fbpx

KWATH KALPANA

by

क्वाथ कल्पना

 परिभाषा

“पानीयं षोडशगुणं क्षुण्णे द्रव्यपले क्षिपेत् ।

मृत्पात्रे क्वाथयेद् ग्राह्यमष्टमांशावशेषितम् ।।

 तज्जलं पाययेद्धीमान् कोष्णं मृद्वग्निसाधितम् ।

श्रृतः क्वाथ : कषायश्च नियूहः स निगद्यते ।। ( शा . सं . म . ख . 2 / 1-2 )

अर्थात् यवकुट किये हुए एक पल द्रव्य में सोलह गुना ( 16 पल ) पानी डालकर मन्द अग्नि पर पाक करे , अष्टमांश शेष रहने पर उतारकर छान ले । तत्पश्चात् बुद्धिमान चिकित्सक इस कोष्ण ( गुनगुने ) क्वाथ को पिलावे । इस परिपक्व जल को शृत , क्वाथ , कषाय और नियूह कहते हैं ।

1. द्रव्य संघात के अनुसार जल की मात्रा :

“मृदौ चतुर्गुणं देयं मध्यमेऽष्टगुणं तथा ।

द्रव्ये तु कठिने देयं बुधैः षोडशिकं जलम् ।।” ( द्र . गु . वि . उ . 2 / 24-25 )

अर्थात् मृदुद्रव्य के लिए चार गुना , मध्यम द्रव्य के लिए आठ गुना तथा कठिन द्रव्य के लिए सोलह गुना जल डालना चाहिए । प्रायः क्वाथों में मृदु , मध्य तथा कठिन सभी संघात के द्रव्य मिश्रित होते हैं , अतः यदि जल की मात्रा निर्दिष्ट न हो तो मध्यम मार्ग अपनाकर आठ गुना जल डालकर क्वाथ निर्माण करना चाहिए ।

2. द्रव्य की मात्रानुसार जल की मात्रा :

“कर्षादित : पलं यावत् क्षिपेत् षोडशिकं जलम् ।

तदूर्ध्वं कुडवं यावत्तोयमष्टगुणं भवेत् ।।

तदूर्ध्व प्रक्षिपेन्नीरं खारी यावच्चतुर्गुणम् ।।” ( अ . स . क . 8 एवं द्र . गु . वि . उ . 2 / 25-26 )

अर्थात् एक कर्ष ( 12 ग्राम ) से एक पल ( 48 ग्राम ) तक द्रव्य का क्वाथ बनाना हो तो जल सोलह गुना डालना चाहिए । एक पल से ऊपर एक कुडव ( 192 ग्राम ) तक द्रव्य का क्वाथ बनाना हो तो आठ गुना जल डालना चाहिए । एक कुडव से खारी ( 188.416 कि.ग्रा . या 4096 पल ) तक का क्वाथ बनाना हो तो जल चार गुना डालना चाहिए ।

क्वाथ के प्रकार

क्वाथ सात प्रकार के हैं – 1.पाचन 2. दीपनीय 3. शोधन 4. शमन 5. तर्पण 6. क्लेदन और 7. शोषी

पाचन और शोधन क्वाथ के लिए जल चतुर्थांश शेष रखा जाता है तथा अन्य क्वाथों में अष्टमांश शेष रखा जाता है ।

क्वाथ की मात्रा

आहार के रस के पाक हो जाने पर क्वाथ 2 पल ( 96 मि.ली. ) की मात्रा में पीना चाहिए ।

आचार्य यादवजी त्रिकमजी ने क्वाथ की मध्यम मात्रा एक पल ( 4 तोला ) बताई है ।

क्वाथ के उपयोग

1. क्वाथ का प्रयोग औषध के अनुपान के रूप में होता है ।

2. चरक के अनुसार क्वाथ का उपयोग स्नेहकल्पना , सेक , पान , व्रणशोधन , आश्च्योतन , गण्डूष , निरुहवस्ति के निर्माण में होता है ।

अन्य आचार्यों के अनुसार क्वाथ का उपयोग अरिष्ट निर्माण , अवलेह निर्माण में भी होता है ।

 3. औषध योग निर्माण में भावना देने हेतु क्वाथ का उपयोग होता है ।

4. घन ( Extract ) निर्माण भी क्वाथ से किया जाता है ।

पुनर्नवाष्टक क्वाथ ( पुनर्नवादि क्वाथ ) :

 पुनर्नवा , हरीतकी , निम्ब , दारुहरिद्रा , कटुकी , पटोलपत्र , गुडूची और शुण्ठी का क्वाथ गोमूत्र मिलाकर पीने से पाण्डु , कास , उदररोग , श्वास , शूल तथा सर्वाङ्गशोथ को नष्ट करता है ।

रास्नासप्तक क्वाथ : 

रास्ना , गोक्षुर , एरण्ड , देवदारू , पुनर्नवा , गुडूची , आरग्वध का यथाविधि निर्मित क्वाथ शुण्ठी चूर्ण मिलाकर पीने से जंघाग्रह , कटिग्रह , पार्श्वपीड़ा , पृष्ठपीड़ा , उरुपीड़ा तथा दुःसाध्य आमवात को नष्ट करता है ।

कुलत्थ क्वाथ :

घटक द्रव्य

1. कुलत्थ बीज 1 कुडव ( 192 ग्राम )

2. जल 3.072 लीटर

निर्माण विधि सर्वप्रथम

कुलत्थ बीज के सूक्ष्म टुकड़े करके 16 गुना ( 3.072 लीटर ) जल मिलाकर अष्टमांश जल शेष रहने तक पकाते हैं । फिर उसे स्वच्छ वस्त्र से छान लेते हैं ।

मात्रा : -1 से 2 पल

उपयोग : – विरेचन या वमन होने से उत्पन्न शीत ज्वर का नाशक है । कृमिरोग , मूत्ररोग , अश्मरी , आविरोग में उपयोगी है । धातुओं के सामान्य शोधन में कुलत्थक्वाथ का प्रयोग होता है ।

आयुर्वेदीय ग्रन्थों में कुलत्थ का यूष के रूप में अधिक प्रयोग मिलता है

Leave a Comment

error: Content is protected !!