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PANCHATATRAM

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सिंहकारक – मूर्खब्राह्मण – कथा

” कस्मिंश्चिदधिष्ठाने चत्वारो ब्रह्मणपुत्राः परस्परं मित्रभावमुपगता वसिन्त स्म । तेषां त्रयः शास्त्रपारङ्गत्ता , परन्तु बुद्धिरहिताः । एकस्तु बुद्धिमान् केवलं शास्त्रपरागमुखः । अथ तैः कदाचिन्मित्रैमन्त्रित – ‘ को गुणो विद्यायाः , येन देशान्तरं गत्वा भूपतीन् परितोष्याऽर्थोपार्जनः न क्रियते , तत्पूर्वदशं गच्छामः ।

तथाऽनुष्ठिते किश्चिन्मार्ग गत्वा , तेषां ज्येष्ठतरः प्राह- ” अहो , अस्माकमेकञ्चतुर्थों मूढः केवलं बुद्धिमान् । न च राजप्रतिग्रहो बुद्धचा लभ्यते , विद्यां विना । तन्नास्मै स्वोपार्जितं दास्यामि तद्गच्छतु गृहम् । ”

ततो द्वितीयेनाऽभिहितम् – ‘ भो : सुबुद्धे ! गच्छ त्वं स्वगृहे , यतस्ते विद्या नास्ति । ततस्तृतीयेनाऽभिहितम् – ‘ अहो न युज्यते एवं कुर्तम् ‘ यतो वयं बाल्यात्प्रभृत्येकत्र क्रोडिताः । तदागच्छतु महानुभावोऽस्मटुपार्जितवित्तस्य समभागी भविष्यतीति । उक्तञ्च –

अनुवाद- किसी स्थान पर मित्र रुप में चार ब्राह्मणपुत्र रहते थे । उनमें से तीन शास्त्रों में पाङ्गत , किन्तु बुद्धिहीन थे ( तथा ) एक केवल बुद्धिमान् , किन्तु शास्त्रज्ञान से रहित था । इसके स्थत् उन सभी मित्रों ने कभी ( आपस में ) विचार किया – ( उस ) विद्या से क्या लाभ ? जिसके द्वारा दूसरे देशों में जाकर राजाओं को सन्तुष्ट करके धनोपार्जन न किया जाए । इसलिए पूर्व के देश की ओर चलते हैं ।

वैसा करने पर कुछ दूर जाकर , उनमें से सबसे बड़ा बोला ” अरे हममें से एक चौथा मूर्य है , केवल बुद्धियुक्त है तगा राजा की कृपा विद्या के बिना ( केवल ) बुद्धि द्वारा प्राप्त नहीं होती है । इसलिए अपने डारा कमाया हुआ धन में इसे नहीं दूंगा । अत : ( यह ) घर लौट जाये ।

तब दूसरे ने कहा – ” अरे ! सुबुद्धि , तुम अपने घर जाओ , क्योकि तुम्हारे पास कोई विधा नहीं है । ” पुनः तीसरे ने कहा – ” अरे ! इस प्रकार करना ठीक नहीं है , क्योंकि बाल्यकाल से लेकर हम एक साथ खेले है । तो ( यह ) महानुभाव भी ( हमारे साथ ) आये ( यह भी ) हमारे द्वारा फमाए हुए धन में समान भागी होगा कहा भी गया है –

“किन्तया क्रियते लक्ष्म्या या वधुरिव केवला ।
या न वेश्येव सामान्या पथिकैरूपभुज्यते।।३६ ।। “

अनुवाद- उस लक्ष्मी से क्या किया जाए ? जो केवल वधू के समान ( स्थित रहती है ) सामान्य वेश्या के समान जो पथिकों द्वारा भोगी नहीं जाती है ।

“अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानान्तु वसुधैव कुटुम्बकम् ।।३७ ।।”

अनुवाद- ‘ यह अपना अथवा ( यह ) पराया है । इस प्रकार की गणना छोटे मन वाले लोगों की ( होती है ) , उदारचरित वालों के लिए तो ( सम्पूर्ण ) पृथ्वी ही परिवार ( होती है ) ।

