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NA VEGAN DHARANIYA ADHYAYA

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न वेगान धारणीय अध्याय

•अधारणीय वेग 🙁 13 )

  • गुदा -4 मूत्र , पुरीष , रेतस , अपानवायु
    -मुख – 5 – वमन , उदगार , जृम्भा , भुत , पिपासा
    -नेत्र -2-वाष्प , निद्रा ।
  • नाक -2- क्षवथु , श्रमजन्य निःश्वास।

Table

S.N.अधारणीय वेग का धारणवेगधारणजन्य रोगउत्पन्न रोग – चिकित्सा
1.मूत्रवेगनिग्रह ( Suppression of the urge for urination )बस्तिशूल , मूत्रेन्द्रियशूल , मूत्रकृच्छ्र , शिरःशूल , विनाम ( झुक जाना ) और वंक्षण में आनाहस्वेदन , अवगाहन , अभ्यंग ( स्थानीय मालिश ) , अवपीडक ( भोजन के पूर्व तथा रात में भोजन पच जाने पर घृतपान कराना ) , निरूहबस्ति , अनुवासन और उत्तरबस्ति
2.पुरीषवेगनिग्रह ( Suppression of the urge for defecation )पक्वाशयशूल , शिरःशूल , अपान वायु तथा पुरीष की अप्रवृत्ति , जंघापिण्डिका उद्वेष्टन और आध्मानस्वेदन , अभ्यंग , अवगाहन , वर्ति प्रयोग तथा प्रमाथी ( वातानुलोमक ) अन्न – पान
3.शुक्रवेगनिग्रह ( Suppression of urge for seminal discharge )मूत्रेन्द्रिय एवं वृषण में शूल , अंगमर्द , हृदयपीड़ा , मूत्र का अवरोधअभ्यंग , अवगाहन , मद्यपान , मुर्गे का मांस , शालिचावल , दुग्धसेवन , निरूहबस्ति , मैथुन
4.अधोवायु के वेग का धारण ( Sup pression of the urge for flatus )अपानवायु , मूत्र एवं पुरीष की रुकावट , आध्मान , क्लम , उदरशूलस्नेह , स्वेदन , वर्ति – प्रयोग , वातानुलोमन आहार – औषधपान तथा बस्ति
5.छर्दिवगनिग्रह ( Suppression of the urge for vomiting )कण्डू , कोठ , अरुचि , व्यंग , शोथ , पाण्डु , ज्वर , कुष्ठ , हृल्लास , वीसर्पभोजन के पश्चात् वमन , धूम पान , लंघन , रक्तमोक्षण , रूक्ष अन्नपान , व्यायाम , विरेचन
6.क्षवथुवेगनिग्रह ( Suppression of the urge for sternutation )मन्यास्तम्भ , शिरःशूल , अर्दित , अविभेदक , इन्द्रियदौर्बल्यजत्रु के ऊपर अभ्यङ्ग , स्वेद , धूमपान , नस्य , वातहर अन्न का सेवन , भोजनोत्तर घृतपान
7.उद्गारवेगनिग्रह ( Suppression of the urge for eructation )हिक्का , कास , अरुचि , कम्पन , हृदयशूल , उरःशूल ( हृदय एवं वक्ष की क्रिया में बाधा )हिक्का की तरह औषध तथा उपचार
8.जृम्भावेगनिग्रह ( Suppression of the urge for pendiculation )विनाम ( शरीर का झुकना ) , आक्षेप , संकोच , शून्यता , कम्प , प्रवेपनवातघ्न आहार , औषध तथा उपचार
9.क्षुधावेगनिग्रह ( Suppression of the urge for hunger )कृशता , दुर्बलता , विवर्णता , अंगमर्द , अरुचि , भ्रमस्निग्ध , उष्ण तथा लघु भोजन
10.पिपासावेगनिग्रह Suppression of the urge for thirst )कण्ठ तथा मुख का शोष , बधिरता , श्रम , खिन्नता ( अवसाद ) , हृदयपीड़ाशीत उपचार एवं तर्पण पान
11.बाष्पवेगनिग्रह ( Suppression of the urge for lachrymation )प्रतिश्याय , नेत्ररोग , हृद्रोग , अरुचि , भ्रमस्वप्न ( शयन – निद्रा ) , मद्यपान , प्रियकथा
12.निद्रावेगनिग्रह ( Suppression of the urge for sleep )जृम्भा , अंगमर्द , तन्द्रा , शिरोरोग , नेत्रगौरव ( आँखों में भारीपन )स्वप्न ( शयन करना ) एव संवाहन ( चपी )
13.श्रमनिश्वासवेगनिग्रह ( Suppression of the urge for deep berathing after exercise )गुल्म , हृदयरोग , सम्मोह , मूर्छाविश्राम तथा वातघ्न आहार औषध उपचार

धारणीय वेग – ( 18 ) :

