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PITTA KE VISHISHT KARAM

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पित्त के विशिष्ट कर्म

पित्त के भेद – “पित्तं पंचात्मकम् “।। (अ ० हृ ० सू ० 12/10 )

पित्त पांच प्रकार का होता है-

( 1 ) रञ्जक पित्त , ( 2 ) पाचक पित्त , ( 3 ) आलोचक पित्त , ( 4 ) साधक पित्त तथा ( 5 )भ्राजक पित्त ।

( 1 ) रञ्जक पित्त

“तेजो रसानां सर्वेषां मनुजानां यदुच्यते । पित्तोष्मणः स रागेण रसो रक्तत्वमृच्छति ।।”( च ० चि ० 25/27)

समस्त मनुष्य में रसों का अपना जो तेज है , उस तेज तथा पित्त की ऊष्मा के रञ्जन से रस रक्तता को प्राप्त होता है अर्थात् रस का कुछ अंश जो अपने विशेष रासायनिक संगठन के कारण रस का तेजस अंश कहलाता है पित्त की विशेष प्रकार की पाक क्रिया ( रंजन क्रिया ) के द्वारा रक्त में परिवर्तित हो जाता है ।

( 2 ) साधक पित्त

“बुद्धिमेधाऽभिमानाद्यैरभिप्रेतार्थसाधनात् । साधकं हृदयगतं पित्तम् ।।”( अ ० हृ ० सू ० 12/14)

हृदय में रहकर बुद्धि , मेधा व अभिमान आदि तथा सब मनोरथ सिद्ध करने वाले पित्त को साधक पित्त कहते हैं ।

( 3 ) आलोचक पित्त

“रूपलोचनतः स्मृतं दृस्थमालोचकम् ।।”

नेत्रों में रहकर रूप का दर्शन कराने वाले पित्त को आलोचक पित्त कहते कर है।

आलोचक पित्त के भेद
आचार्य भेल ने दो प्रकार के आलोचक पित्त का वर्णन किया है ।
“स ( आलोचकः ) द्विविधः चक्षुर्वैशेषिको बुद्धिवैशेषिकश्चेति “।
‘ आलोचक पित्त दो प्रकार का होता है- [ 1 ] चक्षुवैशेषिक तथा [ 2 ] बुद्धिवैशेषिक ।

( 4 )भ्राजक पित्त

“त्वस्थं प्राजकं भ्राजनात्त्वचः ।।”(अ ० हृ ० सू ० 12/14)

त्वचा में रहकर शरीर की प्रभा को प्रकाशित करने वाले पित्त को भ्राजक पित्त कहते हैं ।

( 5 ) पाचक पित्त

“अन्नस्य पक्ता सर्वेषां पक्तृणामधिपो मतः । तन्मूलास्ते हि तवृद्धिक्षयवृद्धिक्षयात्मकाः ।।”( च ० चि ०15 / 38)

अन्य अग्नियों ( पांच भूताग्नि तथा सात धात्वग्नियों ) में पाचक अग्नि प्रधान है । इसी अग्नि पर भूताग्नियां तथा धात्वग्नियां निर्भर हैं । पाचकाग्नि की वृद्धि होने पर अन्य अग्नियों की वृद्धि तथा पाचकाग्नि के क्षीण होने पर अन्य अग्नियों का क्षय होता है ।

•छाया तथा प्रभा में अन्तर-

छाया वर्ण पर छा जाती है तथा प्रभा वर्ण को प्रकाशित करती है । छाया निकट से दिखाई पड़ती है और प्रभा दूर से प्रकाशित होती है ।

“वर्णमाक्रामति च्छाया भास्तु वर्णप्रकाशिनी । आसन्ना लक्ष्यते छाया भाः प्रकृष्टा प्रकाशते ।।”( च ० इ ०7 / 15)
वर्णमाक्रामति च्छाया प्रभा वर्णप्रकाशिनी । आसन्ने लक्ष्यते छाया विकृष्टे भाः प्रकाशते ।। “(अ ० हृ ० शा 05 / 51)

छाया वर्ण पर छा जाती है तथा प्रभा वर्ण को प्रकाशित करती है । छाया पास से दिखाई देती है प्रभा दूर से प्रकाशित होती है ( कारण प्रभा तेज से उत्पन्न होती है तथा छाया पंचभूतात्मक है ) ।

•छाया तथा प्रतिच्छाया में अन्तर- जल , दर्पण आदि में जो छाया दिखाई देती है वह प्रतिच्छाया ( प्रतिबिम्ब ) कहलाती है ।
•छाया के प्रकार

“खादीनां पञ्च पञ्चानां छाया विविधलक्षणाः ।”( च ० इ ० 7 / 9 , अ ० हृ ० शा ०5 / 46)

( 1 ) आकाश , ( 2 ) वायु , ( 3 ) तेज , ( 4 ) जल तथा ( 5 ) पृथ्वी इन पांचों महाभूतों की पृथक् – पृथक् लक्षणों वाली छायायें होती हैं । अर्थात् छायायें पांच प्रकार की होती हैं ।

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