fbpx

PANCHAMAHABHUTA

by

पञ्चमहाभूत

कारण द्रव्य
चरक ने ये 9 प्रकार के माने हैं -१ . आकाश , २. वायु , ३. अग्नि , ४. जल , ५. पृथ्वी , ६. आत्मा , ७. मन , ८. काल और ९ . दिशा

पञ्चमहाभूत

भूत का अर्थ होता है सत्तावान यह जिसकी सत्ता हो या जो विद्यमान हो संसार के समस्त द्रव्य पंचमहाभूत आत्मक होते हैं । उनके स्वभाविक गुण कर्म से शब्द स्पर्श रूप रस गंध है।

महाभूतों की संख्या 5 बताई गई है- आकाश, वायु ,अग्नि ,जल और पृथ्वी

•आकाश निरूपण

संख्या के अनुसार अहंकार से शब्द तन्मात्रा की उत्पत्ति होती है और इसी शब्द तन्मात्रा से आकाश की उत्पत्ति होती है ।

आचार्य सुश्रुत ने आकाश को सत्व गुण की अधिकता वाला बताया है ।
आधुनिक वैज्ञानिक भी मानते हैं कि जो भी धर्म है वह आकाश के ही परिणाम है अर्थात द्रव्य आकाश का ही रूपांतरण है।

•शरीर के आकाशात्मक भाव – श्रोत्रेन्द्रिय , शब्द , सूक्ष्मता , लघुता और विवेक ये पाँच आकाशात्मक भाव हैं । सिरा , स्नायु , अस्थि , स्रोतस , गुहा ( Cavities ) , वाहिनियां , अवकाश युक्त भाग और छिद्र समूह ये सभी आकाशात्मक शरीर भाव हैं ।
गर्भस्थ भ्रूण को भी विस्तृत कर विशाल बनाने का कार्य आकाश ही करता है । आकाश प्रधान इन्द्रिय ‘ श्रवणेन्द्रिय ‘ और इसका गुण ‘ शब्द ‘ ग्रहण करना है ।

•वायु निरूपण

‘ वा गतिगन्धनयोः ‘ धातु से वायु शब्द की निष्पत्ति हुयी है । इसका अर्थ है ‘ गति करना ।

आकाश महाभूत से वायु महाभूत की उत्पत्ति हुई है ।
तर्कसंग्रह के अनुसार वायु है पदार्थ है जो रूप रहित किंतु स्पर्श गुणों से युक्त है।

•वायु के भेद
वायु के दो भेद होते हैं 1.नित्य- यह परमाणु स्वरुप होता है 2.अनित्य -यह कार्य रूप होता है ।

अनित्य तीन प्रकार का होता है 1.शरीर संज्ञक 2. इंद्रिय संज्ञक और 3. विषय संज्ञक

विषय संज्ञक वायु के भेद -1.लोकगत वायू 2.शरीर गत वायु

शरीर गत वायु- यह पांच प्रकार के होते हैं 1.प्राणवायु 2.उदान वायु 3.समान वायु 4.व्यान वायु 5.अपान वायु

  1. प्राण वायु
    इसका स्थान मूर्धा , उर : प्रदेश , कण्ठ , जिह्वा , मुख और नासिका है ।
    इसका कार्य है — ष्ठीवन ( थूकना- Spitting ) , क्षवथु ( छींक- Sneezing ) , उद्गार ( डकार- Belching ) श्वास – प्रश्वास और आहारादि का ग्रहण करना ।
    यह शरीर को धारण करता है , आहार का प्रवेश मुख से कराता है , ज्ञानेन्द्रिय ‘ , मन तथा धमनियों को धारण करता है ।
  2. उदान वायु
    इसका स्थान उरोगुहा , नाभि , नासिका और कुण्ठ ‘ माना है । हृदय एवं फुफ्फुस में विशेष रूप से गतिशील रहता है । इसका कार्य वाणी की प्रवृत्तिकरना , प्रयत्न , उर्जा , बल , वर्णोत्पत्ति , स्रोतप्रीडन , बुद्धि – धैर्य – स्मृति आदि का संतुलन और मनोविबोध है ।
  3. समान वायु
    इसका स्थान स्वेदवह , दोषवह , अम्बुवह स्रोतस , आमाशय और पक्वाशय के पार्श्व में स्थित है ।
    इसका कार्य जठराग्नि को दीप्त करना , आहार का पाचन ‘ , दोष – धातु और मल का विवेचन ( अलग ) करना है ।
  4. व्यान वायु
    यह हृदय में आश्रित और सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होती है इसका कर्म है – रक्त संवहन ( Blood circulation ) , स्वेद एवं रक्तस्रावण , अवयवों में गति कराना , पलकों का बन्द होना और खुलना ( निमेषोन्मेष ) , अन्न का आस्वादन आदि कराना ।
    चरक ने वातकलाकलीय अध्याय में शरीरगत वात के कार्यों पर विस्तृत प्रकाश डाला है ।
  5. अपान वायु
    इसका स्थान पक्वाशय , आन्त्र , नाभि , वृषण – वस्ति , मेढ़ , गुदा , वंक्षण , श्रोणि और उरू है ।
    इसका कार्य है – मूत्र , पुरीष , शुक्र , आर्तव तथा गर्भ को बाहर निकालना ।

तेज निरूपण

वायु महाभूत से तेज या अग्रि महाभूत की उत्पत्ति होती है ।
तेज में समवाय संबंध से रूप और स्पर्श गुण पाए जाते हैं ।

आचार्य सुश्रुत के अनुसार तेज सत्व और रजोगुण की अधिकता वाला होता है। अंधकार को नष्ट करने तथा सूर्य के समान रूप गुण वाले तेज की उत्पत्ति वायु से हुई है ।

तेज के भेद
तेज दो प्रकार का होता है –
1.नित्य- यह अणु रूप होता है।

  1. अनित्य- यह कार्य रूप होता है ।

Leave a Comment

error: Content is protected !!