fbpx

MISHRAK GAN PART -1

by

मिश्रक गण भाग – 1

औद्भिद द्रव्य गण विवेचन

( 1 ) विविध पञ्चमूल – महर्षि सुश्रुत ने पञ्च ( पांच ) पञ्चमूलों का वर्णन किया है । इसके अन्तर्गत लघु पञ्चमूल , बृहत् पञ्चमूल , वल्ली पञ्चमूल , कण्टक पञ्चमूल और तृण पञ्चमूल आते हैं।

•विपाक- मधुर
( क ) लघु पञ्चमूल
घटक द्रव्य – शालपर्णी , पृश्निपर्णी , वार्ताको ( बृहती ) , कण्टकारी और गोक्षुर- इन पांच द्रव्यों के मूल को सम परिमाण में ग्रहण करने पर यह लघुपञ्चमूल कहलाता है । इस गण के सभी घटक द्रव्य छोटे क्षुप आतीय हैं इसलिए इसे लघु पञ्चमूल संज्ञा दी गई है । राजनिघण्टुकार ने इस गण को ‘ पञ्चगण ‘ संज्ञा दी है ।

गुण कर्म-
रस – मधुर ( भा ० प्र ० , वाग्भट्ट ) कषाय , तिक्त , मधुर ( सुश्रुत )
गुण – लघु
वीर्य – नात्युष्ण ( अनुष्ण )
विपाक – मधुर
दोषकर्म – वातपित्तहर ( सुश्रुत ) , सर्वदोपहर ( वाग्भट्ट )
दैहिक कर्म – बल्य , बृहण , ज्वरहर , श्वासहर , अश्मरीनाशन ।

( ख ) बृहत पञ्चमूल ‘
घटक द्रव्य – विल्व , सर्वतोभद्रा ( गम्भारी ) , पाटला , गणिकारिका ( अग्निमन्थ ) , श्योनाक

गुण कर्म –
रस – तिक्त कषाय मधुर ( भा ० प्र ० ) , कषाय तिक्त ( वा ० ) , तिक्त रस एवं मधुर अनुरस ( सु ० )
विपाक – लघु ( सुश्रुत )
गुण- लघु
वीर्य – उष्ण
दोषकर्म – कफवातहर
दैहिक कर्म- श्वासहर , कासहर , दीपन ।

( ग ) दशमूल ‘
घटक द्रव्य – लघु पञ्चमूल और बृहत् पञ्चमूल को एकत्र रूप में ग्रहण करने पर यह गण ‘ दशमूल ‘ कहलाता है।

गुण कर्म-
रस -तिक्त कषाय मधुर
वीर्य – उष्ण
गुण – लघु
दोषकर्म – त्रिदोषघ्न
दैहिक कर्म- श्वास – कास – शिरःशूल- तन्द्रा – शोध – ज्वर – आनाह – पाचशूल और अरूचि नाशक है । सुश्रुत ने इसे आमपाचक और सर्वज्वरहर भी कहा है।।

( घ ) वल्ली पञ्चमूल

घटक द्रव्य – विदारी , सारिवा , रजनी ( मञ्जिष्टा ) , गुडूची और मेषशृङ्गी-

गुणकर्म
दोषकर्म – पित्त एवं कफहर ।
दैहिक कर्म – रक्तपित्तहर , त्रिविध ( वातिक , पैत्तिक एवं श्लैष्मिक ) शोथहर , सभी प्रकार के प्रमेह का नाशक एवं शुक्रदोषहर ।

( च ) कण्टक पञ्चमूल

घटक द्रव्य – करमर्द , गोक्षुर ( त्रिकण्टक ) , सैरेयक , शतावरी एवं हिंस्त्रा ( गृध्रनख्य )

गुणकर्म – महर्षि सुश्रुत ने वल्ली पञ्चमूल और कण्टक पञ्चमूल के गुण कर्म समान बताये हैं ।

