fbpx

PANCHVIDH KASHAY KALPANA

by

पंचविध कषाय कल्पना

कषाय की परिभाषा :

“कण्ठस्य कषणात् प्रायो रोगाणां वाऽपि कर्षणात् ।

कषायशब्दः प्राधान्यात् सर्वयोगेषु कल्प्यते ।। ( का . सं . खिल 3/29 )

अर्थात् सेवन करते समय कण्ठ में लगने के कारण या कण्ठ के लिए अहितकर होने के कारण तथा रोगों का कर्षण करने के कारण सम्पूर्ण योगों ( कल्पनाओं ) में कषाय शब्द का प्रयोग होता है ।

पञ्चकषाय योनियाँ : –

पञ्चविध कषाय कल्पना लवण रस को छोड़कर मधुर , अम्ल , कटु , तिक्त एवं कषाय रस वाले द्रव्यों से निर्माण की जा सकती है । अतः इन्हें पंचकषाय योनि कहते हैं । यथाः- 1.मधुरकषाय योनि ,

2. अम्लकषाय योनि ,

3.कटुकषाय योनि ,

4. तिक्तकषाय योनि और

5. कषायकषाय योनि

“ पञ्चकषाययोनय इति मधुरकषायः , अम्लकषायः , कटुकषायः , तिक्त कषायः , कषायकषायश्चेति तन्त्रे संज्ञा ” । ( च . सू . 4/6 )

लवण की कोई भी कल्पना नहीं बन सकती है , इसलिए उसको लवणकषाय की संज्ञा नहीं दी गई है । क्योंकि इससे स्वरस नहीं निकल सकता है , क्योंकि लवण हमेशा सूखा ही प्राप्त होता है , जल मिलाने पर पूरा लवण जल में घुल जाता है । इससे कल्क , क्वाथ , हिम और फाण्ट आदि कल्पना भी नहीं बन सकती है ।

किसी औद्भिद , जाङ्गम या पार्थिव द्रव्यों को स्वरस , कल्क , क्वाथ , चूर्ण , अवलेह आदि कल्पना किये बिना मूल रूप ( प्राकृतिक अवस्था ) में शरीर पर प्रयोग नहीं किया जा सकता है ।

जिन विधियों ( चूर्ण , कल्क , स्वरस , क्वाथ , वटी , आसव , अरिष्ट आदि ) द्वारा द्रव्यों को आहार एवं औषधार्थ प्रयोग किया जाता है , उन्हें कल्प या कल्पना कहते हैं ।

कषाय कल्पना पाँच प्रकार की होती है –

1 . स्वरस ,

2. कल्क ,

3. क्वाथ ,

4. हिम और

5. फाण्ट ।

” पथविधं कषायकल्पनमिति तद्यथा – स्वरसः , कल्कः , श्रृतः , शीतः , फाण्टश्चेति कषाय इति ” । ( च . सू . 4/7 )

अब हम आगे इन पांचो कषाय कल्पनाओं का विस्तार पूर्वक वर्णन पढ़ेंगे

Leave a Comment

error: Content is protected !!