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MEDA DHATU

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मेद धातु

• मेद की उत्पत्ति

“मांसान्मेदः प्रजायते ।। “(च ० चि ० 15/15 , सू ० सू ० 14/11 , अ ० हृ ० शा ० 3/62)

मांस से मेद की उत्पत्ति होती है।

• मेद के कार्य

“मेदः स्नेहस्वेदौ दृढ़त्वं पुष्टिमस्थ्नां च ।। “(सु ० सू ० 15/6)

मेद शरीर में स्निग्धता उत्पन्न करता है , श्वेद को उत्पन्न करता है तथा शरीर में दृढ़ता उत्पन्न करता है और अस्थियों की पुष्टि करता है ।

• मेद का शरीर में परिमाण

“द्वौ ( अञ्जली ) मेदसः ।।”( च ० शा 07 / 16)

शरीर में मेद की मात्रा दो अञ्जलि परिमाण में होती है ।

•मेदसार पुरुष के लक्षण

“वर्णस्वरनेत्रकेशलोमनखदन्तौष्ठमूत्रपुरीषेषु विशेषतः स्नेहो मेदःसाराणाम् ।
सा सारता वित्तैश्वर्यसुखोपभोगप्रदानान्यार्जवं सुकुमारोपचारता चाचष्टे ।।”( च ० वि ० 8/106)

चिकलामेदसर पुरुष के वर्ण , स्वर , नेत्र , केश , रोम , नख , दन्त , ओष्ठ , मूत्र और पुरीष स्निग्ध होते हैं ।
धन , ऐश्वर्य एवं सुखों का उपभोग , दानशीलता , सुकुमारता और सेवाभाव मेदसार होने का सूचक है ।

• मेदक्षय के लक्षण

शरीर में मेदक्षय के कारण संधियों में स्फुटन ( टूटने की पीड़ा ) तथा शून्यता प्रतीत होती है । नेत्रों में ग्लानि ( निष्प्रभता ) प्लीहावृद्धि , शरीर में रूक्षता बढ़ जाती है । स्निग्ध पदार्थों के अभाव के कारण उदर एवं शरीर कृश हो जाता है । स्निग्ध पदार्थों के सेवन की इच्छा बढ़ जाती है।

• मेदवृद्धि के लक्षण

शरीर में मेद की अतिवृद्धि से शरीर में स्निग्धता बढ़ जाती है । उदर , पार्श्व , स्तन , नितम्ब आदि में विशेष रूप से मेद एकत्रित हो जाता है । शरीर से दुर्गन्ध आने लगती है । स्वल्प चेष्टा एवं श्रम से ही श्वास फूल जाती है ऐसा व्यक्ति अतिस्थूल कहलाता है ।

• मेद का मल

“मलं स्वेदस्तु मेदसः ।।”

मेद का मल स्वेद होता है ।

• स्वेद

• स्वेद के कार्य
रस रक्तादि धातुओं में स्थित वातादि दोष स्नेह से क्लेदित होकर शरीर से स्वेद के द्रव भाग को प्राप्त कर कोष्ठ से स्वेद वहन करने वाले , स्वेदवह स्रोतों द्वारा बाहर निकल जाते हैं । इस प्रकार स्वेद त्वचा को आर्द्र तथा कोमल बनाता है तथा वात एवं उससे उत्पन्न विकारों को नष्ट करता है।

•स्वेदक्षय के लक्षण

स्वेद के क्षय होने पर रोमकूप बन्द हो जाते हैं । त्वचा शुष्क हो जाती है , रोम झड़ने लगते हैं , स्पर्शज्ञान यथोचित नहीं होता है तथा स्वेद आना बन्द हो जाता है ।

• स्वेदवृद्धि के लक्षण

स्वेद की ( सामान्य से अधिक ) वृद्धि से त्वचा में दुर्गन्ध तथा कण्डू ( खुजली ) उत्पन्न होती है।

• स्नायु

-उत्पत्ति
“मेदसः स्नायुसम्भवः ।।”( च ० चि ०15 / 16)

स्नायु उत्पत्ति मेद से होती है ।

•स्नायुओं की संख्या

” नव स्नायुशतानि ।।”
शरीर में स्नायु नौ सौ होते हैं ।

• स्नायु के कार्य

जिस प्रकार अनेकों तख्तों को भलीभान्ति बन्धनों से बांधकर बनाई हुई नाव जल में भार उठाने में समर्थ होती है , इसी प्रकार शरीर की सन्धियां स्नायुओं से बन्धी हुई होने के कारण मनुष्य शरीर का भार उठाने में समर्थ रहती हैं ।

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