन्निकर्ष किए दर्शन जनित ज्ञान के आधार पर ही उसके गुणों का ज्ञान हो जाता है , उसे ज्ञानलक्षणप्रत्यासत्ति कहते हैं । जैसे बर्फ को देखकर उसे स्पर्श किए बगैर उसकी ठंडक जान लेना ।

3) योगज
बिना यह स्पष्ट है कि समस्त ज्ञान इन्द्रियों द्वारा नहीं हो पाता है । उदाहरणस्वरूप भूत – भविष्य का ज्ञान , दूरस्थ दीवार एवं पीठ पीछे छिपी वस्तुओं का ज्ञान आदि । इन सभी का ज्ञान योगीजन अपने योगिक बल , समाधि प्रणिधान से ही करने में समर्थ होते हैं । यह दो प्रकार का होता है

१.युक्त
योगियों द्वारा प्राप्त किया हुआ ज्ञान जिसमें सदा बना रहता है , वह युक्त है ।

२.युन्जान
यह चिन्तापरक कहा गया है , क्योंकि इसमें चिन्तन कर समाधि द्वारा किसी वस्तु विशेष का ज्ञान होता है ।

सन्निकर्ष का स्वरूप एवं भेद – सन्निकर्ष से तात्पर्य है ‘ सम्बन्ध ‘ ।
यह सन्निकर्ष लौकिक प्रत्यक्ष ज्ञान का कारण है । प्रत्यक्ष के लक्षण में ‘ आत्मेन्द्रिय ‘ शब्द से आत्मादि चतुष्टय – आत्मा , मन , इन्द्रिय और विषय को लिया गया है । इनका जब आपस में एक दूसरे से सम्बन्ध होता है तब ज्ञान होता है , इस आपस के सम्बन्ध को ही सन्निकर्ष कहते है ।

यह इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष अर्थात् इन्द्रियों का अपने विषयों से छ : प्रकार का सम्बन्ध होता है –
१ . संयोग ,
२. संयुक्तसमवाय ,
३. संयुक्तसमवेत समवाय ,
४. समवाय ,
५ . समवेतसमवाय और
६. विशेषण विशेष्यभाव ।

१. संयोग ( Conjugation ) – चक्षु से वस्त्र का प्रत्यक्ष होना , ‘ संयोग सन्निकर्ष है ।
२. संयुक्तसमवाय ( Inherence in that which is conjoined ) – इन्द्रियों द्रव्य में रहने वाले गुण का प्रत्यक्ष ज्ञान ‘ संयुक्त समवाय सन्निकर्ष ‘ के कारण होता है , जैसे – घड़े में उसका रंग समवाय सम्बन्ध से रहता है । अत : जब चक्षु से घड़े का प्रत्यक्ष होगा तब उस घड़े के रंग का भी प्रत्यक्ष होगा जो उस घड़े के साथ समवाय सम्बन्ध से है ।

३. संयुक्त समवेत समवाय ( Inherence in that which is conjoined ) यह संयुक्त ( जुड़ा हुआ ) • समवेत ( मिला हुआ ) + समवाय ( नित्य ) इन शब्दों से मिलकर बना है ।
इसका तात्पर्य यह है कि इन्द्रिय ( चक्षु ) के साथ संयुक्त वस्तु ( घड़े ) में समवाय( नित्य सम्बन्ध ) रूप से रहने वाला उसका भाव समवेत ( मिला रहता है ) है ,
अत : जब इसका ज्ञान साथ – साथ होता है तब इसे ‘ संयुक्त समवेत समवाय ‘ कहते हैं ।
उदाहरणतः आंख से संयुक्त घड़े में उसका रंग समवेत है और उस रंग के साथ सामान्य रंग का समवाय – सम्बन्ध है ।

४. समवाय ( Inherence ) – इन्द्रियों का अपने विषयों के साथ सन्निकर्ष ( सम्बन्ध ) होने को ‘ समवाय सन्निकर्ष ‘ कहते है । जैसे – श्रोत्रेन्द्रिय का शब्द के साथ , रसनेन्द्रिय का रस के साथ और चक्षुरीन्द्रिय का रूप के साथ समवाय ( नित्य ) सम्बन्ध होता हैं।

५. समवेत समवाय ( Inherence in inherent ) – शब्द के शब्दत्व गुण का प्रत्यक्ष करना ‘ समवेत समवाय ‘ है , क्योंकि शब्द श्रोत्रेन्द्रिय में समवेत ( मिला ) रहता है । और शब्द में शब्दत्व समवाय रूप में रहता है ।

६. विशेषण विशेष्यभाव ( The relation of qualification and quali fied ) – अभाव का प्रत्यक्ष होना ‘ विशेषण विशेष्यभाव ‘ है , जैसे यह कहा जाय कि पृथ्वी पर घड़ा नहीं है इसका तात्पर्य यह है कि पहले वहां घड़ा था अत : यहां घटाभाव पृथ्वी का विशेषण है जो चक्षु से संयुक्त है और पृथ्वीतल विशेष्य है ।

पंचपंचक

S.N.ज्ञानेन्द्रियांइन्द्रिय द्रव्यइन्द्रिय अधिष्ठानइन्द्रिय विषयइन्द्रिय बुद्धियां
1.श्रोत्रआकाशदोनों कर्णशब्दशब्दबुद्धि
2.स्पर्शनवायुत्वक्स्पर्शस्पर्शबुद्धि
3.चक्षुअग्निदोनों नेत्ररूपरूपबुद्धि
4.रसनाजलजिह्वारसरसबुद्धि
5.घ्राणपृथ्वीदोनों नासागन्धगन्धबुद्धि

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