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PANCHATANTRAM

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पंचतंत्रम्

अथ अपरीक्षितकारकम्

१.क्षपणक कथा भाग -1

"अथेदमारभ्यतेऽपरीक्षितकारकं नाम पंचम तन्त्रं यस्याऽयमादिमः श्लोकः -नामम

इसके पश्चात् यह अपरीक्षितकारक नामक पंचम तन्त्र आरम्भ किया जाता है जिसका यह प्रारम्भिक श्लोक है –

“कुदृष्टं कुपरिज्ञातं कुश्रुतं कुपरीक्षितम् । तन्नरेण न कर्तव्यं नापितेनाऽत्र यत्कृतम्” ।३ ।।

अनुवाद – यहाँ नाई से अच्छी प्रकार देखे बिना , अच्छी प्रकार जाने बिना , ठीक तरह सुने बिना , भली प्रकार परीक्षा किए बिना जो किया , वह ( कभी भी किसी भी ) व्यक्ति को नहीं करना चाहिए ।

“तद्यथाऽनूश्रूयते – अस्ति दाक्षिणात्ये जनपदे पाटलिपुत्रं नाम नगरम् । तत्र मणिभद्रो नाम श्रेष्ठी प्रतिवसति स्म । तस्य च धर्मार्थकाममोक्षकर्माणि कुर्वतो विधिवशाद्धनक्षय : संजातः । ततो विभवक्षयादपमानपरम्परया परं विषादं गतः । अथाऽन्यदा रात्रौ सुन्तश्चिन्तितवान् – “ अहो , धिगियं दरिद्रता ।।” ‘ उक्तंच –

अनुवाद – तो जैसा सुना जाता है – दक्षिण प्रदेश में पाटलिपुत्र ‘ नामक नगर है । वहाँ ‘ मणिभद्र ‘ नामक सेठ रहता था । धर्म -अर्थ – काम एवं मोक्ष सम्बन्धित कार्यों को करते हुए भाग्यवश ( उसके ) धन का नाश हो गया । उसके पश्चात् ( वह ) ऐश्वर्य का विनाश होने से अपमानपरम्परा द्वारा अत्यन्त दुःखी हुआ । तब एक रात में सोते हुए उसने सोचा – ‘ ओह ‘ ! इस दरिद्रता को धिक्कार है । कहा भी है –

"शील शौचं क्षान्तिर्दाक्षिण्यं मधुरता कुले जन्म । न विराजन्ति हि सर्वे वित्तविहिनस्य पुरूषस्य" ।।२ ।।

अनुवाद – श्रेष्ठ आचरण , पवित्रता , क्षमा , उदारता , मधुरता , उच्चकुल में जन्म ( ये ) सभी वस्तुत : निर्धन व्यक्ति में सुशोभित नहीं होते हैं ।

"मानो वा दर्पो वा विज्ञानं विभ्रमः सुबुद्धिर्वा । सर्वः प्रणश्यति समं , वित्तविहीनो यदा पुरूषः"।।३ ।।

अनुवाद- जब व्यक्ति धनरहित हो जाता है तो उसका सम्मान , अहंकार , विविध प्रकार का ज्ञान अथवा विलासपूर्ण क्रियाकलाप और श्रेष्ठबुद्धि सभी एक साथ नष्ट हो जाते हैं ।

“प्रतिदिवसं याति लयं वसन्तवाताहतेव शिशिरश्रीः । बुद्धिबुद्धिमतापि कुटुम्बभरचिन्तया सततम्” ।।४ ॥

अनुवाद – परिवार के पालन – पोषण की चिन्ता से बुद्धिमानों की भी बुद्धि निरन्तर वसन्त की वायु से नष्ट हुई शिशिर ऋतु की शोभा के समान नष्ट हो जाती है अर्थात् वह निरन्तर अपने परिवार के बारे में ही सोचता रहता है।

“नश्यति विपुलमतेरपि बुद्धिः पुरूषस्य मन्दविभवस्य । घृतलवणतैलतण्डुलवस्त्रेन्धनचिन्तया सततम्”।।५ ।।

अनुवाद – अत्यधिक बुद्धिमान् होने पर भी निर्धन व्यक्ति की भी बुद्धि निरन्तर घी , नमक , तेल , चावल , वस्त्र एवं इन्धन ( एकत्र करने की ) चिन्ता के कारण नष्ट हो जाती है ।

"गगनमिव नष्टतारं , शुष्कमिव सरः , श्मशानमिव रौद्रम् । प्रियदर्शनमपि रूक्षं , भवति गृहं धनविहीनस्य"।।६ ।।

अनुवाद – धन से रहित व्यक्ति का घर देखने में सुन्दर होते हुए भी नष्ट हुए तारों वाले आकाश के समान , सूखे हुए सरोवर के समान रुक्ष , भयंकर श्मशान के समान रूखा होता है अर्थात् धन के अभाव वह घर शोभा नहीं देता है ।

