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MRIT SHRIR SHODHAN EVAM SANRAKSHAN

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मृत शोधन एवं संरक्षण या मृत शरीर का शोधन और संरक्षण

• शव संरक्षण एवं शवच्छेदन की पद्धति •

अतः शरीरगत अंग – प्रत्यंगों का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करने के लिए ,
जिसके शरीर में सम्पूर्ण अंग – प्रत्यङ्ग हों ,
जिसकी मृत्यु विष ( Poison ) से न हुई हो ,
जो दीर्घकाल तक व्याधि से पीड़ित न हुआ हो ,
जिसकी आयु सौ वर्ष से कम हो ,
शरीर पर लगा हुआ आन्त्रगत मल साफ किया गया हो , ऐसे मृत शरीर को तेजी से न बहने वाली नदी में , पिञ्जरे में बाँधकर , मुञ्ज ( वृक्षों की छाल ) , वल्कल ( पेड़ का छिलका ) , कुश , सन ( शण ) इनमें से किसी एक वस्तु से अंग – प्रत्यंगों को लपेटकर अप्रकट स्थान ( अन्धेरे ) में सड़ावें ।
फिर सात दिन के बाद भली – भाँति सड़े हुए उस मृत शरीर को नदी से बाहर निकालकर पिञ्जरे तथा मुञ्जादि आवरण को हटाकर , उशीर ( खस ) , बाल , वेणु ( बांस ) , वल्कल ( वृक्ष की छाल ) , इनमें से किसी एक से तैयार की हुई कूँची से धीरे – धीरे खुरचते ( घिसते ) हुए पूर्वोक्त सब त्वचाओं को बाह्य तथा आभ्यन्तर अंग – प्रत्यंगों को आँखों से देखें ।

• आचार्य सुश्रुत के समय में संरक्षण एवं मृतशोधन पद्धति

१. संरक्षण से पूर्व मृत शरीर की परीक्षा व सावधानियाँ या पूर्वकर्म
( i ) जिस शव में पूर्ण अंग – प्रत्यंग हों ।
( ii ) जिसकी मृत्यु दीर्घकालीन व्याधियों से न हुई हो ।
( iii ) जिसकी मृत्यु विष प्रयोग से न हुई हो । ।
( iv ) जिसकी आयु सौ वर्ष से कम हो ।

२. संरक्षण विधि ( Preparation of the dead body ) – ऐसे मृत शरीर को मुंज , छाल , कुश अथवा शण आदि के द्वारा भलीभाँति लपेटकर , पिंजरे में रखकर तेज न बहने वाली नदी के जल में डुबोकर बाँध देना चाहिए ।

३. शवच्छेदन ( Dissection ) – सात दिन बाद भलीभाँति फूले हुए शव को नदी से बाहर निकालकर और पिञ्जरे तथा मूंज आदि के आवरण को हटाकर खस , बांस , छाल अथवा बालों द्वारा निर्मित कूची से धीरे – धीरे घर्षण कर , त्वचा आदि बाह्य और आभ्यन्तर अंग – प्रत्यंगों को प्रत्यक्ष करना चाहिए ।

इस विधि को हम अकर्तनक शवच्छेदन ( Blunt dissection ) के नाम से जान सकते हैं ।
जो सूक्ष्म रचना को भी बिना क्षति के देखने या खोज लेने की सर्वोत्तम विधि है । उपर्युक्त विधि से चर्मचक्षुओं द्वारा शरीर के स्थूल अंग प्रत्यंगों का देख सकना तो सम्भव है , परन्तु शरीरगत सूक्ष्म भावों का ज्ञान तपश्चक्षुओं द्वारा ही सम्भव है ।

• आधुनिक समय में संरक्षण एवं मृतशोधन पद्धति

( १ ) संरक्षण से पूर्व मृत शरीर की परीक्षा व सावधानियाँ या पूर्वकर्म

१. इस प्रक्रिया में मृत्यु होते ही शव को ग्रहण करके संरक्षित कर लिया जाता है।
२. जिस शव में पूर्ण अंग – प्रत्यंग हों ।
३. अंग – प्रत्यंग कटे – फटे न हो ।
४. जिसकी मृत्यु दीर्घकालीन व्याधियों से न हुई हो ।
५. मृत शरीर किसी संक्रामक रोग से पीड़ित न हो ।
६. जिसकी मृत्यु विष प्रयोग से न हुई हो ।
७. Post – mortem की हुई Body न हो ।
८. जिसकी आयु लगभग ५५-६० वर्ष से अधिक न हो ।

( २ ) संरक्षक द्रव्य ( Preservative fluid )

Carbolic acid or phenol- 1Lt .
Formaline- 4 Lt.
Glycerine – 2 Lt.
Spirit – 3Lt .
Terpentine oil – 300 ml .
Water – 3 Li . .

रंजक द्रव्य ( Staining fluid )
Red lead – 200 mg
Water – 2Lt .
इन सभी को मिलाकर संरक्षक द्रव्य तैयार करते हैं ।

( ३ ) संरक्षण विधि ( Preservation of dead body ) –

मृत शरीर को शवच्छेदन कक्ष ( Dissection hall ) में शवच्छेदन मेज ( Dissection table ) पर उत्तान स्थिति ( Supine position ) में लेटाकर उसके दक्षिण ( Rt . ) या वाम ( Lt. ) भाग में Ant . sup . spine और Pubic tubercle के बीच Inguinal ligament होता है । उसके 4 cm नीचे Incision लगाते हैं । वहाँ Femoral sheath मिलती है , जिसके अन्दर Lateral side में Femoral artery और Medial side में Femoral vein मिलती है । Femoral artery के द्वारा हम Preservative fluid body में पहुँचाकर Dead body का Preservation करते हैं । या Lt. common carotid artery से Dead body को Preserve करते हैं ।

•मृतशोधन का महत्व ( Importance of dissection )
१. शारीरिक अवयवों की गणना हेतु ।
२. अंग – प्रत्यंगों की रचना की दृष्टि से ज्ञान हेतु ।
३ विभिन्न अवयवों के अवस्थानुसार परिवर्तन एवं उनकी स्थिति ( Position ) के ज्ञान हेतु ।
४ चिकित्सा एवं शल्य कर्म में सफलता प्राप्ति हेतु ।
५. मृत शरीर अवयवों के ज्ञान से जीवित प्राणी की प्रक्रियाओं के ज्ञान हेतु ।
६. शरीर क्रिया , शरीर रचना एवं शल्य शास्त्र के ज्ञान हेतु

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