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MATRASHITIYAMADHYAY

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मात्राऽशितीयमध्यायं

• सम्यक् आहार-

सभी समयों ( स्वस्थावस्था और रोगावस्था ) में व्यक्ति को मात्रा में आहार सेवन करने वाला होना चाहिये , मात्रावत् आहार अग्नि ( जठराग्नि ) को प्रवृत्त करने वाली होती है । सभी गुरु ( Heavy ) और लघु ( Light ) द्रव्य मात्रा की अपेक्षा करते हैं ।

• अजीर्ण में भोजन का परिणाम-

अतिमात्रा में सेवन किये गये आहार से पीड़ित ( दबे हुये ) वातादि दोष उस आम ( अपक्व ) एवं दूषित आहार द्वारा एक साथ ( युगपत्तेन ) कुपित होकर और उसी आम अन्न में मिश्रित होकर विष्टम्भ ( आमाशय में अवरोध ) उत्पन्न करते हुये ‘ अलसक रोग ‘ को उत्पन्न करता है , या आम अन्न को ऊर्ध्व मार्ग ( वमन ) एवं अधो मार्ग ( विरेचन ) के द्वारा बाहर निकालते हुये असंयमी ( अजितात्मनः ) पुरुष में ‘ विसूचिका रोग ‘ को उत्पन्न करता है ।

• अलसक का लक्षण- इसमें आहार न तो ऊर्ध्व मार्ग ( मुख से वमन के द्वारा ) , न अधोमार्ग ( गुदा से- विरेचन के द्वारा ) से बाहर निकलता है और न पचता ( Digest होता ) है । आमाशय ( Stomach ) में आलसी के समान गतिहीन होकर पड़ा रहता है , इसीलिये इसे ‘ अलसक ‘ रोग कहते हैं ।

• विसूचिका के लक्षण- अत्यधिक कुपित वातादि दोष अनेक प्रकार के वेदनाओं को उत्पन्न करके शरीर ( गात्राणि ) के अंगों में सूई के चुभने के समान ( विध्यति ) पीड़ा उत्पन्न करते हैं , इसलिये इसे ‘ विसूचिका ‘ कहते हैं ।

• दण्डालसक के लक्षण- अत्यन्त दूषित और दूषित आम दोषों से अवरुद्ध स्रोतसों ( खा ) वाले दोष जब तिर्यक् ( तिरछे ) गति से जाकर सम्पूर्ण शरीर को दण्डे ( Rod – like ) के समान स्तब्ध ( Stiff ) बना देते हैं , तब इसे ‘ दण्डालसक ‘ कहते हैं । इस दण्डालसक रोग की चिकित्सा नहीं करनी चाहिये क्योंकि यह शीघ्र ही मृत्युकारक होता है।

• अलसक की चिकित्सा-

अत : आम ( अपक्व ) आहार को जो निष्क्रिय अवस्था में ( अलसीभूत ) आमाशय पड़ा हो उसे शीघ्र ही ( त्वरित ) वमन के द्वारा ( उल्लिखेत् – जैसा लिखा गया है ) बाहर निकाल देना चाहिये । वच ( Eng.- Sweet – Flag . L.N. Acorus calamus Linn . ) , नमक और मदनफल ( Eng.- Emetic – Nut ) मिला हुआ उष्ण जल पिलाकर वमन कराते हैं । वमन के बाद स्वेदन ( Fomentation ) कराते हैं और वायु तथा मल के अनुलोमन ( उचित मार्ग से निकलना ) के लिये फलवर्ती का प्रयोग करते हैं । जो अङ्ग ( शरीर का ) बहुत संकुचित ( नाम्यमानानि ) हो गये हों उन्हें अत्यधिक स्वेदित ( Foment ) कर वस्त्र से लपेट ( वेष्टयेत् ) देना चाहिये।

•  विसूचिका में चिकित्सा- विसूचिका रोग के अत्यधिक बढ़ जाने पर पार्णियों ( एड़ी – Ankle ) में दाह कर्म करते हैं । दाह के बाद रोगी को उस दिन उपवास ( लंघन – Fasting ) कराते हैं और उसके बाद विरेचन के पश्चात् समान चिकित्सा ( पेयादि क्रम ) करते हैं ।

