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PARIBHASHA PRAKRAN

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परिभाषा प्रकरण

आवाप : – किसी भी पिघलने वाली वङ्गादि धातु को पिघलाकर उसमें किसी अन्य द्रव्य का प्रक्षेप डालने को आवाप या प्रतिवाप कहते है ।

निर्वाप : – किसी भी लोहा , ताम्र , रजतादि धातु को अग्नि में तपाकर जल , तक्र , क्वाथ , दुग्ध आदि में बुझाने को निर्वाप , निषेक और स्नपन कहते है ।

ढालन : – रसकर्म विशारदों ने सोना , चाँदी आदि धातु को पिघलाकर उसको किसी भी द्रव ( यथाः – दुग्ध , तैल , घी , स्वरस , क्वाथ , फाण्ट ) में ढाल देने को ढ़ालन कहा है ।

भावना : – धातु आदि किसी भी औषध के चूर्ण को द्रव पदार्थ ( जल , स्वरस , क्वाथ , फाण्ट , दुग्ध , तैल , घृतादि ) के साथ खल्व में मर्दन करके सुखाने की क्रिया को भावना कहते है ।

जारणा –  विभिन्न यंत्रों की सहायता से पारद में गंधक आदि को जीर्ण करना जारणा कहलाता है।

 मूर्च्छना : – जब पारद अपनी गुरुता एवं चञ्चलता त्यागकर कज्जली जैसा हो जाये , उसे मूर्च्छना कहते है । यह अनेक वर्ण का हो सकता है । पारद में निश्चित व्याधिनाशक शक्ति का आधान करना ही मूर्च्छना कहलाता है ।

शोधनः- किसी भी द्रव्य के मल को दूर करने के लिए बताई गई औषधियों के साथ मिलाकर मर्दन , स्वेदन , प्रक्षालन , निर्वाप , ढालन , आवाप , भावना , भर्जन आदि क्रियाओं के करने को शोधन कहते है ।

मारण – लौह धातु आदि द्रव्यों को वनस्पतियों के स्वरसादि से मर्दन करके अग्नि संयोग द्वारा भस्म करने की क्रिया को मारण कहते है ।

अमृतीकरण : – धातुओं आदि की भस्म करने के पश्चात् भी उसमें शेष रहे हुए दोषों को दूर करने वाले संस्कार को अमृतीकरण कहते है । अमृतीकरण से गुण की वृद्धि तथा वर्ण की हानि होती है ।

लोहितीकरण : – अमृतीकरण से भस्म में वर्ण हानि होती है । अतः रक्तवर्ण उत्पन्न करने के लिए भस्म में जो क्रिया की जाय , उसे लोहितीकरण कहते है । यथा अभ्रक भस्म का अमृतीकरण करने पर वर्ण काला हो जाता है , अतः अभ्रक भस्म का लोहितीकरण किया जाता है ।

मृतलौहः- किसी भी धातु की भस्म को तर्जनी और अंगुष्ठ के बीच मलने पर यदि वह भस्म अंगुली की रेखाओं में घुस जाय और पोंछने पर भी भस्म का सूक्ष्म अंश रेखाओं में रह जाये , उस भस्म को मृतलौह कहते है ।

सत्त्वपातन : – क्षारवर्ग , अम्लवर्ग , द्रावकगण की औषधियों के साथ किसी धातु खनिज , रत्न या अन्य द्रव्य को मर्दन कर , गोलक बनाकर , सुखाकर , मूषा में रखकर , सत्त्वपातन कोष्ठी में तीव्र धमन करने से मूल पदार्थ का जो साररूप पदार्थ प्राप्त होता है , उसे सत्त्व कहते है ।

कज्जली : – द्रव पदार्थ के बिना शुद्ध पारद और शुद्ध गन्धक अथवा किसी धातु के साथ पारद डालकर मर्दन करने पर सुश्लक्ष्ण कज्जल की आभा वाला चूर्ण तैयार होता है , उसे कज्जली कहते है ।

