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PANCHTANTRA

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पंचतंत्र

  1. लोभाविष्ट – चक्रधर – कथा भाग 1

“कस्मिंश्चिदधिष्ठाने चत्वारो ब्राह्मणपुत्राः परस्परं मित्रतां गता वसन्ति स्म । ते चाऽपि दारिद्रचोपहताः परस्परं चक्रु : – ” अहो , धिगियं दरिद्रता । उक्तञ्च –

अनुवाद – किसी स्थान पर आपस में मित्रभाव को प्राप्त हुए चार ब्राह्मण पुत्र रहते थे । निर्धनता से युक्त हुए उन्होंने भी आपस में मन्त्रणा की – अरे ! इस दरिद्रता को धिक्कार है । ‘ कहा भी गया है –

“वरं वनं व्याघ्रगजादिसेवितं
जनेन हीनं बहुकण्टकावृतम् ।
तृणानि शय्या परिधानवल्कलं न
बन्धुमध्ये धनहीनजीवितम् ।।२२ ।।”

अनुवाद – शेर , हाथी आदि के निवास करने वाले स्थान में , लोगों से रहित , बहुत से कांटों से भरा हुआ वन , तिनकों की शय्या ( पर सोना ) वल्कलवस्त्र ( धारण , करना ) अच्छा है , ( किन्तु ) अपने बन्यु – बान्धयों के बीच धनहीन जीवन जीना ठीक नहीं है ।

“स्वामी द्वेष्टिः सुसेवितोऽपि , सहसा प्रोज्झन्ति सद्बान्धवा , राजन्ते न गुणास्त्यजन्ति तनुजाः , स्फारीभवन्त्यापदः ।
भार्या साधु सुवंशजाऽपि भजते नो , यान्ति मित्राणि च न्यायारोपितविक्रमाण्यापि नृणां , येषां न हि स्याद्धनम् ।।२३ ।।”

अनुवाद – वस्तुतः जिन लोगों के पास धन नहीं होता है , भली प्रकार सेवा किया गया भी स्वामी ( उनसे ) द्वेष करता है । उत्तम बधुजन भी अचानक ( उनको ) छोड़ देते हैं । गुण ( भी )सुशोभित नहीं होते हैं । पुत्र त्याग देते हैं । विपत्तियाँ अत्यधिक बढ़ जाती है उच्चकुल में उत्पन्न हुई भी पत्नी भली प्रकार सेवा नहीं करती है । न्यायोचित मार्ग पर चलने वाले मित्र भी ( छोड़कर ) चले जाते हैं।

” शूरः सुरूपः सुभगश्च वाग्मी , शस्त्राणि विदाङ्करोतु ।
अर्थ विना नैव यशश्च मान , प्राप्नोति मोऽत्र मनुष्यलोके ।।२४ ।।”

अनुवाद – इस मनुष्य लोक में व्यक्ति पराक्रमी , सुन्दर , सौभाग्यशाली , शस्त्रज्ञान तथा वाणी की चतुरता को तो प्राप्त लेता है , ( जिन्तु ) धन के बिना यश तथा मान को प्राप्त नहीं करता है ।

“तानीन्द्रियाण्यविकलानि तदेव नाम ,
सा बुद्धिरप्रतिहता , वचनं तदेव ।
अर्थोष्मणा विरहितः पुरुषः स एव ,
बाह्यः क्षणेन भवतीति विचित्रमेतत् ।।२५ ।।”

अनुवाद – वे ही विकलता स्वस्थ्य इन्द्रियाँ है , वही वस्तुत : नाम है , वही बिना रोक टोक जाने वाली बुद्धि ( है ) , वही वचन है , ( फिर भी ) धन की गर्मी से रहित वही पुरूष क्षणभर में अन्य हो जाता है , यह विचित्र ( है ) ।

“तद्गच्छामः कुत्रचिदर्थाय । इति सन्मन्त्र्य स्वदेशं पुरश्च , स्वसुहृत्सहितगृहश्च परित्यज्य प्रस्थिताः । अथवा साध्विमुच्यते –

अनुवाद – तो धन कमाने के लिए कहीं भी चलते हैं , इस प्रकार विचार कर अपने देश तथा नगर एवं मित्रों सहित घर को छोड़कर चल दिये । अथवा यह ठीक ही कहा जाता है –

