fbpx

PARINAMVAD & VIVARTAVAD

by

परिणामवाद तथा विवर्तवाद

•सत्कार्यवाद के भेद – सत्कार्यवाद् के दो भेद हैं –
१ . परिणामवाद और
२ . विवर्तवाद ।

१. परिणामवाद –

कारण का कार्य रूप में परिणत हो जाना ही उसका परिणाम है , जैसे — दूग्ध का दही में परिणत हो जाना या तिल का तैल के रूप में परिणत हो जाना । यह वाद सांख्य के कार्य – कारणवाद पर ही आधारित है ।

अव्यक्त ( प्रकृति ) को सृष्टि का मूल कारण कहा है । मूल प्रकृति से सृष्टि की उत्पत्ति को प्रकृति ( कारण ) का परिणाम माना है , जैसे — दूध से दही का बनना । वास्तव में यहां दही दूध का ही कार्य ( परिणाम ) है यही ‘ परिणामवाद ‘ है ।

आम्र फल का कच्चा ( आमावस्था ) रहने पर उसका वर्ण हरा और अम्ल होता है ।
किन्तु काल व्यतीत होने पर जब वह पाकावस्था में आता है तब उसका वर्ण पीला और रस का मधुर होना ‘ परिणामवाद ‘ का ही परिचायक है ।

•परिणामवाद दो प्रकार का हैं —
१ . धर्म परिणाम और
२. लक्षण परिणाम ।

१. धर्मपरिणाम – गुण के परिवर्तन को धर्मपरिणाम कहते हैं , जैसे – खाद्य द्रव्य का रस में रस का रक्त में , रक्त का मांस आदि में परिणत होना ।

२. लक्षणपरिणाम – यहां गुण में परिवर्तन न होकर केवल बाहरी रूप में परिवर्तन होता है ,
जैसे – जल का बर्फ बन जाना यहां केवल रूप बदला है गुण नहीं अत : यह लक्षण परिणाम है ।

२. विवर्तवाद- ” विवर्त ‘ से तात्पर्य है मिथ्या ( भ्रम या भ्रांति ) ज्ञान होना । यहां तत्त्व का वास्तविक ज्ञान न होकर मिथ्याज्ञान होता है ,

जैसे — रस्सी को सांप के रूप मेंदेखना । वास्तव में रस्सी सांप नहीं है किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि रस्सी न होकर सांप ही है । इसी प्रकार ब्रह्म ही सत्य है यह संसार विवर्त ( भ्रम ) है ।

‘ सांख्य – परिणामवाद ‘ को मानता है जबकि ‘ वेदान्त – विवर्तवाद ‘ को मानता है।

Leave a Comment

error: Content is protected !!