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PRAKRTIYAN

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प्रकृतियां

दोषज प्रकृतियां

गर्भस्थ शिशु की देह पिता के शुक्राणु तथा माता के शोणित ( अण्डाणु , डिम्ब ) के संयोग से बनती है । संयोग के समय शुक्राणु तथा डिम्ब में जो दोष प्रबल होते हैं उन्हीं के अनुसार शिशु की गर्भ में प्रकृति ( मानसिक एवं शारीरिक गठन ) बनती है और यह प्रकृति आजन्म बनी रहती है ।

“शुक्रशोणितसंयोगे यो भवेद्दोष उत्कटः ।
प्रकृतिर्जायते तेन तस्या मे लक्षणं शृणु ।।”( सु ० शा ० 4/62)

आयुर्वेद के अन्य संहिता ग्रन्थों में इन्हीं सात प्रकार की दोषज प्रकृतियों का वर्णन किया गया है । ये हैं पृथक् – पृथक् दोषों के अनुसार तीन प्रकार की
[ 1 ] वात – प्रकृति ,
[ 2 ] पित्त प्रकृति ,
[ 3 ] कफ प्रकृति ।
दो दोषों के संयोग से भी तीन प्रकार की ।
[ 4 ] वातपित्त प्रकृति ,
[ 5 ] वातकफ प्रकृति ,
[ 6 ] पित्तकफ प्रकृति तथा
तीनों दोषों के सम संयोग से एक प्रकार की ,
[ 7 ] समवातपित्तकफप्रकृति ।
जन्म से ही प्रत्येक व्यक्ति इन सातों प्रकृतियों में से किसी एक प्रकार की प्रकृति का स्वामी होता है ।

• वातप्रकृति पुरुष के लक्षण

“अल्पकेशः कृशो रूक्षो वाचालश्चलमानसः ।
आकाशचारी स्वप्नेषु वातप्रकृतिको नरः ।।”( शा ० पू ०6 / 20 )
वातप्रकृति पुरुष अल्पकेशयुक्त , कृश तथा रूक्ष शरीर वाला , वाचाल , चपल तथा स्वप्न में आकाश में विचरने वाला होता है ।

• पित्तप्रकृति पुरुष के लक्षण

“अकाले पलितैर्व्याप्तो धीमान् स्वेदी च रोषणः ।
स्वप्नेषु ज्योतिषां द्रष्टा पित्तप्रकृतिको नरः ।।”( शा ० पू ० 6/21 )
पित्तप्रकृति पुरुष के केश असमय में ही श्वेत हो जाते हैं , वह बुद्धिमान् होता है , स्वेद तथा क्रोध बहुत आता है , स्वप्न में अग्नियां देखता है ।

• कफप्रकृति पुरुष के लक्षण

“गम्भीरबुद्धिः स्थूलाङ्गः स्निग्धकेशो महाबलः ।
स्वप्ने जलाशयालोकी श्लेष्मप्रकृतिको नरः ।।”( शा ० पू ० 7/22 )
कफ प्रकृति पुरुष गम्भीर बुद्धि , स्थूल अंग , स्निग्ध केश , अति बलवान् तथा स्वप्न में जलाशयों को देखने वाला होता है ।

•सम एवं द्वन्द्वज प्रकृतियों के लक्षण

सम प्रकृति पुरुष में तीनों प्रकृतियों के उत्तम लक्षण तथा द्वन्द्वज प्रकृति वाले मनुष्यों में उन प्रकृतियों के सम्मिलित लक्षण मिलते हैं।

• मानस प्रकृतियां

मन की प्रकृति त्रिगुणात्मक होती है । इसमें जिस गुण की गर्भ अवस्था के समय प्रधानता होती है उसी का प्रभाव मानसिक क्रियाओं पर सबसे अधिक होता है ।
इस प्रकार जन्म से ही तीन प्रकार की मानसिक प्रकृतियां होती हैं
( 1 ) सात्त्विक प्रकृति , ( ऐसा व्यक्ति पवित्रता से रहता है ,आस्तिक बुद्धि रखता है, गुरुजनों बड़ों का आदर करता है ,लोग मोह काम क्रोध से रहित एवं सब प्राणियों पर समदर्शी रखने वाला है।)
( 2 ) राजस प्रकृति ( ऐसा व्यक्ति उग्र ,क्रोधी एवं निर्दय स्वभाव वाला ,भोजन में अकेला खाने वाला, घातक, परिश्रमी ,आहार प्रिय होता है।)
( 3 ) तामस प्रकृति( ऐसा व्यक्ति बुद्धि हीन नीच वेशभूषा युक्त मूर्ख झगड़ने वाला अत्यंत आलसी होता है।)

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