“सत्यं परित्यजति मुञ्चति बन्धुवर्ग ,
शीघ्रं विहाय जननीमपि जन्मभूमिम् ।
सन्त्यज्य गच्छति विदेशमभीष्टलोक ,
चिन्ताकुलीकृतमति : पुरूषोन लोके ।।२६ ।।”

अनुवाद – इस संसार में अर्थिक चिन्ता से व्याकुल बुद्धि वाला व्यक्ति सत्य को त्याग देता है , बन्धुबान्धव छोड़ देते हैं . माता को भी छोड़कर ( तथा ) अत्यधिक अच्छे लगने वाले स्थान को छोड़कर के शीघ्र ही परदेश में चला जाता है ।

एवं क्रमेण गच्छन्तोऽवन्तीं प्राप्ता । तत्र शिप्राजले कृतस्नाना महाकाल प्रणम्य यावन्निर्गच्छति तावद् भैरवानन्दो नाम योगी सम्मुखो बभूव । ततस्तं ब्राह्मणोचित विधिना सम्भाव्य , तेनैव सह तस्य मठं जग्मुः । अथ तेन पृष्टाः – ” कुतो भवन्तः समायाता 😕 क्व यास्यथ ? किम्प्रयोजनम् ?

ततस्तैरभिहितम् – “ वयं सिद्धियात्रिकाः , तत्र यास्यामो यत्र धनाप्तिर्मृत्यु भविष्यतीत्येष निश्चयः । उक्तञ्च –

अनुवाद – इस प्रकार एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हुए अवन्ती में पहुंचे । वहाँ शिप्रा नदी के जल में स्नान करके , महाकाल को प्रणाम करके जैसे ही निकले , वैसे ही भैरवानन्द नामक योगी से ( उनका ) सामना हुआ । तब ब्राह्मणोचित विधि द्वारा उसका सम्मान करके , उसी के साथ उसके मठ में गए । तब उसने पूछा- आप कहाँ से आये हैं ? कहाँ जाएँगे ? क्या उदेश्य है ? तब उन्होंने कहा हम सिद्धियात्री ” है , वहाँ जाएँगे जहाँ धन की प्राप्ति अथवा मृत्यु होगी , बस यही निश्चय है । कहा भी गया है –

“दुष्प्राप्यानि बहूनि च लभ्यन्ते वांछितानि द्रविणानि । अवसरतुलिताभिरलं तनुभिः साहसिकपुरूषाणाम् ।।२७ ।। “

अनुवाद- साहसिक लोग उचित समय पर दांव पर लगाए गए शरीरों से कठिनता से प्राप्त करने योग्य बहुत से धनों को प्राप्त कर लेते हैं , उसी के साथ उनकी इच्छित वस्तुएँ भी प्राप्त हो जाती है ।

“पतति कदाचिन्नभसः खाते पातालतोऽपि जलमेति । दैवमचिन्त्यं बलवद् बलवान्ननु पुरूषकारोऽपि ।।२८ ।।”

अनुवाद – कभी जल आकाश से जलाशय में गिरता है ( तथा कभी ) पाताल से भी आता है , ( इसलिए ) नि : सन्देह भाग्य ( तो ) बलवान् होता ( ही ) है , किन्तु पुरुषार्थ भी बलवान् ( होता है ) ।

” अभिमतसिद्धिरशेषा भवति हि पुरूषस्य पुरूषकारेण । दैवमिति यदपि कथयसि पुरुषगुणः सोऽप्यदृष्टाख्यः ।।२९ ।।”

अनुवाद – पुरुषार्थ के द्वारा ही सम्पूर्ण इच्छित पदार्थों की प्राप्ति होती है । साथ ही (तुम ) जिसे ‘ दैव ‘ इस रूप में कहते हो वह भी ( तो ) दिखाई देने वाला पुरुष का ही गुण होता है ।

“द्वयमतुलं गुरूलोकातूणमिव तुलयन्ति साधु साहसिकाः । प्राणानद्भुतमेतच्चरित चरितं खुदाराणाम्।।३० ॥”

अनुवाद – साहसी लोग प्राणों को तिनके के समान समझकर दाँव पर लगा देते हैं । वस्तुतः ( उनका ) यह आचर्यजनक साहस एवं उदार लोगों का आचरण दोनों ( ही ) सामान्य लोगों की अपेक्षा महत्वपूर्ण एवं अनुपम होता है ।

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