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MISHRAK GAN PART -2

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मिश्रक गण भाग – 2

( 7 ) त्रिकटु

घटक द्रव्य – शुण्ठी ( विश्वा ) , पिप्पली ( उपकुल्या ) और काली मरिच को समपरिमाण ( वजन से ) में मिलाने पर इसकी संज्ञा ‘ त्रिकटु ‘ हो जाती है । इस गण के तीनों द्रव्य कटु रस होने के कारण इसकी संज्ञा ‘ त्रिकटु ‘ है ।

पर्याय – कटुत्रिक , त्रिकटु , त्र्यूषण और व्योष – ये सब पर्यायवाची शब्द हैं ।
गुण कर्म –
रस – कटु
विपाक – कटु
वीर्य- उष्ण
गुण – लघु , रूक्ष
दोष कर्म – वातकफशामक , पित्तवर्धक ।
दैहिक कर्म – यह श्वास – कास – त्वचारोग – गुल्म – प्रमेह – स्थौल्य – मेदोरोग – श्लीपद – पीनस रोग नाशक है । दीपन होने के कारण यह अग्निमान्द्य नाशक है ।

( 8 ) चतुरूषण

त्रिकटु ( सोंठ , मरिच , पिप्पली ) में पिप्पली मूल मिलाने पर इसे ‘ चतुरूषण ‘ कहते हैं ।

गुण कर्म – जो गुण – कर्म त्रिकटु के बताये गए हैं , वही सब गुण चतुरूषण में अधिक रूप में होते हैं ।

( 9 ) त्रिमद

घटक द्रव्य – विडंग , मुस्तक और चित्रक – इन तीनों के सम परिमाण मिश्रण को त्रिमद कहते हैं ।

( 10 ) त्रिजातक

घटक द्रव्य – त्वक् ( दालचीनी ) , छोटी इलायची और तेजपत्र के सम परिमाण मिश्रण को त्रिजातक या त्रिसुगन्धि कहते हैं ।

गुण कर्म – आगे चतुर्जातक के बताये गए सभी गुणकर्म त्रिजातक के भी हैं ।

( 11 ) चतुर्जातक

घटक द्रव्य – त्रिजातक ( त्वक् , एला , तेजपत्र ) में नागकेशर मिलाने पर इसे चतुर्जातक कहते हैं ।

गुण कर्म
रस- कटु तिक्त मधुर कषाय
गुण – तीक्ष्ण , लघु , रूक्ष
दोष कर्म- पित्तवर्धक एवं वातकफहर ।
दैहिक कर्म – दीपन , रोचन , मुखदौर्गन्ध्य नाशन , विषघ्न और वर्ण्य ।
विपाक – कटु
वीर्य – नात्युष्ण

( 12 ) कटुचतुर्जातक
घटक द्रव्य – त्रिजातक ( छोटी एला , त्वक् और तेजपत्र ) में मरिच मिलाने पर ‘ कटुचतुर्जातक ‘ गण बनता है ।

गुण कर्म –
रस – कटु तिक्त मधुर
वीर्य – उष्ण
विपाक – कटु
गुण – लघु , रूक्ष , तीक्ष्ण
दोषकर्म- पित्तवर्धक एवं वातकफ शामक ।
दैहिक कर्म – दीपन , रोचन , मुखदौर्गन्ध्यनाशन ।

( 13 ) चतुर्बीज
घटक द्रव्य – मेथी , चन्द्रशूर , मंगरैल ( कालाजाजी ) तथा यवानी – इन चारों के बीजों को एकत्र रूप में ‘ चतुर्बीज ‘ कहते हैं ।

गुण कर्म –
गुण- लघु
विपाक- कटु
वीर्य- उष्ण
रस – कटु रस प्रधान
दोषकर्म – कफवात शामक
दैहिक कर्म – वातरोग , अजीर्ण , कटिशूल , आध्मान और पार्श्वशूल नाशक है।