“तदागच्छत्वेषोऽपि इति ।
तथाऽनुष्ठिते तैमर्मागत्रितैरटव्यां कतिनिदस्थीनि दृष्टानि । तत्तशैकेनाऽभिहितम् अहो , अद्य विद्याप्रत्ययः क्रियते । किशिदेतत्सत्त्वं मृतं तिष्ठति । तद् विद्याप्रभावेण जीवनसहितं कुर्मः । ततश्च तेनौत्सुक्यादस्थिसञ्चयः कृतः । द्वितीयेन चर्ममांसरूधिर संयोजितम् । तृतीयोऽपि यावज्जीवनं सञ्चारयति तावत्सुबुद्धिना निषिद्ध : – ” भो , तिष्ठतु भवान् । एष सिंहो निष्पाद्यते , ययेनं सजीवं करिष्यति ततः सर्वानपि व्यापादयिष्यति । “

इति तेनाऽभिहितः स आह – ” धिमूर्ख ! नाऽहं विद्याया विफलता करोमि । ” ततस्तेनाऽभिहितम् – ‘ तर्हि प्रतीक्षस्व क्षणं , यावदहं वृक्षमारोहामि । ‘

तथाऽनुष्ठिते , यावत्सजीवः कृतस्तावत्ते त्रयोऽपि सिंहेनोत्थाय व्यापादिताः । स च पुनर्वृक्षादवतीर्य , गृहं गतः । ” अतोऽहं ब्रवीमि – ‘ वर बुद्धिर्न सा विद्या ‘ इति । अत परमुक्तञ्च सुवर्णसिद्धिना –

अनुवाद – इसलिए यह भी ( हमारे साथ ) आवे ।

वैसा करने पर मार्ग में स्थित उन्हें जंगल में कुछ हड्डियाँ दिखाई दी । तब एक ने कहा ‘ अरे ! आज विद्या की परीक्षा कर ली जाए । यह कोई प्राणी मरा हुआ पड़ा है । तो ( अपनी ) विद्या के प्रभाव से ( इसे ) जीवित करते हैं । मैं हड्डियों को इकत्र करता हूँ और तब उसने उत्सुकतायरा अस्थियों को इकट्ठा कर लिया । दूसरे ने ( उसको ) चर्म , मांस और रूधिर से संयुक्त कर दिया । तीसरा भी जब जीवन का संचार करने लगा तो ( उसे ) सुबुद्धि ने रोका- ” अरे ! आप ठहरिये । यह ( तो ) सिंह बनाया जा रहा है . यदि ( आप ) इसे जीवित कर देंगे तो ( यह हम ) सभी को मार डालेगा । “

उसके द्वारा इस प्रकार कहा गया वह बोला – ” हे मूर्ख । ( तम्हें ) धिक्कार है । में ( अपनी ) विद्या के निष्फल नहीं करूंगा । तब उसने कहा- ” तो क्षणभर प्रतीक्षा करो , जब तक मैं वृक्ष पर चढ़ जाता हूँ । ” ( उसके ) वैसा करने पर जैसे ही ( उसे ) जीवित किया गया , वसे ही शेर ने उठकर ( उन ) तीनों को मार डाला और फिर वह वृध से उतरकर घर चला गया । इसलिए मैं कहता हूँ – ” बुद्धि श्रेष्ठ है , वह विद्या नहीं इत्यादि इसके पश्चात् सुवर्णसिद्धि ने कहा –

“अपि शास्त्रेषु कुशला लोकाचारविवर्जिताः ।
सर्वे ते हास्यतां यान्ति , तथा ते मूर्खपण्डिताः।।३८ ॥”

अनुवाद- शास्त्रों में निपुण होते हुए भी लोकव्यवहार से शून्य वे सभी उपहास को प्राप्त होते हैं , जिस प्रकार वे मूर्खपण्डित बने थे

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