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KSHAR AGANI KARMA

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क्षाराग्रिकर्म विधि

• क्षार की श्रेष्ठता-

 सभी शस्र और अनुशत्रों में क्षार ( Alkali ) श्रेष्ठ होता है यह छेदन ( Excision ) और भेदन ( Incision ) आदि बहुत सारे कार्यों को करता है । विषय स्थानों पर जहां शस्त्र कठिनाई से चलाया ( अवचार्य ) जा सकता है और जो रोग शस्त्र से सिद्ध नहीं हो सकता है उसमें तथा अतिकृच्छ्र रोगों में भी यह प्रयुक्त होता है । यह पिलाने के लिये भी प्रयोग में आता है ।

• क्षार सेवन का निषेध-

 पित्त में , रक्त में , वात में , निर्बल रोगी में , ज्वर में , अतिसार ( Diarrhoea ) में , हृदय रोग , मूर्धा ( शिरो ) रोग में , पाण्डु ( Anaemia ) रोग – अरुचि और तिमिर रोग में , संशोधन करने पर , सर्वाङ्ग शोथ में , डरपोक – गर्भिणी ऋतुमती – गर्भाशय या योनि के बाहर निकले होने पर ( Prolapse of uterus ) , अन्न के अजीर्ण में , बालक में , वृद्धि होने पर , धमनी सन्धि और मर्म में , तरुणास्थि ( Cartiledge ) – सिरा – स्नायु – सेवनी – गला और नाभि में , शरीर के अल्प मांस वाले स्थान में , वृषण ( Testies ) और मेढ़ ( Penis ) के स्रोत में , नाखूनों के अन्दर , वर्त्म रोगों को छोड़कर नेत्र के रोगों में , शीत – वर्षा – ग्रीष्म ऋतु और बादल के आने ( दुर्दिन में ) पर क्षार कर्म नहीं करना चाहिये ।

• क्षार क्रिया-

कालमुष्कक ( मोखा , L.N.- Schrebera swieteniodes Roxb ) शम्याक ( अमलतास , Eng.- Purging cassia , L.N.- Cassia fistula Linn . ) , केला ( Eng.- Plantain , L.N.- Musa sapientum Linn . ) , पारिभद्र ( फरहद , Eng.- Coraltree , L.N.- Erythrina indica Linn . ) अश्वकर्ण ( गर्जन , L.N.- Dipterocarpus alatus Roxb . ) , स्नूही ( Eng . – Common milk headge ) , ढाक ( पलाश Eng . – Forest flame , L.N.- Butea frondosa koen . Ex . Roxb . ) , आस्फोता ( अपराजिता Eng.- Winged – leaved clitoria . L.N.- Clitoria ternatea Linn . ) , वृक्षक , इन्द्रवृक्ष ( कुटज , Eng.- Kurchi , L.N.- Holarrhena antidysenterica wall ) , आक ( मदार Eng : – Madar . L.N.- Calotropis procera ( AIT ) R.BR. ) , पूतिकरञ्ज ( Eng.- Bonduc- Nut , L.N.- Caesalpinia bonducella fleming ) , नाटा करज ( नक्तमाल , Eng.- Indian beech , L.N.- Pongamia pinnata pierre ) , कनेर ( Eng.- Rooseberry . spurge L.N.- Nerium odorum soland ) , काकजङ्घा ( L.N.- Peristrophe bicaiyculata nees ) चिरचिटा ( अपामार्ग , L.N.- Achyrathus aspera Linn . ) , अग्निमंथ ( अरणी , LN.- Clerodendram phle idis Linn E. ) , अग्नि ( चित्रक , Eng.- Ceylon leadwort , L.N.- Plumbago zeylanica Linm . ) और तिल्वक् ( लोध्र , L.N.- Symplocos racemosa Roxb . ) को गीला ही मूल ( Root ) और शाखा के साथ लाकर टुकड़े – टुकड़े कर लेते हैं ।

चारों कोशातकी ( क्ष्वेड , धामार्गव , पटोली और देवदाली ) , जी के शूक और नाल को वातरहित स्थान में एकत्रित कर इन्हें शिलापृष्ठ पर अलग – अलग रखकर मुष्कक ( मोखा ) के ढेर में चूने का पत्थर डालकर तिल के काण्ड और मूल ( कुतलों ) से जलाते हैं।

