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PANCHATRA

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पंचतंत्र

  1. लोभाविष्ट – चक्रधर – कथा भाग 2

“क्लेशस्याऽङ्गमदत्त्वा सुखमेव सुखानि नेह लभ्यन्ते । मधुभिन्मथनायस्तैराश्लिष्यति बाहुभिर्लक्ष्मीम् ।।३१ ।। “

अनुवाद- इस संसार में शरीर को कष्ट दिये बिना आसानी से सुख प्राप्त नहीं किये जाते हैं , क्योंकि ) भगवान् विष्णु ( समुद ) मन्थन से थकी हुई भुजाओं द्वारा ही लक्ष्मी का आलिङ्गन करते हैं ।

“तस्य कथं न चला स्यात् पत्नी विष्णोर्नृसिंहकस्याऽपि । मासांश्चतुरो निद्रा र सेवति जलगतः सततम् ।।३२ ।।”

अनुवाद – नृसिंह अवतार भगवान् विष्णु की भी पत्नी क्यों चचल नहीं होगी । जो चार महीनों तक निरन्तर जल में स्थित हुए निद्रा का सेवन करते हैं ।

“दुरधिगमः परभागो यावत्पुरुषेण साहस न कृतम् ।
जयति तुलामधिरूडो भास्वानिह जलदपटलानि ।३३ ।। “

अनुवाद- जब तक पुरूष सहस नहीं करता है , तब तक ही विजय प्राप्ति दुर्लभ होती प्राप्त करता है है । इस संसार मे तेजस्वी सूर्य ( भी ) तुल राशि पर आरूढ़ होकर ही बादलों के समूह पर विजय प्राप्त करता है।

“तत्कथ्यतामस्माकं कश्चिद्धनोपायो विवरप्रवेशशाकिनी साधनश्मशानसेवन महामांसविक्रयसाधकवर्तिप्रभृतीनामेकतम ‘ इति । अद्भुतशक्तिर्भवान श्रूयते । वयमप्यति साहसिका । उक्तश –

अनुवाद – जो हमें पाताल – प्रवेश , यक्षिणी की सिद्धि , श्मशानसेवन , मनुष्यादि के माँस का विक्रय , सिद्धवर्तिका आदि साधनों में से कोई एक ( धन प्राप्ति का ) उपाय बताइये । आप तो अद्भुतशक्ति सम्पन्न सुने जाते हैं । हम भी अत्यधिक साहसी है कहा भी गया है –

“महान्त एव महतामर्थ साधयितुं क्षमाः ।
ऋते समुद्रादन्यः को विभर्ति वडवानलम् ।।३४।।”

अनुवाद – बड़े लोग ही महान् व्यक्तियों के प्रयोजन को सिद्ध करने में समर्थ होते है क्योंकि समुद्र के अतिरिक्त अन्य कौन ( भला ) वडवानल को धारण करता है ।

भैरवानन्दोऽपि तेषां सिद्धयर्थ बहूपायं सिद्धवर्तिचतुष्टयं कृत्वाऽर्पयत । आह च- ” गम्यतां हिमालयदिशि तत्र सम्प्राप्तानां यत्र वर्तिः पतिष्यति , तत्र निधानमसंदिग्ध प्राप्स्यथ । तत्र स्थान खनित्वा निधिं गृहीत्वा व्याधुटयताम् । ” तथाऽनुष्ठिते तेषां गच्छतामेकतमस्य हस्ताद्वर्तिर्निपपात । अथाऽसौ यावत्तं प्रदेशं खनति तावत्तानमयी भूमिः । ततस्तेनाऽभिहितम् – ‘ ‘ अहो गृह्यतां स्वेच्छया ताम्रम् । ”

अन्ये प्रोचु : – ” भो मूढ ! किमनेन क्रियते यत् प्रभूतमपि दारिद्रयं न नाशयति । तदुत्तिष्ठ , अग्रतो गच्छामः । “

सोऽब्रवीत् – ‘ ” यान्तु भवन्तः । नाऽहमने यास्यामि । ” एवमभिघाय तानं यथेच्छया गृहीत्वा प्रथमो निवृत्तः ।

अनुवाद- भैरवानन्द ने भी उनकी सिद्धि हेतु अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक चार सिद्धिवर्तिकाओं का निर्माण करके उन्हें दिया और कहा – हिमालय की दिशा में चले जाओ । वहाँ पहुँचने पर तुम्हारी जहाँ वर्तिका गिरेगी , ( तुम सब ) यहाँ नि.सेदह खजाना प्राप्त करोगे । उस स्थान को खोदकर धन लेकर लौट जाना ।