( 14 ) पञ्चकोल

घटकद्रव्य- पिप्पली , पिप्पलीमूल , चव्य , चित्रक और शुण्ठी- इन पांचों द्रव्यों को एक – एक कोल परिमाण में मिलाने पर पञ्चकोल बनता है । इस गण का नाम पञ्चकोल होने में दो कारण हैं- पिप्पली इस गण का प्रधान ( पहला ) द्रव्य है और पिप्पली का पर्याय ‘ कोल ‘ है ।
दूसरा – इस गण में प्रत्येक द्रव्य एक कोल ( आधा कर्ष ) परिमाण में मिलाया जाता है । इस गण के सभी द्रव्य उष्णवीर्य होने के कारण इस गण को ‘ पञ्चोष्ण ‘ भी कहते हैं।

गुण कर्म ‘ –
रस – कटु
विपाक- कटु
वीर्य -उष्ण
गुण – लघु , तीक्ष्ण
दोष कर्म – पित्तवर्धक , वातकफ शामक ।
दैहिक कर्म – रोचन , पाचन , श्रेष्ठ दीपन है । गुल्म – प्लीहारोग – उदररोग – आनाह और शूल रोग नाशक है ।

( 15 ) षडूषण

घटक द्रव्य – पञ्चकोल ( पिप्पली , पिप्पलीमूल , चव्य , चित्रक और शुण्ठी ) में काली मरिच मिलाने से इसकी संज्ञा ‘ षडूषण ‘ हो जाती है । इस गण के सभी छ : घटक द्रव्य उष्ण वीर्य होने के कारण इसकी संज्ञा ‘ षडूषण ‘ है ।

गुण कर्म – इस गण के गुण कर्म पञ्चकोल के समान ही हैं लेकिन इसमें विशेष रूप से रूक्ष , उष्ण और विषहर गुणकर्म पञ्चकोल से अधिक मात्रा में होते हैं ।

( 16 ) अष्टवर्ग

घटक द्रव्य – जीवक , ऋषभक , मेदा , महामेदा , काकोली , क्षीरकाकोली , ऋद्धि और वृद्धि- इन आठ द्रव्यों के गण को ‘ अष्टवर्ग ‘ कहते हैं ।

गुण कर्म –
रस – मधुर
विपाक – मधुर
वीर्य – शीत
गुण – गुरू
दोषकर्म- वातपित्त शामक , कफवर्धक ।

( 19 ) उपविष – अर्कक्षीर , स्नुहीक्षीर , लांगली , करवीर , गुञ्जा , अहिफेन और धत्तूरा ये सातों ‘ उपविष ‘ कहलाते हैं ।

• जांगम गण विवेचन

( 1 ) क्षीराष्टक – भेड़ी , बकरी , गाय , भैंस , ऊँटनी , हथिनी , घोड़ी और स्त्री- इन आठों प्राणियों के दूध को ‘ क्षीराष्टकगण ‘ कहते हैं ।

दुग्ध के सामान्य गुणकर्म – प्राय : सभी दुग्ध का
रस – मधुर
वीर्य – शीत
विपाक- मधुर
गुण- स्निग्ध
दोषकर्म- वातपित्तशामक और कफवर्धक होता है ।
दैहिक कर्म – प्राय : सभी दुग्ध स्तन्यजनन , प्रीणन , बृंहण , वृष्य , मेध्य बल्य , जीवनीय और श्रमहर होते हैं । पाण्डु – अम्लपित्त – शोष – गुल्म अतिसार – जीर्णज्वर – दाह – उदररोग – शोथ – योनिरोग – शुक्रदोष – मूत्ररोग – प्रदर – विबन्ध तथा वात – पित्तज रोग से पीड़ित प्राणियों के लिए सभी दुग्ध पथ्य हैं ।

( 2 ) मूत्राष्टक – भेड़ , बकरी , गाय , भैंस , हाथी ऊँट , घोड़ा और गदहा – इन आठों के मूत्र को ‘ मूत्राष्टक गण ‘ संज्ञा दी गई है ।