आचार्य वृद्धवाग्भट्ट ने कण्टक पञ्चमूल को सर्वदोषहर कहा है ।

( छ ) तृणपञ्चमूल

घटक द्रव्य – कुश , काश , नल दर्भ , काण्डेक्षु

गुणकर्म –
वीर्य – शीत
दोषकर्म – पित्तहर
दैहिक कर्म – मूत्रजनन है , मूत्रकृच्छ्र एवं रक्तपित्तहर है ।

( ज ) मध्यम पञ्चमूल
घटक द्रव्य – बला , पुनर्नवा , एरण्ड , मुद्गपर्णी , माषपर्णी
इस गण के सभी द्रव्य मध्यम ऊंचाई के क्षुप जातीय वृक्ष हैं इसलिए इसकी संज्ञा ‘ मध्यम पञ्चमूल ‘ है ।

गुण कर्म –
गुण- लघु , सर ।
वीर्य – किंचित् उष्ण ।
दोषकर्म – कफवातहर ।
दैहिक कर्म – विबन्धनाशन ।

( झ ) जीवनीय पञ्चमूल
घटक द्रव्य – अभीरू , वीरा , जीवन्ती , जीवक और ऋषभक इन पाँच द्रव्यों की मूल एकत्र रूप में ‘ जीवनीय पञ्चमूल ‘ कहलाती हैं ।

गुण कर्म
गुण – लघु
दोष कर्म – वातपित्तहर
दैहिक कर्म – जीवनीय , चक्षुष्य , वृष्य ।

( 2 ) पञ्चवल्कल

घटकद्रव्य- न्यग्रोध ( वट ) , उदुम्बर , अश्वत्थ , पारीप ( पारस पीपल ) , प्लक्ष
इन पाँचों वृक्षों के गण को ‘ पञ्चक्षीरी वृक्ष ‘ भी कहते हैं क्योंकि इनके पत्र – पुष्पादि को तोड़ने पर दूध ( क्षीर ) निकलता है ।
गुण कर्म –
रस – कषाय प्रधान
गुण – रूक्ष
विपाक – कटु
वीर्य – शीत
दोषकर्म – पित्त कफ नाशन
दैहिक कर्म – वर्य , ग्राही , भग्न सन्धानकर है । मेदहर , विसर्प – शोथ – व्रण – योनिरोग रक्तजविकार नाशन है ।

( 3 ) पञ्चपल्लव
घटकद्रव्य- आम ( आम्र ) , जामुन , कपित्य ( कैंथ ) वीजपुर ( विजौरा निम्बु ) , बिल्व ।

उपयोग – इस गण का उपयोग तैलकल्पना निर्माण में तैल की दुर्गन्ध नाशन एवं सुगन्ध वर्धन हेतु होता है ।

( 4 ) पञ्चतिक्त

घटकद्रव्य- गुडूची , निम्बमूलत्वक , वासा , कण्टकारी और पटोलपत्र को एकत्र रूप में पञ्चतिक्त ‘ कहते हैं ।

गुण कर्म
विपाक – कटु
रस – तिक्त
वीर्य – शीत
गुण – लघु , रूक्ष
दोषकर्म – पित्तकफ शामक ।
दैहिक कर्म – दीपन , पाचन , स्तन्यशोधन है ।
विष कृमि – अरूचि – मूछा – दाह – कण्ड् – कुष्ठ तृष्णा – ज्वर और अग्निमान्द्य नाशक है ।

( 5 ) अम्ल पञ्चक

घटकद्रव्य – अम्लवेतस , जम्बीर , मातुलुङ्ग , निम्बुक और नारङ्ग-
राजनिघण्टु में दो अन्य अम्लपञ्चकों का वर्णन मिलता है जिनके घटक द्रव्य निम्नलिखित हैं ( i ) कोल , दाडिम , वृक्षाम्ल , चुल्लकी और अम्लवेतस – इन पांच द्रव्यों के फल । ( ii ) जंबीर , नारंग , अम्लवेतस , तिन्तिडीक और बीजपूरक – इन पांच द्रव्यों के फल ।