वैसा करने पर जाते हुए उनमें से एक के हाथ से वर्तिका गिर पड़ी । इसके पश्चात् जैसे ही उस स्थान को खोदा , वैसे ही ( उसे ) ताम्रमयी भूमि ( दिखाई दी ) । तब उसने कहा ‘ अरे ! इच्छानुसार ताँबा ग्रहण कर लो । ‘

दूसरे बोले – अरे मूर्ख ! इस ( ताँये ) के द्वारा क्या किया जा सकता है ? क्योकि ( यह ) अत्यधिक होते हुए भी निर्धनता को नष्ट नहीं करता है । इसलिए उठो ( हम ) आगे चलते हैं । ” वह बोला- ” आप सब जाइये । मैं आगे नहीं जाऊँगा । ” इस प्रकार कहकर इच्छानुसार ताँबा लेकर पहला ( ब्राह्मण ) लौट गया ।

“ते त्रयोऽपि अग्ने प्रस्थिताः । अथ किश्चिन्मानं गतस्यानेसरस्य वर्तिर्निपपात । सोऽपि यावत्खनितुमारब्धस्तावद्भूप्यमयी क्षितिः । ततः प्रहर्षितः प्राह – यद् “ भो भो , गृह्यतां यथेच्छया रूप्यम् ! नाग्रे गन्तव्यम् । ”
तावूचतुः ” भोः , पृष्ठतस्ताम्रमयी भूमिः , अग्रतो रूप्यमयी । तन्नूमने – सुर्वणमयी भविष्यति । किञ्चाऽनेन प्रभूतेनाऽपि दारिद्रयनाशो न भवति । तदावामने यास्याव :। ” एवमुक्त्वा द्वावप्यग्रे प्रस्थितौ ।
सोऽपि स्वशक्तया रूप्यमादाय निवृत्तः । अथ तयोरपि गच्छतोरेकस्याग्रे वर्ति : पपात् । सोऽपि प्रहष्टो यावत्खनति , तावत्सवर्णभूमिं दृष्ट्वा द्वितीयां प्राह – भोः गृह्यतां स्वेच्छया सुवर्णम् । सुवर्णादन्यन्न किश्चिदुत्तमं भविष्यति । “

अनुवाद – वे तीनों भी आगे चल पड़े । इसके पश्चात् कुछ ही आगे गए तब आगे चले वाले ( ब्राह्मण ) की वर्तिका ( भी ) गिर पड़ी । उसने भी जब खोदना प्रारम्भ किया तो ( उसे ) रजतमयी भूमि ( दिखायी दी ) । तत्पश्चात् अत्यधिक प्रसन्न हुआ ( वह ) बोला – कि अरे ! रे । इच्छानुसार चाँदी ले लो । ( अब ) आगे नहीं चलना चाहिए ।

वे दोनों बोले – अरे । पीछे ताँबे की भूमि थी ( तथा ) आगे चाँदी की । तो निश्चय ही आगे स्वर्णमयो ( भूमि ) होगी। साथ ही अत्यधिक इस ( चाँदी ) के द्वारा निर्धनता का नाश तो होगा नहीं । इसलिए हम दोनों आगे चलते हैं । इस प्रकार कहकर वे दोनों भी आगे चल दिये । वह भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार चाँदी लेकर लौट गया ।

इसके पश्चात् उन दोनों में से भी जाते हुए एक के आगे वर्तिका गिर पड़ी । प्रसन्न हुए उसने भी जब खोदा , तो स्वर्णमयी भूमि को देखकर दूसरे से बोला – ” अरे ! इच्छानुसार सोना ले लो । अन्य कुछ भी सोने से उत्तम नहीं होगा ।

“स प्राहः – ” मूढ ! न किञ्चितद्वेत्सि ! प्राक्ताम्रः , ततो रूप्यं , ततः सुवर्णम् । तन्नूनमतः परं रत्नानि भविष्यन्ति , येषामेकतमेनाऽपि दारिद्यनाशो भवति । तदुत्तिष्ठः अग्रे गच्छावः । किमेनेन भारभूतेनाऽपि प्रभूतेन ? “

