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PRAMTHYA

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प्रमथ्या

• परिभाषा :

“प्रमथ्या प्रोच्यते द्रव्यपलात् कल्कीकृताच्छृतात् । तोयेऽष्टगुणिते तस्याः पानमाहुः पलद्वयम् ।। “( शा . सं . म . ख . 2/150 )

अर्थात् 1 पल औषध द्रव्य के चूर्ण का कल्क बनाकर 8 गुना ( 8 पल = 384 मि.ली. ) जल में पकाकर , चतुर्थांश ( 2 पल ) शेष रहने पर छान लेना चाहिए , इसे प्रमथ्या कहते हैं ।

मात्रा : -इसकी मात्रा 2 पल ( 96 मि.ली. ) है ।

• क्वाथ एवं प्रमथ्या में अन्तरः

1. क्वाथ के निर्माण में औषध द्रव्य को यवकुट करके षोडश गुण जल में पकाकर अष्टमांश शेष रखते हैं जबकि प्रमथ्या में कल्क बनाकर अष्टगुण जल में पकाकर चतुर्थांश शेष रखते हैं ।

2. क्वाथ में औषध द्रव्य का क्वथन ( उबालना ) किया जाता है , जबकि प्रमथ्या में प्रकर्षण क्वथन किया जाता है ।

3. क्वाथ अकृतयूष है , जबकि प्रमथ्या को कृतयूष कहा गया है ।

• मुस्तादि प्रमथ्या

नागरमोथा एवं इन्द्रयव से निर्मित प्रमथ्या 2 पल की मात्रा में मधु मिलाकर पीने से रक्तातिसार को नष्ट करती है ।

• औषध सिद्धपानीयः

अर्थात् । पल ( 48 ग्राम ) औषध द्रव्य को यवकुट चूर्ण कर 64 पल ( 3.072 लीटर ) जल में मन्दाग्नि पर पाक करें । अर्धावशेष ( 32 पल ) जल रहने पर स्वच्छ वस्त्र से छान ले । यह औषधसिद्धपानीय कल्पना है ।

• प्रयोग

यह जल पीने तथा भात , पेया , यूष , यवागू आदि पथ्य कल्पना के निर्माण में प्रयोग किया जाता है । षडङ्गपानीय इस कल्पना का उदाहरण है ।

• षडङ्गपानीयः

नागरमोथा , पर्पट , उशीर , रक्तचन्दन , सुगन्धबाला , शुण्ठी इन छ : द्रव्यों के 1 कर्ष यवकुट चूर्ण को 64 कर्ष जल में डालकर अर्धशेष ( 32 कर्ष ) रहने तक उबालकर छान ले । यह षडङ्गपानीय है ।

उपयोगः- ज्वर तथा ज्वरजन्य पिपासा , दाह के शमनार्थ शीतल करके थोड़ा – थोड़ा ( 4 से 8 तोला ) दिन में 4 से 6 बार पिलावें ।

• उष्णोदक :

अर्थात् जल को अग्नि पर उबालकर अष्टमांश , चतुर्थांश , अर्धांश शेष रहने अथवा क्वथित ( अच्छी प्रकार उबाल लेना ) होने पर उतार लेना चाहिए , इसे उष्णोदक ( सिद्ध उष्णोदक ) कहते हैं । शार्ङ्गधर संहिता के टीकाकार आढ़मल्ल ने क्वथन का अर्थ त्रिपादशेष किया है ।

•उष्णोदक के गुण

अर्थात् रात्रि के समय उष्णोदक पीने से कफ , आमवात , मेदोरोग , कास , श्वास , ज्वर को नष्ट करता है , बस्ति का शोधन करता है और अग्निदीपन है ।

• तण्डुलोदकः

एक पल निस्तुष एवं कुटे हुए चावल को 8 गुना जल में डालकर उसे 6 घंटे पश्चात् मसलकर छान ले । इसे तण्डुलोदक ( तण्डुल जल ) कहते हैं ।

•प्रयोग : –

इसका प्रयोग श्वेतप्रदर , रक्तप्रदर आदि में प्रयुक्त औषध के अनुपान के रूप में करते हैं । यथा – पुष्यानुग चूर्ण का प्रयोग तण्डुलोदक के अनुपान के साथ करते हैं ।

मात्रा : -4 से 8 तोला

•  लाक्षा रस

एक पल लाक्षा ( पीपल की लाख ) को साफ कर एवं अपद्रव्यों ( मिट्टी , लकड़ी , कंकड़ आदि ) को पृथक् कर लें , तत्पश्चात् साफ एवं मोटे कपड़े में बाँधकर दोलायन्त्र में षड्गुण जल ( 6 पल ) भरकर मन्दाग्नि पर पाक करें । जब जल चतुर्थांश शेष रह जाये तो उतारकर वस्त्र से 21 बार छानने के बाद प्राप्त द्रव को लाक्षारस कहते हैं ।

• मात्रा : एक पल

• प्रयोग : – उरः क्षत एवं अस्थिभग्न आदि में सन्धानार्थ । लाक्षादि तैल निर्माण लाक्षारस से किया जाता है ।

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