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MANS DHATU

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मांस धातु

मांस धातु की उत्पत्ति

“रसागतं . प्रजायते ।।” (चि . 14/15 , सु . सू . 14/11 , अ . हृ . शा . 13/63)

रस से रक्त तथा रस से मांस उत्पन्न होता है ।

• मांस धातु के कर्म

“मांसं शरीरपुष्टिं मेदसश्च ।।”

मांस शरीर और मेद की पुष्टि करता है । अन्य जो कर्म पेशियों के कहे गए हैं वे भी मांस के ही कर्म हैं । पेशियां मांस ( flesh ) घटकों के समुदायों को , जो परस्पर विभक्त रहते हैं . पेशी ( muscle ) कहते हैं ।
शरीर में पेशियों के रूप में ही मांस स्थित रहता है । पेशियां तीन प्रकार की होती हैं-
( 1 ) कंकाल पेशियां अस्थियों में लगी रहती हैं तथा इनके आकुञ्चन तथा प्रसारण से अस्थियों में गति होती है , जिससे उन अंगों में भी गति होती है ।
( 2 ) अरेखित पेशियां- ये पेशियां शरीर के भीतरी अंगों तथा आमाशय , आन्त्र आदि के निर्माण में होती हैं तथा
( 3 ) हृदपेशी- हृदय के निर्माण में भाग लेने वाली पेशियां हैं ।

•पेशियों की संख्या
शरीर में पाचं सौ पेशियां होती हैं । इनमें चार सौ शाखाओं में , छियासठ कोष्ठ ( धड़ ) में तथा चौंतीस गर्दन के ऊपर होती हैं।

• पेशियों के स्वरूप
पेशियां स्वरूप में अनेक प्रकार की होती हैं यथा बहुल [ बड़ी- large ] पेलव [ छोटी- small ] , स्थूल [ मोटी- thick ] , अणु पतली- thin ] , पृथु [ चिपटी- flat ] वृत्त [ गोल ] , हस्व [ कम लम्बी- short ] , दीर्ध [ बहुत लम्बी- verylarge ] , स्थिर [ firm ] मृदु [ कोमल ] , श्लक्ष्ण [ चिकनी- smooth ] तथा कर्कश [ खुरदरी- rough ] |

ये पेशियां सन्धि , अस्थि , सिरा और स्नायु के प्रच्छादन के लिए स्थानविशेष के अनुसार जिस – जिस स्वरूप की होनी चाहिएं उसी प्रकार की होती हैं ।

• पेशियों के कार्य
पेशियों का कार्य आकुञ्चन करना होता है । उत्तेजना ( stimulation ) की प्राप्ति पर आकुञ्चन करना तथा उत्तेजना की समाप्ति पर प्रसारण कर पुनः अपनी स्वाभाविक स्थिति पर पहुंचना इसका कार्य है ।
कंकाल पेशियों के आकुञ्चन से अस्थियों में गति होती है । आन्तरङ्ग पेशियों के आकुञ्चन से उन – उन अवयवों में , जिनका वे निर्माण करती हैं गति होती है जिसके द्वारा वे अपना कार्य सम्पादित करती हैं ।
हृद् पेशियों के आकुञ्चन – प्रसारण से हृदय शरीर में रक्त का संचार करता है ।

• मांससार पुरुष के लक्षण

मांससार पुरुषों के शंख , ललाट , कृकाटिका ( गर्दन के पीछे का भाग ) , नेत्र कपोल , जबड़ा ( हनु ) , कन्धे , उदर , कक्ष ( बगलें ) , वक्ष हाथ – पैर और संधियां भारी स्थिर तथा मांस से भरी होती हैं ।
मांससारता क्षमा धैर्य अचपलता , धन , विद्या , सुख , सरलता , आरोग्य , बल और आयु की निर्देशक है ।

•मांस वृद्धि के लक्षण
मांस की अतिवृद्धि [ असमान्य रूप से बढ़ जाने पर ] कटि , कपोल , होठ , शिश्न , उरु , भुजा और जंघा अतिस्थूल हो जाते हैं और समस्त शरीर भारी हो जाता है ।

• मांसक्षय के लक्षण
शरीर में मांस के कम होने पर सबसे अधिक प्रभाव कंकाल पेशियों पर पड़ता है । अतः स्फिक् [ कटि , नितम्ब ] , ग्रीवा , वक्ष , पिण्डलियां , उरु एवं वक्ष शुष्क [ पतले तथा रूक्ष हो जाते हैं साथ ही साथ उदर कपोल ओष्ठ , शिश्न भी पतले हो जाते हैं ।
शरीर में थकान , धमनियों में शिथिलता इन्द्रियों में ग्लानि अर्थात् उनके कार्यों में मन्दता , सन्धियों में वेदना होने लगती है ।

• मांस के मल

“मांसस्य खमलो मलः ।। ” (च ० चि ० 15/17)
मांस के खमल मल हैं । ‘ ख ‘ आकाश को कहते हैं अर्थात् ऐसे स्थानों पर पाये जाने वाले मल आकाश रहता है यथा कर्ण , नासिका , नेत्र , मुख तथा बाह्य जननावयवों में प्रकट वाले मल , मांस द्वारा उत्पन्न होते हैं ।

• मांस की उपधातुयें

“मांसाद् वसा त्वचः षट् च ।।”( च ० चि ०15 / 16)

मांस से वसा तथा छह त्वचाओं की उत्पत्ति होती है ।

•वसा

“शुद्धमांसस्य यः स्नेहः सा वसा परिकीर्तिता ।।”

शुद्ध मांस का स्नेह वसा कहलाता है ।

त्रयो ( अञ्जलयः ) वसायाः ।
वसा की शरीर में सामान्यतः तीन अंजलि प्रमाण में मात्रा होती है ।

•त्वचा

त्वचा शरीर का मुख्य अंग है जिसके द्वारा हमें पंचमहाभूतों का ज्ञान प्राप्त होता है।

• त्वचा की उत्पत्ति

शुक्र और आर्तव के संयोग के पश्चात् उसमें भूतात्मा प्रवेश करता है तब वह गर्भ परिपक्वता की ओर प्रवृत्त होता है उस समय , जिस प्रकार अग्नि द्वारा परिपक्व किये जाते हुए दूध पर मलाई की तहें बनती हैं उसी प्रकार त्रिदोषों ( विशेष रूप से पित्त ) द्वारा परिपक्व हो उस शुक्र शोणित संयोगरूपी गर्भ के पृष्ठ भाग पर त्वचा की सात तहें बनती हैं

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