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Mashi Kalpana Evam Lavan Kalpana

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मसी कल्पना तथा लवण कल्पना

• मसी कल्पनाः

मसी का अर्थ होता है स्याही । स्याह वर्ण की होने के कारण इसको मसी कहते हैं । जाङ्गम एवं औद्भिद् द्रव्यों को जलाकर कृष्णवर्ण या स्याह वर्ण बना लेने को मसी कहते हैं ।

 द्रव्यों को शरावसम्पुट या घटसम्पुट में बन्द करके अन्तर्धूम पाक करने से कृष्ण वर्ण ( कोयले जैसी या स्याह वर्ण ) की मसी कल्पना बनती है । मसी बनाने के लिए द्रव्य के काठिन्य एवं मात्रा के अनुसार लघुपुट या गजपुट में पाक किया जाता है ।

स्वाङ्गशीत होने पर शरावसम्पुट को निकालकर औषधि को खरल में पीसकर वस्त्र से छान लेते हैं । इस कल्पना को मसी कहते हैं ।

यदि द्रव्य को खुले शराव में रखकर ( ऑक्सीजन की उपस्थिति ) पाक करेंगे तो द्रव्य जलकर श्वेत वर्ण भस्म ( राख ) बनती है , जिससे क्षार प्राप्त किया जाता है जिससे उसके गुणधर्म बदल जाते है ।

• त्रिफलामसी

आमलकी , हरीतकी , विभीतकी तीनों फलों का त्वक् ( छिलका ) 50 ग्राम 50 ग्राम ( कुल 150 ग्राम ) लेकर शरावसम्पुट में बन्द कर लघुपुट में पाक करे स्वाङ्गशीत होने पर सम्पुट खोलकर खरल में पीसकर वस्त्र से छानकर रख लें ।

• प्रयोग : –

मञ्जन ( दाँत साफ ) करने के लिए । रक्तरोधनार्थ भी इसका उपयोग होता है ।

• मयूरपिच्छ मसी :

मयूरपिच्छ का भस्म तथा पिप्पली का चूर्ण मधु मिलाकर चाटने से भयंकर हिक्का तथा प्रबल श्वास रोग को शीघ्र ही नाश करता है । बहिधूम से बनाने पर भस्म बनती है । तथा अन्तर्धूम जारण करने से मयूरपिच्छ मसी बनती है ।

• उपयोग : –

हिक्का , श्वास , छर्दि ( यो.र. ) मात्रा : -125 मि.ग्रा . से 250 मि.ग्रा .

• अनुपान : -मधु , पिप्पली चूर्ण , दशमूल क्वाथ

• लवण कल्पना :

सैन्धव लवण को पीसकर अर्कपत्र , नारियल आदि के साथ अग्नि में पाक करने के उपरान्त जो धूसर वर्ण या कृष्णवर्ण का लवण प्राप्त होता है , वह लवण कल्पना कहलाती है । यह कल्पना शूल , गुल्म , यकृत्प्लीहारोग , उदरविकार , उदावर्त , विबन्ध , कोष्ठ काठिन्य आदि में लाभकारी है । इसके अतिरिक्त इनमें मूत्रल और स्वेदल गुण विद्यमान रहते हैं ।

सौवर्चल ( काला नमक ) भी एक प्रकार का लवण कल्प है । इसे भी अग्नि पर पाक करके ही बनाया जाता है । अर्कलवण और नारिकेललवण लवण कल्पना के उदाहरण है ।

• अर्कलवण :

घटक द्रव्य :

1. सुपक्व अर्कपत्र -100 ग्राम

2.सैन्धव लवण 100 ग्राम

निर्माण विधि : –

सर्वप्रथम शराव में स्वच्छ अर्कपत्र फैला दें । इन पर सैन्धव लवण चूर्ण की पतली परत फैलाकर पुनः उस पर अर्कपत्र रखें तथा पुनः सैन्धवलवण का चूर्ण फैलाकर , पुनः अर्कपत्र रखें । इस प्रकार क्रमशः सम्पूर्ण सैन्धवलवण और अर्कपत्र रखें । तत्पश्चात् दूसरा शराव उल्टा रखकर कपड़मिट्टी से सन्धिबन्धन कर गजपुट में अन्तर्धूम पाक करें । स्वाङ्गशीत होने पर कपड़मिट्टी खोलकर कज्जल वर्ण या धूसर श्वेत वर्ण ( राख जैसा ) के लवण को निकालकर खरल में बारीक पीसकर रखें । यह अर्कलवण है ।

 मात्रा : -500 मि.ग्रा . ( 4 रत्ती )

अनुपान : -उष्ण जल , मस्तु ।

 उपयोग : -यकृतरोग , प्लीहा रोग , उदररोग , विबन्ध , ज्वर युक्त या अज्वर युक्त वातज एवं कफज यकृत रोग या नवीन प्लीहोदर रोग का नाशक है । स्पर्श में यकृत अतिकठिन हो और अतिसार न हो एवं यकृत की असह्य पीड़ा में प्रयोग करने पर लाभदायक है । रुचिकारक है ।

• नारिकेल लवण :

घटक द्रव्यः

1. सुपक्व सजल नारियल -1 नग

2. सैन्धव लवण -10 तोला ( 120 ग्राम )

• निर्माण विधि : –

सुपक्व तथा सजल नारियल लेकर उसके छिलके ( जटा ) को चाकू से अलग हटा दें । अब उस नारियल के नेत्रभाग में मोटी शलाका से छिद्र कर उसका जल निकाल लें तथा उसी छिद्र से 10 तोला ( 120 ग्राम ) सैन्धव लवण का चूर्ण भर दें ।

फिर उस छिद्र को मुलतानी मिट्टी से बन्द कर पूरे नारियल पर एक अंगुल मोटा मुलतानी मिट्टी युक्त कपड़ा का लेप लगाकर धूप में अच्छी तरह सुखा लें । फिर उसे गजपुट या महापुट में पाक करें ।

 स्वाङ्गशीत होने पर उसे निकालकर कपड़मिट्टी हटा दें । फिर उसके ऊपर के कठिन नारियल कपाल को हटाकर नारियल गिरि एवं सैन्धव लवण को निकालकर पीसकर सुखा ले एवं स्वच्छ काँचपात्र में सुरक्षित रख लें । नारिकेल लवण का वर्ण कृष्ण वर्ण ( धूसरवर्ण ) होता है ।

मात्रा : -2 रत्ती ( 250 मि.ग्रा . ) से 2 माषा ( 2 ग्राम ) तक ।

अनुपान : -पिप्पली चूर्ण , नवसादर , यवक्षार , जल ।

उपयोगः – पाचक एवं पित्तशामक है । अम्लपित्त , पित्तशोषजशूल ( पित्ताशय शूल ) , उदरशूल , परिणाम शूल नाशक है ।

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