"न विभाव्यन्ते लघवो वित्तविहीना : पुरोऽपि निवसन्तः । सततं जातविनष्टाः पयसामिव बुद्बुदा : पयसि "।।७ ।।

अनुवाद- धनविहीन व्यक्ति तुच्छ हो जाता है । सामने रहने पर भी लोग , निरन्तर जल में उत्पन्न और विनष्ट होने वाले जल के बुलबुलों के समान दिखाई नहीं देते हैं ।

"सुकुलं कुशलं , सुजनं विहाय , कुलकुशलशीलविकलेऽपि । आढ्ये कल्पतराविव नित्यं रज्यन्ति जननिवहाः"।।८ ।।

अनुवाद -लोगों के समूह उच्चकुलोत्पन्न , निपुण ( एव ) सज्जन को छोड़कर कुलीनता , कुशलता एवं चरित्र से हीन भी धनवान् व्यक्ति मे कल्पवृक्ष के समान हमेशा प्रसन्न होते हैं । अर्थात् लोगो की दृष्टि में गुणवान की अपेक्षा धनवान का ही अधिक महत्व होता है ।

"विफलमिह पूर्वसुकृतं विद्यावन्तोऽपि कुलसमुद्भूताः । यस्य यदा विभव : स्यात्तस्य तदा दासतां यान्ति"।।९ ।।

अनुवाद – इस संसार में पहले किया गया पुण्य व्यर्थ हो जाता है । ( क्योकि ) विद्वान ( और ) उच्चकुल में उत्पन्न होते हुए भी जब जिसके पास ऐश्वर्य होता है , तब उसकी ही दासता ‘ को प्राप्त हो जाते हैं।

"लघुरयमाह न लोक : कामं गर्जन्तमपि पतिं पयसाम् । सर्वमलज्जाकरमिह यद्यत्कुर्वन्ति परिपूर्णाः "।१० ॥

अनुवाद- संसार ने व्यर्थ गरजते हुए जलों के स्वामी ( समुद्र ) को भी यह छोटा है ‘ कभी भी किसी ने भी ऐसा नहीं कह , ( क्योंकि ) इस संसार में सम्पन्न लोग जो – जो करते हैं . वह सब लज्जाकर नहीं होता है ।

“एवं सम्प्रधार्य भूयोऽप्यचिन्तयत् – ‘ तदहमनशनं कृत्वा प्राणानुत्सृजामि । किमनेन नो व्यर्थजीवितव्यसनेन ? ‘ एवं निश्चयं कृत्वा सुप्तः । अथ तस्य स्वप्ने पानिधिः क्षपणकरूपं दर्शनं दत्त्वा प्रोवाच – ‘ भोः श्रेष्ठिन् ! मा त्वमं वैराग्यं गच्छ । अहं पद्मनिधिस्तव पूर्वपुरूषोपार्जितः । तदनेनैव रूपेण प्रात : त्वद्गृहमागमिष्यामि । तत्त्वयाऽहं लगुडप्रहारेण शिरसि ताडनीयः , येन कनकमयो भूत्वाऽक्षयो भवामि ।

‘ अथ प्रात : प्रबुद्धः , सन् स्वर्ण स्मरश्चिन्ताचक्रमारूढस्तिष्ठति – ‘ अहो , सत्योऽयं स्वप्नः , किं वा असत्यो भविष्यति , न ज्ञायते । अथवा नूनं मिथ्याऽनेन भाव्यम् । यतोऽहमहर्निशं केवलं वित्तमेव चिन्तयामि । उक्तचं –

अनुवाद – इस प्रकार विचार करके ( उसने ) फिर से सोचा – इसलिए मैं ‘ अनशन ‘ करके प्राणों को छोड़ देता हूँ । हमारे इस व्यर्थजीवनरूपी व्यसन से क्या ( लाभ ) ? इस प्रकार निश्चय करके सो गया ।
इसके पश्चात उसके स्वण मे क्षपणक रूपधारी पद्मनिधि ने दर्शन देकर कहा – हे सेठ ! तुम वैराग्य को प्राप्त मत होओ । तुम्हारे पूर्वजों के पुण्यों द्वारा उपार्जित मैं पद्मानिधि हूँ । तो ( मैं ) इसी रूप में प्रातः तुम्हारे घर पर आऊँगा । तब तुम मुझे डण्डे से सिर पर मारना , जिससे सोने का होकर ( मैं ) कभी नष्ट न होने वाला हो जाऊँगा ।
तत्पश्चात् प्रातः काल जागकर , स्वप्न को स्मरण करता हुआ वह सोचता है – ‘ अहा ! वह स्वप्न सत्य ( होगा ) अथवा असत्य होगा , समझ नहीं आता । अथवा इसे निश्चय ही असत्य होना चाहिए , क्योंकि मैं रात दिन केवल धन के विषय में सोचता रहता हूँ । कहा भी गया है-

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