PRASOOTI TANTRA

प्रसूति तंत्र

मनुष्य प्रकृति का उत्कृष्टतम सृजन है । जो अनादिकाल से विभिन्न प्राकृत परिस्थितियों से गुजरते हुए वर्तमान स्वरूप विद्यमान है ।

आहार , निद्रा तथा ब्रह्मचर्य के सही पालन न होने या अस्वभाविक होने तथा अन्य विभिन्न कारणों से मनुष्यों में रोग या विकार उत्पन्न होते हैं ।

ये विकार शारीरिक , मानसिक अथवा दोनों हो सकते है ।
इन रोगों के साथ ही साथ इनकी चिकित्सा का वर्णन दैवकाल में ब्रह्मा से लेकर आयुर्वेद के वर्तमान स्वरूप चला आ रहा है ।
आयुर्वेद के आठ अंगों में कौमारभृत्य अंतर्गत प्रसूतितंत्र एवं स्त्रीरोगों का वर्णन मिलता है । स्वस्थ समाज की परिकल्पना स्त्री , गर्भिणी स्त्री एवं उनके द्वारा उत्पन्न संतान के स्वस्थता के बिना अधूरा है ।