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OJA

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ओज

ओज शरीर का व्याधिक्षमत्व बल है । व्याधिक्षमत्व बल को प्रदान करने वाले ‘ ओज ‘ संज्ञा वाले ये तत्व रक्त के साथ समस्त शरीर में परिसंचरित होते रहते हैं ।

• ओज की उत्पत्ति

“प्रथमं जायते ह्योजः शरीरेऽस्मिन् शरीरिणाम् ।।”( च ० सू ० 17/74 )

शरीरधारियों में सबसे पहिले ओज की उत्पत्ति होती है । ‘

• ओज का पोषण

ओज का पोषण अन्य धातुओं के समान अन्नरस से होता है।

• ओज का स्थान तथा वर्ण

( जिस हृदय पर आयु आश्रित है ) वह हृदय उत्कृष्ट ओज का भी स्थान है । वही हृदय चेतना का संग्रह स्थान भी है । ओज का स्थान होने के कारण , चिकित्सक हृदय को महत् और चेतना का आश्रय स्थान होने के कारण ‘ अर्थ ‘ कहते हैं।

•ओज के गुण

ओज दस गुणों से युक्त होता है-

  1. गुरु , 2. शीत , 3. मृदु , 4. श्लक्ष्ण , 5. बहल ( घना ) , 6. मधुर , 7. स्थिर , 8. प्रसन्न ( निर्मल ) , 9. पिच्छिल एवं 10. स्निग्ध ।

• ओज के कार्य

  1. बल से मांस की स्थिरता तथा पुष्टि होती है ।
  2. सब प्रकार की चेष्टाओं के लिए शक्ति प्राप्त होती है ।
  3. स्वर तथा वर्ण में प्रसन्नता आती है तथा
    4 . बल से ही बाह्य इन्द्रियां ( कर्मेन्द्रियां ) तथा आभ्यन्तर इन्द्रियां ( ज्ञानेन्द्रियां ) अपने – अपने कार्य में प्रवृत्त होती हैं ।

• ओज का शरीर में परिमाण

“अर्धाञ्जलिः श्लेष्मणश्वौजसः ।।”( च ० शा 07 / 16)

शरीर से श्लैष्मिक ओज का परिमाण अर्ध अञ्जलि होता है ।

• ओज क्षय के लक्षण

ओज के क्षीण होने से मनुष्य
[ 1 ] शरीर से दुर्बल एवं कृश हो जाता है ,
[ 2 ] अकारण ही डरता रहता है [ भयातुर ] ,
[ 3 ] निरन्तर चिन्तायुक्त रहता है ,
[ 4 ] इन्द्रियों में कष्ट होता है अर्थात् इन्द्रियों से अपने स्वाभाविक कर्म करने में कठिनाई होती है ,
[ 5 ] शरीर की कान्ति घट जाजी है ,
[ 6 ] मन दुर्बल हो जाता है , सोचने विचारने की क्रियायें ठीक प्रकार से नहीं होती हैं अर्थात् मनःशक्ति [ will power ] कम हो जाती है ,
[ 7 ] शरीर रूक्ष एवं कृश तथा
[ 8 ] क्षामस्वरवाला हो जाता है ।

• ओज की क्षीणता में जीवनीयगण औषधों से सिद्ध किये दूध , घृत का सेवन करना चाहिए ।

•ओज की वृद्धि से मन में प्रसन्नता , देह की पुष्टि , इन्द्रियों में बल तथा पराक्रम आदि गुणों की वृद्धि होती है ।

• ओज की वृद्धि को क्षीण नहीं करना चाहिए वरन् वृद्धि के लिए सदैव प्रयत्नवान् रहना चाहिए

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