स आह ‘ ‘ गच्छतु भवान् । अहमत्र स्थितस्त्वां प्रतिपालयिष्यामि । ” तथाऽनुष्ठिते , सोऽपि गच्छन्नेकाकी , ग्रीष्माऽर्कप्रतापसन्तप्ततनुः पिपासाकुलितः सिद्धिमार्गच्युत इतश्चेतश्च बनाम । अथ श्राम्यन् , स्थलोपरि पुरूपमेकं रूधिरप्लावितगात्रं आमच्चक्रमस्तकमपश्यत् । ततो द्रुततरं गत्वा तमवोचत् – ” भोः , को भवान् ? किमेवं चक्रेण भ्रमता शिरसि तिष्ठसि ? तत्कथय मे यदि कुत्रचिज्जलमस्ति । “
एवंतस्य प्रवदतस्तच्चक्रं तत्क्षणात्तस्य शिरसो ब्राह्ममणस्तके चटितम् ।

अनुवाद – उसने कहा ” मूर्ख ! तुम ) कुछ नहीं जानते हो । पहले ताँबा , फिर चाँदी उसके बाद सोना । इसलिए निश्चय ही इसके पश्चात् रल होंगे , जिसमें से एक अकेले के द्वारा भी दरिद्रता नष्ट हो जाती है । तो उठो , आगे चलते हैं । भारस्वरूप अत्यधिक मात्रा वाले इससे भी भला क्या ( लाभ ) ?
उसने कहा ” आप जाइये । यहाँ रहकर मैं आपकी प्रतीक्षा करूँगा । ” वैसे करने पर , अकेला जाता हुआ ग्रीष्म ऋतु के सूर्य के तेज से सन्तप्त शरीर वाला , प्यास से व्याकुल हुआ , सिद्धिमार्ग से भटककर वह भी इधर उधर घूमने लगा ।
तत्पशात घूमते हुए ( उसने ) खून से लथपथ शरीर वाले , घूमते हुए चक्र से युक्त मस्तक वाले एक व्यक्ति को देखा । उसके पश्चात् शीघ्रतापूर्वक जाकर उससे बोला – ‘ अरे ! आप कौन है । सिर पर घूमते हुए चक्र से युक्त इस प्रकार क्यों खडे है ? यदि कहीं जल है , तो मुझे बताइये । “
उसी क्षण वह चक्र उस ( व्यक्ति ) के सिर से इस प्रकार कहते हुए उस ( ब्राह्मण ) के मस्तक पर चढ़ गया ।

स आह – ” भद्र ! किमेतत् ? “
स आह – ” ममाऽप्येवमेतच्छिरसि चटितम् । ”
स आह- ” तत्कथय कदैतदुत्तरिष्यति ? महती मे वेदना वर्तते । “
स आह – “ यदा त्वमिव कश्चिद्धृतसिद्धवतिरवमागत्य , त्वमालापयिष्यति , तदा तस्य मस्तक चटिष्यति । “
स आह – ” कियान्कालस्तवैव स्थितस्य ? “
स आह – ” साम्प्रतं को राजा धरणीतले ? “
स आह- ” वीणा वादनपटुः वत्सराजः ।

” अनुवाद ” भाई । वह क्या है ? ” उस ( व्यक्ति ) ने कहा- ” मेरे भी सिर पर यह इसी प्रकार चढ़ गया था । “
वह बोला- ” जरा कहिये , यह कब उतरेगा ? मुझे अत्यधिक पीड़ा हो रही है । ” उस ( व्यक्ति ) ने कहा ” जब तुम्हारे समान सिद्धिवर्तिका धारण किया हुए कोई इसी प्रकार आकर तुम्हारे साथ वार्तालाप करेगा , तब ( यह ) उसके मस्तक पर चढ़ जायेगा । “
इस प्रकार खड़े हुए तुम्हें कितना समय हुआ था ? ” उस व्यक्ति ने कहा ” इस समय पृथ्वीतल पर कौन राजा है ? ” ‘ वीणा ( वादक ) वत्सराज । ” वह बोला ।

“स आह – ” अहं तावत्कालसङ्ख्या न जानामि । परं यदा रामो राजासीत्तदाऽह दारिद्रबोपहतः सिद्धवर्तिमादायानेन पथा समायातः । ततो मयाऽन्यो नरो मस्तकधृतचक्रो दृष्टः , पृष्टश्च । ततश्चैतज्जातम् । ” ” भद्र ! कथं तदैवं स्थितस्य भोजनजलप्राप्तिरासीत् ? “
स आह – ” भद्र ! धनदेन निधानहरणभयात्सिद्धानामेतच्चक्रपतनरूपं भयं दर्शितम् । तेन कश्चिदपि नागच्छति । यदि कश्चिदायाति , स क्षुत्पिपासानिद्रारहितो , जरामरणवर्जितः केवलमेवं वेदनामनुभवति इति । तेदाज्ञापय मां स्वगृहाय । ” इत्युक्त्वा
तंत।

