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PRATYAKSHAPRAMAN NIROOPAN PART -2

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प्रत्यक्षप्रमाण – निरूपण

प्रत्यक्ष शब्द दो शब्दों – प्रति + अक्ष से मिलकर बना है ‘ प्रति ‘ का अर्थ है ‘ सामने ‘ और ‘ अक्ष ‘ का अर्थ है ‘ नेत्र ‘ अर्थात् जो नेत्र के सामने है वही ‘ प्रत्यक्ष ‘ है ।

किन्तु यहां ‘ अक्ष ‘ शब्द से केवल नेत्र ही नहीं अपितु इससे अन्य चारों ज्ञानेन्द्रियों – कर्ण , त्वचा , रसना और घ्राण को भी लिया गया है । क्योंकि ये भी शब्द , स्पर्श , रस और गन्ध के द्वारा अपना – अपना ज्ञान प्राप्त करते हैं , अत : प्रत्यक्ष के ही अन्तर्गत आते हैं ।

• लक्षण –
आचार्य चरक के मतानुसार – आत्मा , इन्द्रिय , मन और इन्द्रियार्थों ( शब्द , स्पर्श , रूप , रस और गन्ध ) का जब संयोग होता है , उसी समय ( व्यक्ता तदात्वे ) जो बुद्धि या ज्ञान उत्पन्न होता है उसे ‘ प्रत्यक्ष ‘ कहते है ।

प्रत्यक्ष प्रमाण के भेद –

यह दो प्रकार का होता है
१. सविकल्प ( Determinate ) और
२. निर्विकल्प ( Indeterminate ) |

१. सविकल्प ( Determination ) – इसमें वस्तु का नाम स्वरूप , जाति और गुण आदि का स्पष्ट और पूर्ण ज्ञान होता है , जैसे — यह व्यक्ति है , पशु है या पक्षी है ।
सविकल्पक प्रत्यक्ष प्रमाण के दो भेद है—
( क ) लौकिक ( Normal or usual ) और
( ख ) अलौकिक ( Abnormal or unusual ) प्रत्यक्ष ।

( क ) लौकिक ( Normal or usual ) प्रत्यक्ष – यह वह प्रत्यक्ष है जो लोक ( संसार ) व्यवहार में प्रचलित होता है । यह पुन : दो प्रकार का होता है –
१ . बाह्येन्द्रिय प्रत्यक्ष और
२. अन्तरिन्द्रिय प्रत्यक्ष ।
इन्हें बाह्य और आभ्यन्तर ( मानस ) प्रत्यक्ष भी कहते हैं।

१ . बाह्येन्द्रिय लौकिक- प्रत्यक्ष – पांचो ज्ञानेन्द्रियों ( कर्ण , त्वचा , चक्षु , रसना और प्राण ) द्वारा ग्रहण किये जाने के कारण यह पांच ( ५ ) प्रकार का होता है –
१. श्रवण प्रत्यक्ष ( Auditory Perception ) – यह प्रत्यक्ष कर्णेन्द्रिय द्वारा किया जाता है । इसके द्वारा शब्द का ज्ञान होता है ।
२. त्वक् प्रत्यक्ष ( Tactile Perception ) – यह ज्ञान त्वचा द्वारा किया जाता किया जाता है । है । इससे किसी भी द्रव्य की शीतलता , उष्णता , रूक्षता या खरता आदि गुणों का ज्ञान
३. चाक्षुष प्रत्यक्ष ( Visual Perception ) – यह प्रत्यक्ष अपने चक्षुरीन्द्रिय द्वारा रूप दर्शन करके किया जाता है ।
४. रासन प्रत्यक्ष ( Gustatory Perception ) – जब किसी द्रव्य का जिह्वा से संयोग होता है , तब इसे रासन प्रत्यक्ष कहते हैं ।
५. घ्राणज प्रत्यक्ष ( Olfactory Perception ) – जब किसी द्रव्य के गन्ध का ज्ञान किया जाता है , तब इसे घ्राणज प्रत्यक्ष कहते है ।

आभ्यन्तर लौकिक प्रत्यक्ष – इसे मानस प्रत्यक्ष ( Mental Perception ) भी कहते हैं , क्योंकि इसमें विषय को मन द्वारा ग्रहण किया जाता है । इसमें सुख , दुःख , इच्छा , द्वेष आदि का ज्ञान मन के द्वारा होता है ।

अलौकिक प्रत्यक्ष के भेद – यह तीन प्रकार का होता है-
1 ) सामान्यलक्षण प्रत्यासत्ति
2 ) ज्ञानलक्षणप्रत्यासत्ति
3 ) योगज

1)सामान्यलक्षण प्रत्यासत्ति –
जिस अलौकिक प्रत्यक्ष द्वारा किसी भी पदार्थ , जाति , वर्ग अथवा विषय के एक अंश का प्रत्यक्षात्मक ज्ञान होने पर उस सम्पूर्ण पदार्थ , जैसे एक गौ देखने से विश्व की समस्त गौ अथवा उसके वर्ग व जाति का ज्ञान हो जाता है ।

2) ज्ञानलक्षण प्रत्यासत्ति
जिस अलौकिक प्रत्यक्ष द्वारा किसी भी वस्तु की इन्द्रिय सन्निकर्ष किए दर्शन जनित ज्ञान के आधार पर ही उसके गुणों का ज्ञान हो जाता है , उसे ज्ञानलक्षणप्रत्यासत्ति कहते हैं । जैसे बर्फ को देखकर उसे स्पर्श किए बगैर उसकी ठंडक जान लेना ।

3) योगज
बिना यह स्पष्ट है कि समस्त ज्ञान इन्द्रियों द्वारा नहीं हो पाता है । उदाहरणस्वरूप भूत – भविष्य का ज्ञान , दूरस्थ दीवार एवं पीठ पीछे छिपी वस्तुओं का ज्ञान आदि । इन सभी का ज्ञान योगीजन अपने योगिक बल , समाधि प्रणिधान से ही करने में समर्थ होते हैं । यह दो प्रकार का होता है

१.युक्त
योगियों द्वारा प्राप्त किया हुआ ज्ञान जिसमें सदा बना रहता है , वह युक्त है ।

२.युन्जान
यह चिन्तापरक कहा गया है , क्योंकि इसमें चिन्तन कर समाधि द्वारा किसी वस्तु विशेष का ज्ञान होता है ।

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