शुद्धावर्त : – जब अग्नि अच्छी तरह प्रज्वलित होकर श्वेतवर्ण के प्रकाश के साथ चमकने लगती है तब उसे शुद्धावर्त कहते है । इस तापक्रम पर प्रायः सभी धातुओं का सत्त्व निकलता है ।

बीजावर्त : – जब धातुओं को द्रवित करने के लिए , धमन करने से द्रवित किये जाने वाले द्रव्य के अनुरूप ज्वाला निकले और द्रव्य ( धातु ) का द्रवीभूत होना प्रारम्भ हो जाये , उसे बीजावर्त कहते है ।

बीजावर्त के बाद शुद्धावर्त की स्थिति आती है । सत्त्वपातन की प्रक्रिया बीजावर्त की स्थिति में ( द्रवीभवन ) शुरु होकर शुद्धावर्त की स्थिति में पूर्ण होती है ।

द्रुतिः- विशिष्ट औषधियों के संयोग तथा तीब्रधमन के योग से स्वर्णादि धातु या अन्य खनिज द्रव्य द्रवीभूत होकर द्रवावस्था में रह जाये , तब उस द्रवीभूत अवस्था को मूल पदार्थ की द्रुति कहते है । ‘

द्रुतिलक्षण : – पात्र में न चिपकना , द्रवरूप में रहना , चमकदार होना , मूलपदार्थ से हल्का होना और पारद से अलग रहना उत्तमद्रुति के पाँच लक्षण होते है ।

रुद्रभाग : – व्यापारी लोगों से जो औषधियाँ वैद्यों या उसके रोगियों के द्वारा खरीद ली जाती थी , उनके मूल्य का ग्यारहवाँ भाग वैद्य लोग व्यापारी से वसूल करते थे । वैद्य को मिलने वाले इस ग्यारहवें भाग को रुद्रभाग कहते हैं । ‘

धन्वन्तरि भागः- सिद्ध किये हुए रस , तैल और घृत इनका आधा भाग , अवलेह का आठवाँ भाग तथा सब प्रकार की धातुओं की भस्म , काष्ठौषधियों के चूर्ण , वटी , मोदक आदि का सातवाँ भाग , इस प्रकार अन्य गरीब लोगों के लिए रोगी के खर्चे से तैयार औषधि का यह भाग आरोग्य सुख की प्राप्ति के लिए धन्वन्तरि के नाम से वैद्य को दिया जाता है , उसको धन्वन्तरि भाग कहते हैं । ‘

अपुनर्भव : – किसी धातु भस्म को मित्रपञ्चक ( गुड़ , गुञ्जा , टंकण , मधु और घृत ) के साथ मिलाकर धमन करने पर भस्म में कोई परिवर्तन न हो ( पुनः धातुरूप में न आये ) , तो उसे अपुनर्भव भस्म कहते है ।

निरुत्थ : – किसी भी लौह आदि धातु भस्म को चांदी के टुकड़े के साथ मिलाकर मूषा में रख धमन करने से उस भस्म का थोड़ा अंश भी यदि चांदी के साथ नहीं चिपकता है , उस भस्म को निरुत्थ भस्म कहते है ।

रेखापूर्ण : – तर्जनी और अंगुष्ठ के बीच में भस्म को रगड़ने पर रेखाओं में प्रवेश कर जाय , उस मृतलौह को रेखापूर्ण भस्म कहते है । रेखापूर्ण सूक्ष्मता का प्रतीक है ।

वारितर- यदि किसी धातुभस्म को तर्जनी और अंगुष्ठ से दबाकर निस्तरंग जल में डालने पर तैरती रहे , उसे वारितर भस्म कहते है ।

उत्तम ( ऊनम ) : – अपुनर्भव भस्म को सूक्ष्म पीसकर जल में डालने पर तैरता रहता है । तैरते हुए उस भस्म के ऊपर गुरु द्रव्य ( धान्य आदि ) का कण छोड़ने पर वह धान्यादि अन्न हंस के समान तैरता रहता है , तब ऐसे भस्म को उत्तम भस्म कहते है

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