अनुवाद – उस ( व्यक्ति ) ने कहा ” काल की गणना तो मैं नहीं जानता हूँ । किन्तु र राम राजा थे , दरिद्रता के कारण से में तब सिद्धिवर्तिका लेकर इसी मार्ग से आया था । तब ( भो यहाँ ) अन्य व्यक्ति को मस्तक पर चक्र धारण किये हुये देखा था और पूछा था तथा उसके बाद ही यह हो गया था ।

वह बोला- भाई । इस प्रकार स्थित हुए तुम्हे जल एवं भोजन की प्राप्ति किस प्रकार होती थी ?

उस ( व्यक्ति ) ने कहा – भाई । खजाना चुराए जाने के डर से सिद्धों के लिए कुबेर ने चक्रपतनरूप यह भय दिखाया है । इस कारण ( यहाँ ) कोई भी नहीं आता है ( और ) यदि कोई आता ( भी ) है ( तो ) भूख – प्यास एवं निद्रा से रहित , वृद्धावस्था तथा मरने से मुक्त वह इसी प्रकार केवल पीड़ा का अनुभव करता है । तो मुझे अपने घर ( जाने ) के लिए आज्ञा प्रदान कीजिए । ” इतना कहकर चला गया ।

” तस्मिंश्चिरयति स सुवर्णसिद्धिस्तस्याऽन्वेषणपरस्तत्पदपङ्क्त्या यावत् किश्चिद् वनान्तरमागच्छति , तावद्रुधिरप्लावितशरीरस्तीक्ष्णचक्रेण मस्तके भ्रमता सवेदन : क्वणनुपविष्ठतीति ददर्श । तत : तत्समीपवर्तिना भूत्वा , सर्वार्थ पृष्ट : – ‘ भद्र ! किमेतत् ? ” ” विधिनियोगः । “
स आह – ” कथन्तत् ? कथय कारणमेतस्य । ” सोऽपि तेन पृष्टः , सर्वचक्रवृत्तान्तमकथयत् । तच्छ्रुत्वाऽसौ तं विगर्हयन्निदमाह- “ भो ! निषिद्धस्त्वं मयाऽनेकशो , न श्रृणोषि में वाक्यम् । तत्किं क्रियते । विद्यावानपि , कुलीनोऽपि बुद्धिरहितः । अथवा साध्विमुच्यते –

अनुवाद – उसके देर करने पर उसको खोजने में लगा वह सुवर्णसिद्धि उसके पैरों के चिन्हों के अनुसार जैसे ही कुछ वन के अन्दर आया , वैसे ही खुन से लथपथ शरीर वाले , मस्तक पर घूमते हुए तीक्ष्णाचक्र से युक्त अत्यधिक पीड़ित रोते हुए ( उस ) को बैठा हुआ विराजमान है . इस प्रकार देखा । तब उसके पास जाकर , अश्रुयुक्त होकर पूछा – ‘ भाई यह क्या है ? “

वह बोला- ” भाग्य ही विडम्बना है । ” की उस ( सुवर्णसिद्धि ) ने कहा- ” वह कैसे ? इसका कारण कहिए । ” उसके द्वारा पूछे गए उसने भी सम्पूर्ण चक्रविषयक घटनाक्रम कह डाला । उसको सुनकर उसकी निन्दा करते हुए उसने यह कहा – ” अरे ! मैंने तुम्हें अनेक बार रोका था । तुम ) मेरी बात नहीं सुनते हो । तो क्या किया जाए । विद्वान् होते हुए भी , उच्चकुलोत्पन्न भी तुम ) बुद्धिहीन हो । अथवा यह ठीक ही कहा जाता है –

“वरं बुद्धिर्न सा विद्या विद्यया बुद्धिरूत्तमा ।
बुद्धिहीना विनश्यन्ति तथा ते सिंहकारका : ।। ३५ ।।”

अनुवाद- बुद्धि श्रेष्ठ है , वह विद्या नहीं , विद्या से बुद्धि उत्तम है । बुद्धिरहित ( उसी प्रकार ) विनष्ट हो जाते हैं , जिस प्रकार सिंह का निर्माण करने वाले वे ( ब्राह्मण लोग नष्ट हो गए ) ।

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