fbpx

PRAMANA VIGYAN KA NIRUPANA

by

प्रमाण विज्ञान का निरूपण

निरुक्ति – ‘ प्रमीयते अनेन इति प्रमाणम् । ‘

अर्थात् जिसके द्वारा यथार्थ ( सत्य ) ज्ञान किया जाय , वह प्रमाण है।

प्रमाण का लक्षण – ‘ यथार्थानुभवः प्रमा , तत्साधनं प्रमाणम् ।

अर्थात् यथार्थ अनुभव या यथार्थ ज्ञान को प्रमा कहते हैं और जिन साधनों से इस यथार्थ ( वास्तविक ) ज्ञान की प्राप्ति होती है , उसे प्रमाण कहते हैं । इस यथार्थ ज्ञान को सत्य ज्ञान भी कहते हैं ।

प्रमाण के पर्याय –
आचार्य गंगाधर ने उपलब्धि , साधन , ज्ञान और परीक्षा आदि समान अर्थ वाले शब्दों को प्रमाण का पर्याय माना है ।

प्रमाणों के द्वारा यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति होती है , अत : इसे उपलब्धि कहा है ।
प्रमाण यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने का साधन है , अत : इसे साधन कहा है ।
प्रमाणों का उद्देश्य ज्ञान प्राप्त करना है , इसलिये यह ज्ञान के नाम से जाना जाता हैं।
प्रमाणों के द्वारा वस्तु के स्वरूप का ज्ञान प्राप्त किया जाता है , अत : इसे परीक्षा के नाम से जाना जाता है।

प्रमा ‘ ( Valid experience ) –
जो वस्तु जैसी है और जहां है उसको उसी रूप में , उसी प्रकार का , वही और यथार्थ रूप में ग्रहण करना या अनुभव करना ही ‘ प्रमा ‘ है ।
उदयनाचार्य ने भी यथार्थज्ञान को प्रमा कहा है ।

अप्रमा ( Invalid experience ) –
अयथार्थ ( मिथ्या ) ज्ञान को अप्रमा कहा गया है । कहने का तात्पर्य यह है कि जो वस्तु जैसी हो उसे वो न समझकर ( जो है ) कुछ अन्य समझना , जैसे — सांप को रस्सी समझना अप्रमा है ।

स्मृति – संस्कार मात्र से उत्पन्न ज्ञान को स्मृति कहते हैं । स्मृति ही कल्पना या विचार का आधार है । पूर्व का ज्ञान जब किसी वस्तु को देखकर जागृत हो जाता है तब इसे स्मृति कहते है ।

प्रमेय ( Object of Valid Experience )

वात्स्यायन के अनुसार – यथार्थ ज्ञान के विषय या अनुभव को ‘ प्रमेय ‘ कहते हैं।
जिनका प्रमाणों के द्वारा अनुभव किया जा सके , वह प्रमेय है।

प्रमाता –
सत्य ज्ञान के लिए जिस के अन्दर जिज्ञासा उत्पन्न होती है । प्रमाणों द्वारा जो उस ज्ञान को प्राप्त करने में प्रवृत्त होता है उसे प्रमाता कहते हैं । प्रमेय विषयों का ज्ञान करने वाले को प्रमाता कहते हैं । चेतन विकसित बुद्धि मनुष्य ही प्रमाता है ।

• प्रमाण •
वह साधन जिसके द्वारा ‘ प्रमाता ‘ ( Person ) ‘ प्रमेय ‘ ( Object ) का यथार्थ ज्ञान ( Real knowledge ) प्राप्त करता है वह ‘ प्रमाण ‘ है ।

• प्रमाण की संख्या
महर्षि चरक के अनुसार प्रमाण 4 हैं – आप्तोपदेश , प्रत्यक्ष , अनुमान और युक्ति
महर्षि सुश्रुत के अनुसार प्रमाण 4 हैं – आगम , प्रत्यक्ष , अनुमान और उपमान
महर्षि गौतम के अनुसार प्रमाण 4 हैं – प्रत्यक्ष , अनुमान , उपमान और शब्द
महर्षि कपिल के अनुसार 3 हैं- प्रत्यक्ष , अनुमान और आप्तवचन ।

1 thought on “PRAMANA VIGYAN KA NIRUPANA”

Leave a Comment

error: Content is protected !!