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PANCHATANTRAM

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पंचतंत्रम्

2 ब्राह्मणी – नकुल – कथा

“कस्मिंश्चिदधिष्ठाने देवशर्मा नाम ब्राह्मणः प्रतिवसति स्म । तस्य भार्या प्रसूता सुतमजनयत् । तस्मिन्नेव दिने नकुली नकुलं प्रसूय मृता । अथ सा सुतवत्सला दारकवत्तमपि नकुलं स्तन्यदानाऽङ्गमर्दनादिभिः पुपोष । परं तस्य न विश्वसिति । अपत्यस्नेहस्य सर्वस्नेहातिरिक्ततया सततमेवमाशङ्खते यत् कदाचिदेष स्वजातिदोषवशादस्य दारकस्य विरुद्धमाचरिष्यति इति । उक्तश्च –

अनुवाद – किसी स्थान पर देवशर्मा नामक ब्राह्मण रहता था । उसकी गर्भवती पत्नी ने एक पुत्र को उत्पन्न किया । उसी दिन नेवली नेवले को उत्पन्न करके मर गयी । तब पुत्र वात्सल्य से युक्त पुत्रवती होते हुए भी उस ( ब्रह्मणी ) ने नेवले को स्तन से दुग्धपान कराने तथा सैल से अङ्गों की मालिश करने आदि के द्वारा पालन – पोषण किया । परन्तु उस पर विश्वास नहीं करती थी । पुत्र प्रेम के अन्य स्नेहों से बढकर होने के कारण ( वह ) हमेशा ही शंका करती रहती थी कि अपने जातिगत दोष के कारण कभी यह नेवला मेरे पुत्र का अनिष्ट न कर दे । कहा भी गया है-

” कुपुत्रोऽपि भवेत्युंसां हृदयानन्दकारकः ।
दुर्विनीत : कुरूपोऽपि , मूर्योऽपि व्यसनी खलः ।”१८ ।।

अनुवाद – दुर्विनीत , कुरूप , मूर्ख , दुराचरण करने वाला , दुष्ट , कुत्सित , पुत्र भी पुरूषों के हृदयों को आनन्द प्रदान करने वाला होता है ।

“एवं च भाषते लोकश्चन्दनं किल शीतलम् । पुत्रगात्रस्य संस्पर्शश्चन्दनादतिरिच्यते “॥१ ९ ॥

अनुवाद- संसार ऐसा कहता है ( कि ) चन्दन ही शीतल ( होता ) है , ( वस्तुतः ) पुत्र के शरीर का स्पर्श ( तो ) चन्दन से भी बढ़कर होता है ।

“सौहृदस्य न वांछन्ति जनकस्य हितस्य च । लोकाः प्रपालकस्याऽपि यथा पुत्रस्य बन्धनम् ।।”२० ।।

अनुवाद- लोग जिस प्रकार पुत्र के बन्धन को चाहते है , ( वैसा ) मित्र के , पिता के , हितकर के , पालन- पोषण करने वाले के ( बन्धन को ) भी नहीं चाहते है।।२० ।।

” अथ सा कदाचिच्छय्यायां पुत्रं शाययित्वा जलकुम्भमादाय , पतिमुवाच – ” ब्राह्मण ! जलार्थमहं तडागे यास्यामि । त्वया पुत्रोऽयं नकुलाद्रक्षणीयः ।
” अथ तस्यां गतायां , पृष्ठे ब्राह्मणेऽपि शून्यं गृहं मुक्त्वा भिक्षार्थ क्वचिन्निर्गतः । अत्रान्तरे दैववशात् कृष्णसर्पो बिलान्निष्क्रान्तः । नकुलोऽपि तं स्वभाववैरिणं मत्वा धातुः रक्षणार्थ सर्पेण सह युद्धवा सर्प खण्डशः कृतवान् ।
ततो रूधिराप्लावितवदनः सानन्दं स्वव्यापारप्रकाशनार्थ मातुः सम्मुखो गतः । माताऽपि तं रूधिरक्लिन्नमुखमवलोक्य शंकितचित्ता ” नूनमनेन दुरात्मना दारको मे भक्षितः ” इति विचिन्त्य कोपात्तस्योपरि तं जलकुम्भं चिक्षेप ।

अनुवाद – इसके पश्चात् एक दिन चारपाई पर पुत्र को सुलाकर जल का घड़ा लेकर वह पति से बोली- ‘ हे ब्राह्मण ! मैं जल के लिए तालाब पर जाऊँगी । तुम्हें इस पुत्र की नकुल से रक्षा करनी चाहिए ।
तब उसके चले जाने पर , ब्राह्मण भी पीछे घर को खाली छोड़कर कहीं भिक्षा के लिए निकल गया । इसी बीच दैवयोग से ( एक ) काला सर्प बिल से निकला । नकुल ने भी उसको स्वभाव से शत्रु मानकर भाई की रक्षा के लिए सर्प से युद्ध करके सर्प के टुकड़े – टुकड़े कर दिये ।
तत्पश्चात् खून से सने हुए मुख वाला ( वह ) आनन्दपूर्वक अपने कार्य को प्रदर्शित करने के लिए ( अपनी ) माता के सामने गया । शंकित मन वाली माता ने भी रक्त से सने हुए मुख वाले उसको देखकर ‘ निश्चय ही इस दुरात्मा ने ( मेरे ) यच्चे को खा लिया है , ऐसा सोचकर ब्रोध से उस जल ( से भरे ) घड़े को उसके ऊपर पटक दिया ।

“एवं सा नकुलं व्यापाद्य यावत्प्रलपन्ती गृहे आगच्छति , तावत्सुतस्तथैव सुप्तस्तिष्ठति । समीपे कृष्णसर्प खण्डशः कृतमवलोक्य पुत्रवधशोकेनात्मशिरो वक्षस्थलं च ताडितुमारब्धा ।
अत्रान्तरे ब्राह्मणो गृहीतनिर्वापः समायातो यावत्पश्यति , तावत्पुत्रशोकाभितप्ता ब्राह्मणी प्रलपति- भो भो लोभात्मन् ! लोभाभिभूतेन त्वया न कृतं मद्वचः । तदनुभव साम्प्रतं पुत्रमृत्युदुःखवृक्षफलम् । अथवा साध्विदमुच्यते ।

अनुवाद – इस प्रकार नकुल को प्रलाप करती हुई जब वह घर आती है तो ( देखती है कि ) पुत्र वैसे ही सोया हुआ है । पास में काले साँप को टुकड़े – टुकड़े किया हुआ देखकर ( नेवले रूप ) पुत्र – वधके शोक से ( उसने ) सिर और छाती को पीटना आरम्भ कर दिया।
इसी बीच भिक्षा प्राप्त किये लौटकर आये हुए ब्राह्मण को जब देखती है , तभी पुत्र शोक से सन्तप्त ( वह ) ब्राह्मणी प्रलाप करने लगी- अरे , अरे लोभी । लोभ से वशीभूत हुए तुमने मेरा कहना नहीं माना । इसलिए अब पुत्र की मृत्यु के दुःखरूपी वृध के फल ( के स्वाद ) को अनुभव करो अथवा यह ठीक ही कहा जाता है –

“अतिलोभो न कर्तव्यो लोभ नैव परित्यजेत् । अतिलोभाभिभूतस्य चक्र भ्रमति मस्तके”।।२१ ।।

अत्यन्त लोभ नहीं करना चाहिए ( और ) न ही लोभ को ( पूर्णतया छोड़ना ही चाहिए . ( क्योकि ) अत्यधिक लोभ के कारण मस्तक पर चक्र घूमता है ।

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