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MAN

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मन

मन की निरूक्ति – ‘ मन् ज्ञाने ‘ धातु से मन शब्द बनता है , कहा भी गया है कि ” मन्यते अवबुध्यते ज्ञायते अनेन इति मनः ‘ अर्थात् जिसके द्वारा मनन किया जाये सोचा – समझा जाये और ज्ञान किया जाये वही ‘ मन ‘ है ।

मन के पर्याय –
चरक ने मन के तीन पर्याय — ‘ अतीन्द्रिय ‘ , ‘ सत्त्व ‘ और ‘ चेतस् ‘ माने हैं । यह इन्द्रियों से परे और श्रेष्ठ है , इसीलिये इसे अतीन्द्रिय कहा गया है ।

मन का लक्षण –
ज्ञान का होना या न होना मन का लक्षण है , क्योंकि आत्मा का इन्द्रियों के साथ सम्बन्ध होने पर भी यदि मन का सानिध्य नहीं है तो विषय का ज्ञान नहीं होता है । जब आत्मा , इन्द्रिय और अर्थों ( इन्द्रिय के विषयों ) के साथ मन का भी संयोग होता है तभी ज्ञान होता है।

मन का विषय –
चिन्तन करना , विचार करना , उहापोह या तर्क करना , ध्यान करना और संकल्प करना — ये सभी मन के विषय हैं , अन्य जो भी विषय मन के द्वारा जाना जाता है , उन्हें मन का विषय कहते हैं । सुख दुःखादि ज्ञान भी मन के द्वारा ही होता है , अत : ये भी मन के विषय हैं ।

मन का गुण – चरक ने मन के दो गुण बताये हैं -१ . अणुत्व और २. एकत्व ।

मन के कर्म –
चरक के अनुसार मन इन्द्रियों में अधिष्ठित होकर उसका संचालन करता है , स्वयं अपने ( मन ) को अपने से ही अहित विषय से रोकता है , उह और विचार करना मन के कर्म हैं । इस प्रकार किसी विषय पर विचारादि के पश्चात् बुद्धि ( ज्ञान ) उत्पन्न होता है कि क्या उचित है जिसे करना चाहिये और क्या अनुचित है जिसे नहीं करना चाहिये ।

मन का स्थान –
‘ चरक ‘ ने मन और आत्मा दोनों का स्थान ‘ हृदय ‘ बताया है ।
‘ सुश्रुत ‘ ने भी हृदय को ही चेतना का स्थान माना है , जबकि ‘ वाग्भट ‘ ने सत्त्वादि का स्थान हृदय माना है , जो स्तन और उर : कोष्ठ के मध्य में है ।
यह कहा जा सकता है कि मन का स्थान – हृदय , कार्य का मुख्य स्थान – शिर ( मस्तिष्क ) और सम्पूर्ण शरीर कार्यक्षेत्र है

1 thought on “MAN”

  1. Embrace your individuality by embracing your authentic self. Go deeper to develop a relationship with yourself. Accept who you are

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