मूत्रों के सामान्य गुण कर्म’- प्रायः सभी मूत्रों का
रस- कटु
विपाक- कटु
वीर्य- उष्ण
गुण- तीक्ष्ण , अरूक्ष
दोषकर्म – वातकफशामक और पित्तवर्धक होता है ।
दैहिक कर्म – प्राय : सभी मूत्र विषघ्न , अग्निदीपक , कृमिघ्न , वातानुलोमन और पित्तविरेचक होते हैं । आनाह – अर्श – गुल्म – कुष्ठ – किलास और उदर रोग नाशक होते हैं । पाण्डु रोग से पीड़ित प्राणियों के लिए विशेष रूप से कल्याणकारी होते हैं ।

( 3 ) पित्तपञ्चक – मछली , गाय , घोड़ा , मनुष्य और मयूर – इन पाँचों के पित्त को ‘ पित्तपञ्चक गण ‘ संज्ञा दी गई ।

पित्त के सामान्य गुण कर्म
रस – कटु ( विदग्धावस्था में अम्ल )
विपाक – कटु
वीर्य- उष्ण
गुण – लघु , तीक्ष्ण
दोषकर्म – वातकफशामक एवं पित्तवर्धक होता है ।
दैहिक कर्म – दीपन , पाचन , रोचन , मुखशोधक , हृदयोत्तेजक , रक्तस्त्रावकर , अवृष्य , लेखन , कर्शन और विषघ्न ।

•पार्थिव गण विवेचन

(1 ) एक – द्वि – त्रि – चतुः – पञ्चलवण

एक लवण – सैन्धव ।
द्वि लवण – सैन्धव और सौवर्चल ।
त्रि लवण – सैन्धव , सौवर्चल और विड लवण ।
चतुर्लवण – सैन्धव , सौवर्चल , विड और सामुद्र लवण ।
पञ्च लवण या लवण पञ्चक – सैन्धव , सौवर्चल , विड , सामुद्र और सांभर लवण ।

लवणों के सामान्य गुण कर्म
रस- लवण
विपाक- मधुर
वीर्य- उष्ण ( सैन्धव शीतवीर्य ) ।
गुण- तीक्ष्ण , स्निग्ध , सर , विकासी , अधःस्त्रंसन ( नीचे की ओर बहने का स्वभाव वाला ) ।
दोषकर्म – वातशामक , कफविष्यन्दक ( पतला करने वाला ) ।
दैहिक कर्म – अजीर्ण – आनाह – वातविकार – गुल्म – शूल , उदर रोग नाशक होते हैं । दीपन पाचन , क्लेदन , भेदन , अवकाशकर ( स्थान को रिक्त करने वाले ) होते हैं ।

( 2 ) क्षार द्वयः – स्वर्जिका क्षार ( सज्जीक्षार ) और यवक्षार को ‘ क्षारद्वय गण ‘ संज्ञा दी गई है ।

( 3 ) क्षारत्रय – क्षारद्वय ( सज्जीक्षार • यवक्षार ) में टङ्कण मिलाने पर ‘ क्षारत्रय ‘ कहलाता है।

( 4 ) क्षाराष्टक

घटक दव्य – पलाश , वजी ( स्नुही ) , शिखरी ( अपामार्ग ) , चिञ्चा , अर्क और तिलनाल – इन सबका क्षार , यवक्षार और स्वर्जिका क्षार को ‘ क्षाराष्टक गण ‘ कहते हैं ।

क्षारों के सामान्य गुण कर्म

वीर्य- उष्ण
गुण- तीक्ष्ण , लघु और रूक्ष
दोषकर्म – कफछेदन होता है ।
दैहिक कर्म – क्लेदजनन , दीपन , पाचन , विदारण ( विद्रधि , व्रण आदि को फाड़ने वाले ) , दाहजनन एवं अग्नि के समान कर्म करने वाले होते हैं ।

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