गुण कर्म –
रस -अम्ल
विपाक – अम्ल
वीर्य – उष्ण
दोषकर्म – पित्तवर्धक
दैहिक कर्म – यह गण रोचन , दीपन , पाचन , प्रीणन , बृंहण , बल्य , वातानुलोमन , हृद्य , लालास्त्रावकर , मनः प्रसादन और इन्द्रिय स्थैर्यकर है ।

( 6 ) त्रिफला –

आयुर्वेदीय शास्त्रों में त्रिफला नाम से चार गणों का वर्णन मिलता है – कषाय त्रिफला या त्रिफला , मधुर त्रिफला , स्वल्प त्रिफला और सुगन्धि त्रिफला ।
यदि कहीं पर मात्र त्रिफला शब्द का प्रयोग किया जाता है तो वहाँ कषाय त्रिफला अर्थ लेना चाहिए ।

( क ) कषाय त्रिफला या त्रिफला ‘

हरीतकी ( हरड़ ) , विभीतक ( बहेड़ा ) और आमलकी ( आंवला ) का तोल की दृष्टि से समपरिमाण में मिश्रण त्रिफला कहलाता है ।

त्रिफला के पर्याय- फलनिक , त्रिफला , वरा , महतो त्रिफला , कषाय त्रिफला ( कषाय रस प्रधान होने कारण ) ।

गुण कर्म –
रस – कषाय रस प्रधान ( शेष अनुरस )
वीर्य – अनुष्णशीत
गुण- सर
विपाक- मधुर
दोष कर्म – त्रिदोषहर लेकिन कषाय रस प्रधान होने के कारण विशेषतः कफपित्त शामक है । इसके घटक द्रव्यों में हरड़ वातघ्न , आंवला पित्तन और विभीतक कफघ्न है ।

दैहिक कर्म – प्रमेह , कुष्ठ , नेत्ररोग , विषमज्वर नाशक है । सरगुण के कारण वायु अवरोध , वायु विबन्ध एवं मल विबन्ध नाशक है । दीपन होने से मन्दाग्नि एवं आमविषनाशक है । रूचिकर होने से अरूचिनाशक है ।

( ख ) मधुर त्रिफला

घटक द्रव्य – द्राक्षा , काश्मर्य और खजूर – इन तीनों के फलों को तौल की दृष्टि से सम परिमाण में मिलाने पर मधुर त्रिफला बनता है ।
गुण कर्म –
रस – मधुर
वीर्य – शीत
गुण – स्निग्ध , गुरू
दोषकर्म – पित्तशामक ।
दैहिक कर्म – रक्तपित्त , वृष्णा , दाह , रक्ताल्पता नाशक । विपाक- मधुर

( ग ) स्वल्पत्रिफला
घटक द्रव्य – काश्मर्य ( गम्भारी ) , खजूर और परूषक ( फालसा ) – इन तीनों के फलों को भार की दृष्टि से सम परिमाण में मिलाने पर यह ‘ स्वल्प त्रिफला ‘ कहलाता है ।

रस – मधुर
विपाक – मधुर
वीर्य शीत
गुण – स्निग्ध
दोष कर्म – पित्तशामक ।
दैहिक कर्म – मधुरत्रिफला के समान ।

( घ ) सुगन्धि त्रिफला
घटक द्रव्य – जातीफल , लवङ्गकलिका ( फल ) और पूगफल ( सुपारी ) के सम परिमाण मिश्रण को सगन्धि त्रिफला कहते हैं । इसी को ‘ सुरभि त्रिफला ‘ भी कहते हैं ।
उपयोग – यह गण मुखदौर्गन्ध्यनाशक और रूचिकर है ।

Leave a Comment

error: Content is protected !!