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Kshar Kalpana

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क्षार कल्पना

“तत्र क्षरणात् क्षणनाद्वा क्षारः ।” ( सु . सू 11/4 )

अर्थात् क्षरणकर्म या क्षणनकर्म करने वाले द्रव्य को क्षार कहा जाता है । दूषित मांस आदि को काटने ( क्षरण ) के कारण अथवा त्वचा , मांस आदि का विनाश ( क्षणन – हिंसा ) करने के कारण क्षार कहलाता है ।

• भेदः-

प्राप्ति के आधार पर क्षार के दो भेद होते है

(i ) खनिजः –

प्राकृतिक रूप में प्राप्त होने वाले क्षार , जैसे – टंकण , सज्जीक्षार आदि ।

 ( ii ) वानस्पतिक क्षार ( कृत्रिम रूप से बनाये जाने वाले क्षार ) : –

ये क्षार वनस्पतियों से बनाये जाते हैं , जैसे – यवक्षार , अपामार्गक्षार , तिलक्षार , कदलीक्षार , मूलकक्षार आदि ।

• क्षार निर्माण विधि ( वानस्पतिक क्षार )

जिस काष्ठौषधि ( क्षार प्रधान वनस्पति ) का क्षार बनाना हो उसकी काष्ठ ( या पञ्चाङ्ग – काण्ड , काष्ठ , मूल , त्वक् , पत्र , पुष्प , फल ) लेकर अच्छी तरह से सुखाकर , स्वच्छ कड़ाही में जलाकर भस्म ( श्वेताभ राख ) बना लें । उसके बाद उस भस्म को मिट्टी के पात्र में डालकर चार गुना जल मिलाकर हाथ से मसलकर पात्र को ढ़ककर रात भर रखें । दूसरे दिन राख घुले जल ( स्वच्छ जल ) को निथारकर वस्त्र से छान लें ।

पात्र तल में अवशिष्ट भाग को फेंक दें । इसी तरह उक्त जल को 3-4 बार छान लें । फिर उस जल को मन्दाग्नि पर पका कर गाढ़ा कर लें । जब पंकवत् ( कीचड़ जैसा ) हो जाये तो उसे धूप में सुखा लें । यही क्षार है , जो श्वेत वर्ण का चूर्ण रूप में प्राप्त होता है ।

• क्षार के गुण : –

आचार्य चरक के अनुसार क्षार तीक्ष्ण , उष्ण , लघु , रूक्ष , क्लेदी , पक्ता ( पकाने वाला ) , विदारण ( फाड़ने वाला ) , दाहकारक , दीपन , छेदन करने वाला और अग्नि सदृश है ।

• मात्रा :-

क्षारों की सामान्य मात्रा 2 से 8 रत्ती ( 250 मि.ग्रा . से 1 ग्राम ) बतायी गयी है ।

• अपामार्ग क्षार :

अपामार्ग के शुष्क पंचांग 1 कि.ग्रा . लेकर लोहे की कड़ाही में रखकर जलाकर भस्म ( राख ) बना ले । अपामार्ग भस्म ( राख ) को 4 लीटर या 6 लीटर जल में घोलकर रात्रिभर रख दें ।

दूसरे दिन प्रातः काल स्वच्छ जल को निथार कर वस्त्र से 3-4 बार छानकर दूसरे पात्र में रखें । इसके बाद स्वच्छ जल ( क्षारोदक ) को कड़ाही में डालकर पकावें और पंकवत गाढ़ा हो जाने पर धूप में सुखा लें । जल पूर्णतः सूख जाने पर कड़ाही के तल में स्थित श्वेतवर्ण के क्षार को निकाल लें । यह अपामार्ग क्षार होता है । अपामार्ग क्षार को मयूरक्षार , किणिक्षार और खरमञ्जरिकाक्षार भी कहा जाता है ।

• अपामार्गक्षार के गुण :

अपामार्ग क्षार तीक्ष्ण होता है । इसका प्रयोग से श्वास गुल्म , शूल आदि रोगों का नाश करता है । यह बाधिर्य नाशक है।

• स्नुहीक्षार

स्नुही के डण्ठल ( काण्ड ) को बीच में फाड़कर एवं काटकर सुखा कर क्षार निर्माण की सामान्य विधि के अनुसार जलाकर एवं भस्म को 4 या 6 गुना जल में घोलकर एवं पकाकर क्षार प्राप्त किया जाता है ।

• गुण : –

स्नुहीक्षार तीक्ष्ण और सर्व उदररोगनाशक है , अग्निदीपक है । गुल्म , शोथ विसूचिका , अजीर्ण , शूल , यकृद्दोष तथा श्वासरोग नाशक है ।

• क्षारसूत्र :

 क्षारसूत्र का प्रयोग अर्श , भगन्दर , नाडीव्रण और अर्बुद में किया जाता है ।

• निर्माण विधि

एक स्वच्छ काँच पात्र में स्नुहीक्षीर तथा हरिद्रा चूर्ण समान मात्रा में मिलाकर रखें । फिर एक नातिस्थूल दृढ़ कार्पास सूत्र ( Thread ) को स्नुहीक्षीर और हरिद्रा चूर्ण मिश्रित घोल में 24 घंटे तक डुबोकर बाद में छाया शुष्क कर लें । सूख जाने पर पुनः स्नुहीक्षीर और हरिद्रा चूर्ण के नवीन घोल में भिगों दें । इस प्रकार सात बार भावित कर छाया शुष्क करें । इसके बाद विसंक्रमित सूत्र ( क्षार सूत्र ) को स्वच्छ Test tube में कार्क लगाकर सुरक्षित रखें ।

मात्रा : आवश्कतानुसार

उपयोग : –

अर्श , भगन्दर , नाडीव्रण एवं अर्बुद को काटने के लिए क्षारसूत्र का प्रयोग किया जाता है ।

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