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PRABHAV

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प्रभाव

•निरुक्ति


"प्रभवति सामर्थ्यविशिष्टं भवति द्रव्यमनेन इति प्रभावः।"

जिसके कारण द्रव्य में विशिष्ट सामर्थ्य उत्पन्न होता है , उसे ‘ प्रभाव ‘ कहते हैं ।

•लक्षण


"रसवीर्यविपाकानां सामान्यं यत्र लक्ष्यते । विशेषः कर्मणां चैव प्रभावस्तस्य स स्मृतः ।।"( च.सू. 26.67)
"प्रभावोऽचिन्त्य उच्यते ।।" (च.सू. 26.70)

दो या दो से अधिक द्रव्यों के रसादि में अनुरूपता अर्थात् समानता रहते हुए भी जहाँ कर्मों की विशेषता देखी जाती है । वह कर्म प्रभावजन्य होता है ।

" रसादिसाम्ये यत् कर्म विशिष्टं तत् प्रभावजम् ।" (अ.ह.सू. 9.26)


रस एवं विपाक आदि की समानता होने पर भी उन उन द्रव्यों का जो प्रमुख कर्म होता है उसमें प्रभाव ही कारण है ।

"प्रभाव : स विशिष्टा या कर्मशक्तिः स्वभावजा । शिरीषस्य विषघ्नत्वं यथा हृद्यत्वमर्जुने ।।" ( प्रि.नि.द्रव्यादिवर्ग .47 )

द्रव्य की स्वाभाविक विशिष्ट शक्ति को प्रभाव ‘ कहते हैं । यथा शिरीष का विषघ्न और अर्जुन का हृद्य प्रभाव आदि ।

•पर्याय – विशिष्ट शक्ति , अचिन्त्य शक्ति, अमीमांस्य शक्ति ,अतर्व्य शक्ति, अनवधारणीय।

•उदाहरण


" कटुकः कटुक : पाके वीर्योष्णश्चित्रको मतः । तद्वदन्ती प्रभावात्तु विरेचयति मानवम् ।। विषं विषघ्जमुक्तं यत् प्रभावस्तत्र कारणम् ऊर्ध्वानुलोमिकं यच्च तत् प्रभावप्रभावितम् ।। मणीनां धारणीयानां कर्म यद्विविधात्मकम् । तत् प्रभावकृतं तेषां प्रभावोऽचिन्त्य उच्यते ।।"( च.सू. 26.68-70)

-चित्रक एवं दन्ती के समान गुणयुक्त होने पर भी दन्ती की विरेचन कार्मुकता
-विषों की विषघ्नता
-वमन द्रव्यों की ऊर्ध्व गति
-विरेचन द्रव्यों की अध : गति
-मणी आदि के कर्म आदि ।

प्रभावजन्य कर्मों का वर्गीकरण

  1. औषधीय कर्म
  2. अगदीय कर्म
  3. रक्षोघ्न कर्म
  4. मानस कर्म
  5. भौतिक कर्म

समान – प्रत्यारब्ध एवं विचित्र – प्रत्यारब्ध द्रव्य

•समान – प्रत्यारब्ध द्रव्य –
जिन द्रव्य विशेषों में द्रव्य और तदाश्रित रसादि का भौतिक संगठन समान हो उन्हें ‘ समान – प्रत्यारब्ध द्रव्य ‘ कहते । इन द्रव्यों में रसादि के अनुकूल ही कर्म होते हैं ।

विचित्र – प्रत्यारब्ध द्रव्य
जिन द्रव्य विशेषों में द्रव्य और तदाश्रित रसादि का भौतिक संगठन भिन्न – भिन्न हो उन्हें ‘ विचित्र – प्रत्यारब्ध द्रव्य हैं । इन द्रव्यों में रसादि से भिन्न प्रकार के कर्म होते हैं ।

प्रभाव का प्राधान्य
( सन्दर्भ- रसवैशेषिक 1.132-140 )
( 1 ) अचिन्त्यत्वात्
( 2 ) दैवीप्रतीघातात्
( 3 ) विषप्रतीघातात्
( 4 ) दर्शनाच्छ्रवणात्
( 5 ) तुल्यरसगुणेषु विशेषात्
( 6 ) दर्शनाच्चाद्भुतादीनां कर्मणाम्
(7 ) आगमात्

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