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MATRASHITIYA ADHYAY PART -3

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मात्राशितीय अध्याय Part -3

नस्य

नस्य का प्रयोग प्रवृट् शरद और बसंत ऋतु में (जब बादल ने छाए हुए हो) तब करना चाहिए।

•अणुतैल : निर्माण – विधि तथा प्रयोग

  • लालचन्दन , अगर , तेजपात , दारुहल्दी की छाल , वरिआर की जड , प्रपौण्डरीक , छोटी इलायची , वायविडंग , बेल की छाल , नीलकमल , सुगन्धबाला , खस , केवटीमोथा , दालचीनी , नागरमोथा , अनन्तमूल , सरिवन , देवदारु , पिठवन , जीवन्ती , शतावर , रेणुका , बडी कटेरी , छोटी कटेरी , केवाच के बीज और कमलकेशर – इन सब औषधियों को समभाग लेकर जौकुट कर लें और तेल से सौ गुना वर्षा का जल लेकर क्वाथ बना लें । पकते – पकते जब क्याथ तेल से दस गुना बच जाय तो उतार कर छान लें । उस क्वाथ का दसवो भाग उतना ही तेल लेकर पकायें । जब क्याथ जल जाय तो पुनः तेल के बराबर क्वाथ डाले । इस तरह क्वाथ के नी भागों से बारी – बारी तेल पकायें । दसवें पाक में बराबर परिमाण में बकरी का दूध डालकर पाक करें । नाक द्वारा नस्य रूप से लेने योग्य अणुतैल के बनाने की यह विधि है ।

•प्रयोग –
पहले शिर का स्नेहन और स्वेदन करें । फिर तेल के आधे पल ( २० मि.ली. ) को रुई के फाहे में भिगो लें और फाहे से टपकाकर तीन बार नस्य लें ( अर्थात् तीन बार में बीस मिलीलिटर का प्रयोग कर डालना चाहिए ; यह तत्कालीन मात्रा है ) । इस प्रकार के तीन नस्य प्रति तीसरे दिन ( एक दिन का अन्तर देकर ) सात दिन तक लेना चाहिए ।

•नस्य के प्रयोग अवधि में मनुष्य वायुविहीन उष्ण स्थान में रहे , पथ्य का सेवन करे और जितेन्द्रिय रहे । यह तैल त्रिदोषनाशक और इन्द्रियों को बल देने वाला है । यथासमय सविधि प्रयोग करने से यह तेल पूर्वोक्त गुणों को देता है और मनुष्य उन सब गुणों को प्राप्त करता है ।

• दंत धावन
दंत धावन काल- प्रतिदिन प्रातः शाम दोनों समय
दंत धवन काष्ठ रस- कटु तिक्त और कषाय रस
दंत धवन योग्य वृक्ष -करंज ,कनेर, अर्क, अर्जुन, मालती

•) जिह्वा निर्लेखन : –
• जिह्वा शलाका – स्वर्ण , रजत , ताम्र या पीतल से निर्मिति , तीक्ष्ण धार न हो और , वक्र हो । ( जिह्वा निर्लेखन की लम्बाई – 10 अगुल – सुश्रुत )
• मुखसुगन्धि द्रव्य – मुख में स्वच्छता एवं भोजन में रूचि हेतु जायफल , लताकस्तूरी , सुपारी , लवंग , शीतलचीनी , उत्तम ताम्बल पत्र , कर्पूरनिर्यास और छोटी इलायची के दाने चूसने चाहिए ।
• गंडूष- असंचारी
• कवल- संचारी

• शिर में तैल :- शिरःशूल , खालित्य , पालित्य , केशपतन नाशक । केश – कृष्ण , दीर्घ , दृढमूल वाले हो जाते हैं।

• कर्ण तैल पूरण : – वातज कर्णरोग , मन्याहनुसंग्रह , उच्चै श्रुति , बाधिर्य आदि रोग नहीं होते हैं ।

• तैल अभ्यंग : – वातनाशक , सुत्वक , शरीर को व्यायाम क्लेश सहने में सक्षम बनाता है ।

• पादाभ्यंग के गुण : – गृधसी , सिरा स्नायु संकोच आदि रोग होने की सम्भावना नहीं रहती है ।

• स्नान के लाभ – स्नान करने से शरीर पवित्र और निर्मल हो जाता है । यह वृष्य ( पौरुष बढ़ाने वाला ) और दीर्घायु का दाता है । थकावट , पसीना और मल को दूर करता है , शारीरिक बल बढ़ाता है तथा ओज की वृद्धि करता है ।।

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