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KARMA PART-2

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कर्म Part -2

•सर्वदैहिक ही कर्मो का वर्गीकरण
शरीर के इन संस्थानों के अनुसार कर्मों को वर्गीकृत किया जाता है , यथा
( 1 ) नाड़ी संस्थानगत कर्म
( 2 ) ज्ञानेन्द्रियों के कर्म
( 3 ) श्वसन संस्थानगत कर्म
( 4 ) रक्तवह संस्थानगत कर्म
( 5 ) रसवह संस्थानगत कर्म


( 6 ) पाचन संस्थानगत कर्म-
( i ) मुख – तालु गत कम
( ii ) आमाशयगत कर्म
( ii ) आन्त्रगत कर्म


( 7 ) यकृत – पित्ताशय एवं प्लीहागत कर्म

( 8 ) प्रजनन संस्थानगत कर्म –
( i) पुरूष प्रजनन संस्थानगत कर्म
( ii ) स्त्री प्रजनन संस्थानगत कर्म


( 9 ) मूत्रवह संस्थानगत कर्म
( 10 ) धातुगत कर्म
( 11 ) सर्वधातुगत कर्म
( 12 ) दोष कर्म
( 13 ) ताप / ज्वर सम्बन्धित कर्म

( 1 ) नाड़ी संस्थानगत कर्म – मेध्य , निद्राजनन , निद्राशमन , आक्षेपजनन , आक्षेपशमन , मदकारी , उत्तेजक , संज्ञास्थापन , वेदनास्थापन , मूच्छानाशन आदि ।

( 2 ) ज्ञानेन्द्रियों के कर्म –
( i ) नेत्र – चक्षुष्य , तारकाविकासी , तारकासंकोचन , नेत्रप्रसादन , नेत्रस्त्रावण आदि ।
( ii ) कर्ण – कर्ण्य आदि ।
( iii ) प्राण – शिरोविरेचन आदि ।
( iv ) जिह्वा- रस्य , लालास्त्रावजनन , स्वरभेद नाशन ।
( v ) त्वचा – त्वच्य , स्वेदोपग , स्वेदजनन , स्वेदोपनयन , शीतोपनयन , केशवर्धन , केशरञ्जन , रोमसंजनन आदि ।

( 3 ) श्वसन संस्थानगत कर्म – श्वासहर , कासहर , क्षयनाशन , क्षतक्षीण नाशन , श्वसनकज्वर नाशन , हिक्कानिग्रहण , कफघ्न , छेदन , श्लेष्मपूतिहर , श्वसनकेन्द्रोत्तेजन , सनकेन्द्र अवसादन , श्वसनोजन , कफ निसारण , कण्ठ्य आदि ।

( 4 ) रक्तवह संस्थानगत कर्म – हय , रकाभारवर्धन , रक्तभारशमन , हदयोन्जन , हृदयावसादन , रकास्तम्भन , रक्तस्त्रावण , रतोत्क्लेशजनन , रतोत्क्लेशनाशन , रकावर्धन , रक्तपित्त नाशन , रक्तप्रदर नाशन आदि।

( 5 ) रसवह संस्थानगत कर्म – शोथजनन , शोधनाशन , श्लीपद नाशन , गण्डमाला नाशन , जलोदर नाशन आदि ।

( 6 ) पाचन संस्थानगत कर्म
•मुख- तालुगत कर्म-
मुख वैशयकर , मुखदुर्गन्ध नाशन , दन्तशोधन , दन्तायकर , मुखपाक नाशन , लाला प्रसेकजनन , लाला प्रसेकशमन , तालुशोषहर , तृष्णा निग्रहण आदि ।


•आमाशयगत कर्म –
दाहजनन ( विदाही ) , दाहशमन , अग्निदीपन , अग्निमादन , पाचन , तृप्तिजनन , तृप्तिघ्न , रोचन , आमाशयशूल नाशन , छर्दि निग्रहण , वमन , वमनोपग , विष्टम्भी आदि ।
•आन्त्रगत कर्म – मल विरेचन , पित्त विरेचन , स्वंसन , अनुलोमन , भेदन , विरेचनोपग , अनुवासन , अनुवासनोपग , आस्थापन , आस्थापनोपग , वातानुलोमन , आटोपहर , आध्मानहर , अम्लपित्त नाशन , मल स्तम्भन , पुरीषजनन , पुरोष विरजनीय , कृमिघ्न , कृमि – नि : सारक , अर्मोन आदि ।

( 7 ) यकृत् पित्ताशयगत एवं प्लीहागत कर्म –
यकृत् उत्तेजन , यकृत् शोधनाशन , पित्तसारक , पित्तविरेचन , पित्ताशयाश्मरी भेदन , प्लीहावृद्धि नाशन आदि ।

( 8 ) प्रजनन संस्थानगत कर्म
( क ) पुरुष प्रजनन संस्थानगत कर्म वाजीकरण , शुक्रल , शुक्रजनन , शुक्ररेचन , शुक्रस्तम्भन , शुक्राश्मरी नाशन , शुक्रशोधन , कामोत्तेजन , कामावसादन आदि ।
( ख ) स्त्री प्रजनन संस्थानगत कर्म- गर्भ निरोधक , आर्तवजनन , आर्तवशमन , आर्तवशोधन , गर्भाशय संकोचन , गर्भाशय शामक , गर्भाशय शोधन , योनि शोधन , योनि संकोचन , योनि स्त्रावहरण , योनि बावजनन , श्वेतप्रदर नाशन , रक्तप्रदर नाशन , गर्भस्थापन , गर्भस्त्रावहर , गर्भस्त्रावकर , गर्भवृद्धिकर , स्तन्यजनन , स्तन्यशमन , स्तन्यशोधन , स्तनशोथहर आदि ।

( 9 ) मूत्रवह संस्थानगत कर्म – मूत्रजनन , मूत्र विरेचनीय , मूत्र विरजनीय , मूत्र संग्रहण , अश्मरीभेदन आदि ।

( 10 ) धातुगत कर्म
( i ) रस धातु – रसवर्धन , रसक्षपण आदि ।
( ii ) रक्त धातु – रक्तशोधन , रक्तदूषण , रक्तप्रसादन , रक्तवर्धन , रक्तक्षपण आदि ।
( iii ) मांस एवं मेद धातु – बृहण , लेखन , स्थौल्यजनन , स्थौल्यनाशन , मेदवर्धन , मेदनाशन , व्रणशोधन , यणरोपण आदि ।
( iv ) अस्थि एवं मज्जा धातु – अस्थिवर्धन , मन्नावर्धन , अस्थिसंघातकर , अस्थि संधानकर आदि ।
( v ) शुक्र धातु – शुक्रवर्धन , शुक्रनाशन आदि ।
( vi ) ओज – ओजवर्धन , ओजासकर आदि ।

( 11 ) सर्वधातुगत कर्म – रसायन , बल्य , वयःस्थापन , ओजवर्धन , जीवनीय , विषघ्न आदि । आदि ।

( 12 ) ताप / ज्वर सम्बन्धित कर्म – सन्तापहर , दाहप्रशमन , शीतोपनयन , विषमज्वरघ्न , आमपाचन , आदि

( 13 ) सर्वदेहगत अन्य कर्म – व्यवायी , विकासी , प्रमाथी , अभिष्यन्दी , आशुकारी , रक्षोन , पृतिनाशन , शूल प्रशमन , अंगमर्दप्रशमन , श्रमहर , सन्धानोय , संशोधन , संशमन आदि ।

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