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मल

दोष तथा धातुओं के समान मल भी शरीर को बनाये रखने में आवश्यक होते हैं ।

“दोषधातुमलमूलं हि शरीरम् ।।” (सु ० सू ० 15/3)

दोष , धातु तथा मल इस शरीर के मूल द्रव्य हैं ।

“मलिनीकरणान्मलाः ।।”

जो शरीर को मलिन करें वे मल हैं ।

• पुरीष

जब वायु द्वारा फेंका जाकर [ पुरःसरण गति- peristatic movements द्वारा ] आहार अंश पक्वाशय में पहुंचता है तब वह अग्नि द्वारा शुष्क होकर पिण्ड रूप में परिणत हो जाता है इस प्रक्रिया से कटु वायु की वृद्धि होती है ।

• आम ( अपक्व ) तथा पक्व पुरीष के लक्षण

अपक्व [ आम ] पुरीष में
[ 1 ] अधिकांश भाग बिना पचे आहार का होता है ,
[ 2 ] वातादि दोषयुक्त होता है ,
[ 3 ] अत्यन्त दुर्गन्धयुक्त होता है ,
[ 4 ] थोड़ा – थोड़ा आता है तथा
[ 5 ] जल में डूब जाता है
इसके विपरीत पक्व पुरीष
[ 1 ] वातादि दोषरहित होता है ,
[ 2 ] दुर्गन्धरहित एवं बंधा हुआ होता है ,
[ 3 ] शौचनिवृत्ति के पश्चात् व्यक्ति अपने को हल्का अनुभव करता है .
[ 4 ] बिना पचा भाग नहीं होता है तथा
[ 5 ] जल में तैरता है ।

• पुरीष का धातु कर्म

पुरीष उपस्तम्भ है अर्थात् शरीर को धारण करता है , साथ ही साथ शरीर की वायु और अग्नि को भी धारण करता है ।

• पुरीषक्षय के लक्षण

पुरीष के क्षीण होने पर रूक्षता बढ़ जाती है तथा पीड़ित करता हुआ वायु कुक्षि को फुला देता है ओर तिर्यक् [ पार्यों में ] तथा ऊपर की ओर शब्द करता हुआ जाता है जिससे आन्त्र में मरोड़ तथा हृदय एवं पार्यों में पीड़ा होती है ।

• पुरीषवृद्धि के लक्षण

पुरीष की वृद्धि में आटोप , आध्मान , [ उदर में वायु का संचालन ] तथा कुक्षी में भारीपन एवं वेदना होती है ।

• मूत्र •

पुरीष के साथ मूत्र भी आहार का मल है ।

• मूत्रोत्पत्ति
आहार का सार भाग रस कहलाता है तथा सार रहित घन अंश मल तथा द्रव अंश मूत्र होता है ।
मल का जलीयांश शिराओं [ मूत्रवाहिनियों द्वारा वस्ति को प्राप्त हो मूत्र बन जाता है ।

• मूत्र का शरीर में धातु कर्म

मूत्र वस्ति ( वृक्क गोणिका renal pelvis ) का पूरण करता है तथा की त्याज्य क्लेदता को दूर करता है ।

• मूत्रक्षय के लक्षण
मूत्र के क्षीण होने पर
( 1 ) मूत्र कष्ट से आता है ,
( 2 ) उसका प्राकृत वर्ण परिवर्तन हो जाता है ,
( 3 ) वस्ति प्रदेश में वेदना होती है ,
( 4 ) रक्तयुक्त हो सकता है ।
( 5 ) मात्रा में कम हो जाता है ।
( 6 ) प्यास अत्यधिक लगती है तथा
( 7 ) मुख सूख जाता है आदि लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं ।

• मूत्रवृद्धि के लक्षण
मूत्रवृद्धि में
( 1 ) मूत्र प्रचुर मात्रा बार – बार आता है ,
( 2 ) वस्ति प्रदेश में पीड़ा होती है तथा
( 3 ) आध्मान ( उदर में वात का निरोध होकर फूलना ) होता है तथा
( 4 ) मूत्र त्याग के पश्चात् भी मूत्र त्याग की इच्छा बनी रहती है ।

• मूत्र की परीक्षा

वात की अधिकता से मूत्र पाण्डुर [ श्वेत मिश्रित पीला ] वर्ण का होता है [ तथा परिमाण में अल्प होता है ] पित्त की अधिकता से मूत्र लाल तथा नीले वर्ण का होता है । रक्त के प्रकुपित होने से रक्त के वर्ण का होता है तथा कफ की अधिकता से फेनयुक्त श्वेत वर्ण का होता है [ पित परिमाण में अधिक होता है

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