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KRIYA KAAL

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क्रिया काल

“संचयं च प्रकोचं च प्रसरं स्थानसंश्रयम् ।
व्यक्तिं भेदं च यो वेत्ति दोषाणां स भवेद्भिषक् ।।”( सु ० सू ० 21/35)

जो चिकित्सक दोषों की ( 1 ) चय , ( 2 ) प्रकोप , ( 3 ) प्रसर , ( 4 ) स्थानसंश्रय , ( 5 ) व्यक्ति तथा ( 6 ) भेद अवस्थाओं को जानता है वही ( सफल ) चिकित्सक है ।

• 1) संचयावस्था- प्रथम क्रियाकाल

वात – पित्त – कफ के अपने – अपने जो स्थान हैं उन स्थानों पर ये दोष संचित हो जाते हैं । इन संचित दोषों के लक्षण हैं-

वात के संचय होने पर स्तब्ध कोष्ठता ( कब्ज ) तथा पूर्ण कोष्ठता ( कोष्ठ में मल भरा हुआ ) होता है ।
पित्त के संचय होने पर पीतावभावसता ( शरीर से पीले वर्ण आभा ) तथा मन्दीष्मता होती है । मन्दोष्मता का अर्थ ऊष्मा का मन्द हो जाना है । परन्तु पित्त संचय होने पर ऊष्मा की वृद्धि होनी चाहिए अतः यहां पर मन्दोष्मता का अर्थ है कि पित्त के संचय पर शरीर के तापमान में मन्द [ थोडी ] वृद्धि होती है । अधिक वृद्धि होना पित्त के प्रकोप का लक्षण होता है ।
कफ के संचय होने पर अंगगौरव , अंगों में भारीपन और आलस्य लक्षण होते हैं ।
संचयकाल , दोषों को पुनः साम्यावस्था में लाने का प्रथम अवसर होता है अतः यह प्रथम क्रिया काल है ।

•2) प्रकोपावस्था द्वितीय क्रियाकाल

संचयावस्था में चिकित्सा नहीं करने से दोष , जो अपने ही स्थानों पर संचित थे , उन्मार्गगामी हो जाते हैं या पर कुपित हो जाते हैं ।संचयावस्था को प्रकोपावस्था में परिवर्तित करने में आहार – विहार तथा काल में अनियमिततायें कारण होती हैं ।

•3) प्रसरावस्था- तृतीयकाल

द्वितीय क्रियाकाल में समुचित चिकित्सा न होने से प्रकुपित दोष शरीर के विमार्गों में गमन कर जाते हैं और जहां पहुंचते हैं वहीं विकार उत्पन्न करते हैं । यह दोषों के विषम होने की तृतीय प्रसरावस्था है ।

जिस प्रकार किण्व ( yeast ) , जल तथा पिष्टी को मिलाकर कुछ काल रखने से उनमें उफान ( किण्वीकरण- fermentation ) पैदा होता है और वह बर्तन के चारों ओर से बाहर निकलने लगता है , उसी प्रकार प्रकोपजन्य कारणों से प्रकुपित दोष उचित चिकित्सा के अभाव में प्रसरता को प्राप्त कर जाते हैं।

•4 ) स्थानसंश्रयावस्था – चतुर्थ क्रियाकाल

उपचार के अभाव में प्रकुपित दोष प्रसरण के पश्चात् जिस स्थान पर स्थित हो जाते हैं वहां पर विकृतियों ( pathological changes ) का होना प्रारम्भ हो जाता और भविष्य में होने वाली व्याधि के पूर्व रूप ( व्याधिसूचक लक्षण ) प्रकट हो जाते है ।
इस अवस्था को स्थानसंश्रय कहा गया है ।

•5 ) व्यक्तावस्था पंचम क्रियाकाल

स्थान संश्रय अवस्था में व्याधियों के पूर्वरूप प्रकट होते हैं उस समय भी चिकित्सा का अवसर प्राप्त होता है । यदि इस पूर्वरूप के लक्षण प्रकट होते ही इनका शमन नहीं किया जाता है तो रोग अपने रूप में प्रकट हो जाते हैं । यह पांचवीं रोग अवस्था व्यक्तावस्था कहलाती है ।

• 6 ) भेदावस्था – षष्ठ क्रियाकाल

व्याधियों के स्पष्ट रूप में प्रकट हो जाने पर भी चिकित्सा के अभाव में अन्य उपद्रव ( complications ) उत्पन्न हो जाते हैं और व्याधि चिरकारिता ( chronic ) की ओर अग्रसर हो जाती है । यह चिकित्सा का अन्तिम अवसर होता है इस समय की चिकित्सा के अभाव में व्याधि असाध्य हो जाती है ।

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