• क्षार के दश गुण-

 ( १ ) न तो बहुत तीक्ष्ण होता है , ( २ ) न बहुत मृदु होता है , ( ३ ) श्लक्ष्ण ( चिकना ) होता है , ( ४ ) पिच्छिल ( चिपचिपा ) होता है , ( ५ ) शीघ्रकारी होता है , ( ६ ) सित ( श्वेत ) होता है , ( ७ ) शिखरी ( ऊंचा उठा ) होता है , ( ८ ) सुख से घुलने वाला होता है , ( ९ ) न बहुत क्लेद उत्पन्न करने वाला होता है और ( १० ) न अत्यन्त पीड़ा कारक होता है , क्षार के ये दश गुण होते हैं । क्षार शस्त्र और अग्नि के कार्य को भी करता है ।

चूसने के समान , वेग के साथ शरीर के अंग को दबाता हुआ , सभी जगह फैलता हुआ दोषों को जड़ से उखाड़ देता है । अपना कार्य करके वेदना के शान्त होने पर स्वयं ही शान्त हो जाता है ।

• क्षार प्रयोग-

क्षार से साध्य होने वाले रोगों में- छेदन ( Excision ) , लेखन ( Scraping ) या रक्तस्राव ( Blood – letting ) के बाद शलाका ( Rod ) में वस्त्र ( प्लोत ) लपेटकर क्षार का प्रयोग करते हैं । इस क्षार की सौ मात्रा तक उपेक्षा ( क्षार लगाने के बाद सौ गिनती गिनने तक प्रतीक्षा ) करते हैं । अर्श ( Piles ) रोग में क्षार का प्रयोग करके यंत्र के मुख को हाथ से ढक देते हैं ।

• क्षार प्रयोग के पश्चात्-

क्षार प्रयोग करने के निश्चित समय बाद क्षार को साफ कर ( उस स्थान का ) सम्यक् दग्ध हो जाने पर उस स्थान को अच्छी प्रकार से धोकर वहां घृत और मधु लगाते हैं उसके बाद दुग्ध – मस्तु या कांजी से क्षार दग्ध स्थान को शान्त करते हैं और मधुर ( स्वादु ) तथा शीतल द्रव्यों को घृत में मिलाकर लेप करते हैं ।

अभिष्यन्दी ( स्रोतोवरोधक – उड़द , दही आदि ) कारक भोजन क्लेदन करने के लिये खाने को देते हैं।

• अग्निकर्म क्षार से श्रेष्ठ है-

 अग्नि कर्म क्षार कर्म से श्रेष्ठ होता है क्योंकि अग्नि से दग्ध रोगों का पुन : होना संभव नहीं है और जो रोग औषध , क्षार तथा शस्त्र से ठीक नहीं होते हैं वो अग्नि से अच्छे हो जाते हैं ।

• त्वचादि में अग्निकर्म-

त्वचा , मांस , शिरा ( Veins ) , स्नायु ( Tendons ) , सन्धि ( Joints ) और अस्थि ( Bone ) के रोगों में अग्नि कर्म करते हैं ।

• अग्निदाह के अयोग्य-

जो क्षार कर्म के अयोग्य है , उन्हें अग्निकर्म नहीं करना चाहिये । जिनके व्रणादि के अन्दर शल्य ( Foreign – body ) या रक्त हो , जिनका कोष्ठ फट गया हो या जिस रोगी में बहुत सा व्रण हो उनमें दाहकर्म नहीं करना चाहिये ।

• सम्यक् दग्ध के लक्षण-

सम्यक् दग्ध होने पर रक्त स्राव के रुक जाने के बाद दग्ध स्थान पर लसिका युक्त बुद् – बुद् शब्द होता है या पके तालफल के समान या कबूतर के रंग के समान हो जाता है , आसानी से भर जाता है और इसमें अधिक वेदना नहीं होती है ।

• दुर्दग्ध और अतिदग्ध के लक्षण और भेद-

दुर्दग्ध और अतिदग्ध में प्रमाद से हुये दग्ध के सभी लक्षण होते हैं । प्रमाद दग्ध ( असावधानी से जल जाना ) और तुच्छ दग्ध मिलाकर चार प्रकार का दग्ध होता है , जैसे- तुच्छ दग्ध , ( २ ) दुर्दग्ध , ( ३ ) अतिदग्ध और ( ४ ) सम्यक्दग्ध ।

• तुच्छदग्ध का लक्षण- त्वचा में विवर्णता ( वर्ण का विकृत होना ) और अत्यन्त दाह होता है किन्तु स्फोट ( छाले ) नहीं होते हैं ।

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