• अजीर्ण में चिकित्सा- अजीर्ण के रोगी को अत्यधिक वेदना ( अर्ति ) होने पर भी शूलनाशक औषधि नहीं पीना चाहिये । क्योंकि आम के कारण मन्द हुयी जठराग्नि ( आमसन्नोऽनलो ) दोष – औषध और भोजन ( अशनम् ) तीनों को नहीं पका ( पक्तुं ) सकती है । अत : इन सभी से उत्पन्न रोग रोगी को सहसा मार ( विहन्याद् ) सकता है ।

•  अजीर्ण प्रकार

1.आमाजीर्ण → कफ की अधिकता से ।

2.विलम्बिका → कफ और वायु की अधिकता से । 3.विदग्धाजीर्ण → पित्त की अधिकता से ।

4.विष्टब्धाजीर्ण → वात की अधिकता से ।

5.रसशेषाजीर्ण → रसशेष ( रसाग्नि की मन्दता ) से ।

• अजीर्ण के लक्षण- विबन्ध ( मलावरोध Constipation ) या अत्यन्त मात्रा में मल की प्रवृत्ति होती है , ग्लानि ( Depression ) , वायु का रुक जाना , विष्टम्भ ( आध्मान- पेट में तनाव ) , गुरुता और भ्रम ( चक्कर आना – Dizziness ) ये अजीर्ण Indigestion ) के सामान्य लक्षण हैं ।

• समशन , अध्यशन , विषमाशन- पथ्य और अपथ्य को मिलाकर भोजन सेवन करने को समशन कहते हैं । खाये हुये अन्न के बाद ( बिना पाचन हुये ) पुन : अन्न सेवन करने को अध्यशन कहते हैं । बिना समय बहुत या अल्प मात्रा में भोजन करने को विषमाशन कहते हैं ये तीनों ही मृत्यु या भयानक व्याधियों को उत्पन्न करते हैं ।

• “विपरीतं यदन्नस्य गुणैः स्यादविरोघि च ।

अनुपानं समासेन , सर्वदा तत्प्रशस्यते ।। ५१ ।।”

अनुपान की परिभाषा- जो द्रव्य जिस अन्न के गुणों के विपरीत होने पर भी उस अन्न के साथ सेवन करने पर विरोधी नहीं होता है , संक्षेप ( समासेन ) में वह उसका अनुपान होता है , और वह अनुपान सर्वदा उत्तम होता है ।

“अनुपानं करोत्यूर्जा तृप्तिं व्याप्तिं दृढाङ्गताम् । अङ्गसङ्घातशैथिल्यविक्लित्तिजरणानि च ।। ५२ ।।”

 अनुपान के गुण- अनुपान सेवन से ऊर्जा ( Energy ) , तृप्ति ( Satisfaction ) , व्याप्ति ( अन्न का सम्पूर्ण शरीर में फैलना ) , शरीर में दृढ़ता ( Strength ) , अंगों में ढीलापन , शिथिलता , मुलायम करना ( Softness ) और पाचन करना है ।

•  अनुपान के अयोग्य व्यक्ति- जत्रु ( Clavicle ) के ऊपर को रोगों में , श्वास ( Dyspnoea ) , कास ( खांसी- Cough ) , उर : क्षत , पीनस ( Rhinitis ) , गाने या भाषण को करने वाले और स्वरभेद के रोगी को अनुपान का सेवन नहीं करना चाहिये ।

• अनुपान के पश्चात् कर्तव्य- अनुपान सेवन के पश्चात् सभी व्यक्ति ( स्वस्थ या रोगी ) को अध्व ( घूमना ) या सोना त्याग देना चाहिये । भोजन करने के बाद आतप ( धूप ) , बह्नि ( अग्नि ) , यान ( सवारी ) और प्लवन वाहन ( तैरने की सवारी ) का त्याग करना चाहिये ।

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