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NADI VIGYAN

by

नाड़ी विज्ञान – भाग 1

• नाड़ी वर्णन

शिव संहिता एवं गोरक्षसंहिता में शरीर की समस्त नाड़ी संख्या को चार भागों में विभक्त किया गया है ।

१. त्रिविध नाड़ियाँ- इड़ा , पिंगला , सुषुमा

२. दशविध नाड़ियाँ- दश नाड़ियाँ

३. चतुर्दश नाड़ियाँ- चौदह नाड़ियाँ

४. और कुल संख्या ७२,००० अथवा ३,५०,००० ( साढ़े तीन लाख ) बताई जाती हैं ।

त्रिविध नाड़ियाँ यद्यपि उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट होता है कि शरीर में अनेक प्रकार की नाड़ियाँ होती हैं । उनमें भी इड़ा , पिंगला और सुषुम्ना तीन प्रमुख बताई गई हैं ।

योगिजनों के लिए उन तीन नाड़ियों में भी सुषुम्ना ही मुख्य है । अन्य शरीर की सभी नाड़ियाँ इसी का आश्रय लेकर शरीर में रहती हैं ।

• स्वरूप एवं स्थिति

“इडा वामे स्थिता भागे पिंगला दक्षिणे स्थिता ।

सुषुम्ना मध्यदेशे तु गांधारी वामचक्षुषि ।।” ( गोरक्ष संहिता )

नासिका के वाम भाग में इड़ा , दक्षिण भाग में पिंगला और दोनों के मध्य में सुषमा स्थित है ।

1. सुषुम्रा

 ” इडा पिंगलयोर्मध्ये सुषुम्णा या भवेत् खलु । ” ( शिव संहिता )

इड़ा और पिंगला के मध्य में सुषुम्ना का स्थान बताया गया है

सुषुम्ना के मार्ग में छ : प्रमुख स्थान बताये गये हैं । जिन्हें षट्चक्र भी कहा जाता है । इन षट्चक्रों की छ : शक्तियाँ हैं ।

सुषुम्ना की उत्पत्ति मेरूदण्ड के अग्रभाग से मानी गई है । सुषुम्ना का देवता अग्नि माना गया है । सुषुम्ना नाड़ी के पास कुण्डलिनी का महापथ मानते हैं ।

कुण्डलिनी जागृत होने पर बिजली की चमक के समान सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश कर जाती है । गोरक्ष पद्धति में नासिका के मध्यभाग को सुषुम्ना का स्थान बताया है ।

2. इड़ा

प्रमुख तीन नाड़ियों में इड़ा नामक नाड़ी को आवृत करती हुई वाम भाग में स्थित है । एवं यह दाहिनी नासिका तक गई है । इसका देवता चन्द्रमा है । इड़ा का वर्ण श्वेत कमल के समान है । एवं यह सुषुम्ना के वाम भाग में स्थित है ।

वाम भाग में धवल ( शुक्ल ) चन्द्रमा की आभारूपी इड़ा नाड़ी स्थित है । वह शक्ति रूपी देवी साक्षात् अमृत की वर्षा करती है ।

3. पिंगला

सुषुम्ना के दक्षिण भाग में जो पिंगला नाम की नाड़ी है । वह सुषुम्ना के सहारे नासिका के वाम द्वार में गई है ।

मेरूदण्ड के मूल में अर्थात् नीचे बारहकला संयुक्त सूर्य है । उसकी रश्मि दक्षिण पथ ( पिंगला नाड़ी ) का आश्रय लेकर ऊपर की ओर जाती है ।

• दक्षिण में स्थित पिंगला नाम की नाड़ी कठोर सूर्य की किरणों को बिखरने वाली , रौद्ररूपा , महादेवी , दाडिमी एवं केशर के समान जिसकी प्रभा है , ऐसी नाड़ी है ।

•  त्रिवेणी

 इड़ा तथा पिंगला नाड़ियाँ ऊपर जाते समय आपस में लांघकर ( Cross करके ) विरूद्ध दिशा में जाती हैं । इड़ा दक्षिण की ओर तथा पिंगला वाम की ओर जाती है उनके इस छेदन ( Cross ) स्थान को ( वरणा + असी ) वाराणसी कहते हैं । इड़ा तथा पिंगला इनके बीच में तीसरी नाड़ी रहती है । उसे सुषुम्ना या सरस्वती भी कहते हैं । सुषुम्ना के मध्य में स्थित विवर में जो शक्ति रहती है । उसे चित्रा शक्ति या चित्रा नाड़ी कहते हैं ।

• कुण्डलिनी परिचय

कुण्डलिनी शक्ति जागृत होने पर मूलाधार , स्वाधिष्ठान तथा मणिपूर चक्रों को लांघकर ( Cross करके ) अनाहत चक्र में आकर निवास करती है । तब ही उस प्राणी का चैतन्य जाग्रत होता है । और उसे ज्योति – दर्शन होता है ।

• वेदों में इन्हीं चक्रों को भूमि कहा गया है । जब कुण्डलिनी आज्ञाचक्र में आती है , तब प्राणी को ईश्वर के रूप का दर्शन होता है • और जब कुंडलिनी सहस्रार चक्र में आती है , तब उसकी समाधी लगती है।

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