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MATRASHITIY ADHYAY PART -2

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मात्राशितीय अध्याय Part -2

• स्वस्थवृत संबंधी वर्णन

स्वास्थ्य का अनुपालन करने के लिए कुछ आवश्यक कार्यों को उनके गुणों सहित यहां कहा जाएगा।

• अंजन प्रयोग –
आंखों के लिए हितकारी सौविरंजन को नित्य दोनों आंखों में लगाना चाहिए तथा
नेत्र के स्रावण के लिए रसाजंन का प्रयोग पांचवें या आठवें दिन करना चाहिए।

• नेत्र तेज अर्थात अग्नि स्वरूप है उन्हें विशेषकर कफ दोष से भय रहता है इसीलिए कफ नाशक कर्म नेत्र दृष्टि को निर्मल बनाने में हितकर होता है।

• तीक्ष्ण अंजनों का प्रयोग दिन में नहीं करना चाहिए क्योंकि विरेचन से दुर्बल हुई दृष्टि सूर्य का प्रकाश लगने से कष्ट का अनुभव करती है इसीलिए इसे निश्चित रूप से रात में ही लगाना चाहिए।
• धूमवर्तिका
आचार्य चरक ने प्रायोगिक धूमवर्ती की लंबाई 8 अंगुल बतलाई है ।
•धूमवर्ती घटक द्रव्य –
रेणुका ,प्रियंगु, बड़ी इलायची ,नागकेसर, गुग्गुलु, खास ,श्वेत चंदन ,बरगद की छाल आदि 34 द्रव्य बताए गए हैं।

•धूमपान से लाभ –
धूमपान करने से शिर का भारीपन , शिर का दर्द , पीनम , अर्धावभेदक ( आधा शीशी ) , कर्णशूल , नेत्रशूल , खांसी , हिचकी , दमा , गलग्रह ( गला पटना ) , दांतों की दुर्बलता , कान – नाक- आँख से दोषजन्य पानी बहना , नाक से दुर्गन्ध , दन्तशूल , अरुचि , हनुग्रह , मन्यास्तम्भ , कण्डू , र्किमि , चेहरे का पीला पडना , मुख से कफ निकलते रहना , स्वरभेद , गलशुण्डिका ( टॉन्सिल बढ़ जाना ) , उपजिहिका , शिर के बाल झड़ना , बालों का पीला पड़ना , बालों का गिरना , छींक आना , अतितन्द्रा , बुद्धि का व्यामोह ( जड़ता ) और अतिनिद्रा आना आदि रोग शान्त होते हैं । बाल , कपाल और ओष – त्वचा – चक्षु – जिह्वा – प्राण का तथा कण्ठ के स्वर का बल अधिक हो जाता है । मुख द्वारा धूमपान करने से जनु के ऊपरी भाग में होने वाले रोग , विशेषकर शिर में होने वाले वात – कफजन्य रोग अधिक प्रबल नहीं होते ।

• धूमपान के काल – प्रायोगिक ( नेत्यिक ) धूमपान करने के आठ काल बतलाये गये हैं , क्योंकि वात और कफ के उपद्रव भी इन आठ कालों में ही देखे जाते है । ‘ समुत्क्लेश ‘ का अर्थ है — बाहर निकलने के लिए उद्यत होना ।

जितेन्द्रिय व्यक्ति को १. स्नान करके , २. भोजन करके , ३. वमन करने के बाद ४. छींक आने पर , ५. दातुन या मंजन करके , ६. नस्य लेकर , ७. अन्जन लगाकर और ८. सोकर जगने पर धूमपान करना चाहिए । इन अवसरों पर धूमपान करने से जत्रु के ऊपर के भाग में होने वाले वातज कफज अथवा वात – कफज रोग नहीं होते।
• धूम्रपान विधि
सिर- नेत्र नासिका रोगों में नासिका से धूम्रपान करना चाहिए तथा कंठ गत रोगों में मुख से धूम्रपान करना चाहिए
• नासिका का एक छिद्र बंद कर धूम्र तीन बार पीने के बाद मुख से निकाले।

• धूम्र नेत्र-
3 कोष वाला होना चाहिए।
बेर की गुठली के बराबर होना चाहिए।

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