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MARMA SHARIR

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मर्म शारीर – भाग-2

• त्रिमर्मों की प्रमुखता

त्रिमर्म

( A ) हृदय

( B ) वस्ति

( C ) शिर

• शरीर में जो १०७ मर्म कहे गये हैं । उनमें से हृदय , शिर और वस्ति ये तीन प्रधान मर्म माने जाते हैं । क्योंकि इनमें प्राण आश्रय कर रहते हैं ।

( A ) ( १ ) नाम- हृदय

 ( २ ) संख्या -१

( ३ ) प्रकार- रचनानुसार- सिरा मर्म

( ४ ) प्रकार – परिणामानुसार- सद्यः प्राणहर मर्म

( ५ ) प्रकार – परिमाणानुसार- ४ अंगुल प्रमाण

( ६ ) स्थान- दोनों स्तनों के मध्य में ( Middle mediastinam )

( ७ ) आधुनिक मतानुसार रचना- Heart

( ८ ) विद्व होने पर लक्षण- तुरन्त मृत्यु ( Sudden death ) – “ सद्योमरणम् “

( B ) ( १ ) नाम- शिर ( अधिपति )

( २ ) संख्या -१

( ३ ) प्रकार- रचनानुसार- सन्धि मर्म

( ४ )  प्रकार- परिणामानुसार- सद्यः प्राणहर मर्म

( ५ ) प्रकार- परिमाणानुसार- १/२ अंगुल प्रमाण

( ६ ) स्थान- मस्तिष्क के भीतर ऊपर की ओर सिरा और सन्धियों का सन्निपात , बालों का आवर्त।

( ७ ) आधुनिक मतानुसार रचना- Venous sinuses

( ८ ) विद्ध होने पर लक्षण- ‘ सद्योमरणम्’- तुरन्त मृत्यु ( Sudden death )

( C ) ( १ ) नाम- वस्ति

 ( २ ) संख्या -१

( ३ ) प्रकार- रचनानुसार – स्नायु मर्म

( ४ ) प्रकार परिणामानुसार- सद्यः प्राणहर मर्म

( ५ )  प्रकार परिमाणानुसार -४ अंगुल प्रमाण

( ६ ) स्थान- मूत्राशय- Pubis के पीछे

( ७ ) आधुनिक मतानुसार रचना- Urinary bladder

• मर्मों का कार्य करने का काल

सद्य : प्राणहर मर्म सात दिन के अन्दर मारते हैं ।

कालान्तर – प्राणहर मर्म पन्द्रह दिन अथवा एक महिने में मार डालते हैं।

 कालान्तर – प्राणहर मर्मों में भी क्षिप्र नामक मर्म कभी – कभी शीघ्र ही मार डालते हैं ।

 विशल्य – प्राणहर तथा वैकल्यकर मर्मों पर कभी – कभी विशेष आघात होने से वे मार देते हैं ।

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