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PESHI SHARIR

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पेशी शरीर

•परिभाषा

शरीर में लाल रंग की रेशेदार आंकुचन और प्रसारणशील जो धातु हैं , उसी मांस पिण्ड को पेशी कहा जाता है ।

• स्वरूप

” यथार्थ उष्मणा युक्तो वायुः खोतांसि दारयेत् । ” ( सु.शा. ४/२७ ) “

“अनुप्रविष्य पिशितं पेशीः विभजते तथा । ” ( सु.शा. ४/२८ )

जिस प्रकार पित्त से युक्त वायु अपने प्रयोजन के अनुसार स्रोतों को खोलती है , उसी प्रकार पित्तयुक्त वायु मांस में प्रवेश करके , उसे पेशियों में विभाजित करती है ।

वायु मांस धातु में प्रविष्ट होकर उसे सूत्रों में विभाजित करता है , और पेशियों का निर्माण होता है ।

• स्थान

अर्थात् सम्बन्ध या Attachment- Origin- ( उद्गम ) and- Insertion ( निवेश ) ।

निम्न स्थानों पर पेशियों ( Muscles ) का सम्बन्ध ( Attachment ) होता है या पेशियाँ जुड़ी रहती हैं ।

• Bones

• Superficial fascia

• Cartilage

• Ligament

• Skin

• Deep fascia

•Other muscles

• संख्या

• आचार्य सुश्रुत के अनुसार पेशियों की संख्या- 500 है ।

• इसके अतिरिक्त आचार्य सुश्रुत स्त्रियों में पुरूषों की अपेक्षा पेशियाँ अधिक मानते हैं- 20

• आचार्य चरक के अनुसार पेशियों की संख्या- 400 है ।

• प्रकार और भेद

आयुर्वेद के अनुसार

१. ऐच्छिक पेशी

२. अनैच्छिक पेशी

३. हार्दिकी पेशी

1.ऐच्छिक पेशी  ( Voluntary muscles )

इन पर अनुप्रस्थ धाराएँ होती है । अत : उनको राजिला ited ) कहते हैं । इनका कार्य मस्तिष्क की प्रेरणा के अनुसार होता है । अत : परतन्त्र पेशी कहते हैं । इनका कम से कम एक सिरा किसी अस्थि से सम्बद्ध रहता है । इसी से इनको Skeletal muscles भी कहते हैं ।

ये विशेषतया ऊर्ध्व तथा अध : शाखाओं में पायी जाती हैं । वे प्राणियों की इच्छा से संकोचन या प्रसारण करती हैं ।

२. अनैच्छिक पेशी ( Involuntary muscles )

इन पर धाराएँ नहीं होती , अत : इन्हें अराजिला ( Unstriated ) कहते हैं । ये अस्थियों से सम्बन्ध नहीं रहती । ये पेशियाँ बिना किसी की इच्छा से , अपने आप ही क्रिया करती हैं , अतः इन्हें स्वतन्त्र पेशी कहते हैं ।

३. हार्दिकी पेशी ( Cardiac muscles )

यह एक तीसरा प्रकार भी पाया जाता है । ये पेशियाँ हृदय में रहती हैं । क्रिया की दृष्टि से तो ये स्वतन्त्र या अनैच्छिक हैं । परन्तु रचना की दृष्टि से ये राजिला ( Striated ) होती हैं । इन पर अनुप्रस्थ तथा अनुलम्ब धाराएँ होती है ।

अत : दोनों प्रकारों का संयोग इस पेशी में पाया जाता है ।

इसी से इनका तीसरा प्रकार माना जाता है ।

•  पेशियों के कार्य

१. शरीर में स्थित अस्थि , सन्धि , सिरा और स्नायूओं को पेशियाँ ढकती हैं ।

२. पेशियाँ ही शरीर के स्वरूप को दर्शाने का कार्य करती हैं ।

३. संधियों को बाँधने का कार्य करती हैं ।

४. शरीर के भीतरी अंगों की रक्षा करती हैं ।

५. शरीर को बल प्रदान करने का कार्य करती हैं ।

६. अस्थि , सन्धि आदि अंगों की अपेक्षा पेशियों में अधिक शक्ति होती है ।

७. पेशियाँ रक्त संचार के कार्य में सहायक होती हैं ।

८. शरीर की स्वतन्त्र और परतन्त्र दोनों प्रकार की गतियों में सहायक होती हैं।

९. हदय का स्पन्दन आदि पेशियों द्वारा सम्पन्न होता है ।

१०.शरीर का उठना , बैठना , चलना आदि क्रियाएँ स्वस्थ पेशियों द्वारा ही होती हैं।

११.अस्थि आदि को आवृत करके उनके कार्यों में सहायक हैं ।

१२.पेशियाँ आकुंचन का कार्य करती हैं ।

१३.पेशियाँ प्रसारण का कार्य करती हैं।

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