  • मन के धारणीय वेग ( 9 ) लोभ , शोक , भय , क्रोध , अभिमान , निर्लज्जता . ) ईर्ष्या , अतिराग ( कामवासना ) एवं अभिध्या ।
  • वाणी के धारणीय वेग ( 5 ) परूष ( कठोर वचन ) , अधिक मात्रा में बोलना , सूचक ( चुगली ) , अनृत ( झूल बोलना ) , और अकालयुक्तस्य ( बिना अवसर की बात करना ) ।
    -शरीर के धारणीय वेग ( 4 ) – परपीड्या प्रवृत्ति ( दूसरों को कष्ट पहुँचाना ) , परस्त्रीसंभोग , स्तेय ( चोरी करना ) , हिंसा ।

व्यायाम
जो क्रिया शरीर की स्थिरता बनाए रखने वाली और बल को बढ़ाने वाली होती है उसे व्यायाम कहते हैं।

व्यायाम से लाभ
व्यायाम करने से शरीर में हल्कापन, कार्य करने का सामर्थ्य ,शरीर में स्थिरता, कष्ट सहने की शक्ति बढे हुए दोषों की चिंता और जठराग्नि की वृद्धि होती है ।
•व्यायाम के लक्षण
पसीना आना ,श्वास वृद्धि ,अंगों में हल्कापन ,ह्रदय आदि में अवरोध की प्रतिति ।
• अधिक व्यायाम करने से थकावट मन और इंद्रियों में शिथिलता ,रस आदि धातुओं का क्षय, प्यास की अधिकता ,रक्तपित्त रोग ,प्रतमक श्वास रोग ,ज्वर और वमन रोग होते हैं।


• अति व्यायाम आदि का निषेध
बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि नित्य अभ्यास रहने पर भी व्यायाम ,हंसी मजाक ,भाषण ,रास्ता चलना, स्त्री प्रसंग और रात्रि जागरण इनका अधिक मात्रा में प्रयोग ना करें।
• व्यायाम के अयोग्य पुरुष
जो व्यक्ति अधिक मैथुन ,अधिक भार को ढोने तथा अधिक मार्ग गमन से क्षीण हो गए हैं तथा जो क्रोध ,शोक, भय एवं परिश्रम से पीड़ित है साथ ही बाल ,वृद्ध, वातप्रकृति के तथा जोर से बोलने वाले हैं और जो भूखे प्यासे हैं ऐसे लोगों को व्यायाम नहीं करना चाहिए।


•शारीरिक प्रकृति
1.वात ,पित्त, कफ प्रकृति वालो को प्रकृति के विपरीत गुण वाले आहार विहार का सेवन करना चाहिए।
2.सम प्रकृति वाले सर्व रस अभ्यास करें यानी सभी रसों का उपयोग उनके लिए हितकर है।

•मलायन – शरीर के निचले भाग में दो छिद्र हैं । दो नेत्र , दो कान , दो नासिका और एक मुख — सात छिद्र शिर में हैं । इनके अतिरिक्त शरीर में स्वेद निकलने के लिए लाखों – करोड़ों की संख्या में रोमकूप या स्वेदमुख हैं । इन सबको मलायन कहा जाता है ।
दोषयुक्त और अधिक मात्रा में निकलने वाले मलों से ये कष्टमय तथा विकृत हो जाते हैं ।

•मलवृद्धि तथा मलक्षय के लक्षण — मलमार्गों के भारीपन और मल के अतिमात्रा में बाहर निकलने से मल की वृद्धि और मलमार्गों में हलकापन होने से तथा मल का संग ( अप्रवृत्ति ) होने से मल का क्षय जानना चाहिए।

•दोषों के निकालने का काल- -माधव ( वैशाख ) के पहले वाले ( चैत्र ) महीने में ( वमन द्वारा कफ का ) ;
नभस्य ( भाद्रपद ) के पहले वाले ( श्रावण ) महीने में ( बस्ति द्वारा वात का ) ;
और सहस्य (पौष) के पहले वाले ( अगहन ) महीने में ( विरेचन द्वारा पित्त का ) दोषसञ्चय निकाल देना चाहिए ।

•निज रोग प्रतिषेधक उपाय : -हेतु विपरीत , व्याधि विपरीत तथा हेतु व्याधि विपरीतकारी औषध , अन्न एवं विहार से साध्य रोगों की चिकित्सा करना , पंचकर्म का क्रमिक प्रयोग तदन्तर रसायन बाजीकरण का प्रयोग ।
•आगन्तुक रोग प्रतिषेध उपाय : – प्रज्ञापराध का परित्याग , देश – काल का ज्ञान , स्वस्थवृत्त पालन और आप्तोपदेश का ज्ञान , सत्संग , सहचर्य एवं असत्संग का परित्याग ।

•दधि सेवन विधि : –
( 1 ) रात्रि में एवं गर्म करके दधि नहीं खाना चाहिए ।
( 2 ) घृत / शर्करा / मुदगयूष / मधु / ऑवले – को बिना मिलाए दहीं न खाये ।
•अन्यथा उपद्रव- ज्वर , रक्तपित्त + कुष्ठ , विसर्प + पाण्डु , कामला + भ्रम रोग रोग होने की संभावना रहती है।

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