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KARMA PART -1

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कर्म

•कर्म शब्द की व्युत्पत्ति –
कर्म शब्द ‘ कृ ‘ धातु से ‘ मनिन् ‘ प्रत्यय करने से बनता है जिसका अर्थ ‘ क्रिया ‘ हैं।

निरूक्ति – क्रियते इति कर्म । अर्थात् जो किया जाता है वह कर्म कहलाता है । यहाँ यह शब्द क्रिया का बोधक है न कि कारक का ।

•लक्षण

चरकानुसार
( क ) “संयोगे च विभागे च कारणं द्रव्यमाश्रितम् । कर्तव्यस्य क्रिया कर्म कर्मनान्यदपेक्षते ।।” ( च ० सू ० अ ०1 / 52 )

जो पदार्थ द्रव्याश्रित हो , गुण से रहित हो , संयोग और विभाग को उत्पन्न करने में उत्तरभावी हो , किसी भाव पदार्थ की अपेक्षा न करता हुआ कारण हो अर्थात् संयोग और विभाग उत्पन्न करने में अनपेक्ष ( स्वतन्त्र ) कारण हो उसे ‘ कर्म ‘ कहते हैं।

•कर्म के भेद

कर्म को हम निम्नलिखित आधार पर वर्गीकृत कर सकते हैं
( क ) अधिष्ठान ( शरीर में ) की दृष्टि से ।
( ख ) बाह्य एवं आभ्यन्तर भेद से ।
( ग ) प्राधान्य की दृष्टि से ।
( घ ) चिकित्सा की दृष्टि से ।
( ड ) पञ्चकर्म की दृष्टि से ।
( च ) वैशेषिक दर्शन अनुसार या लौकिक दृष्टि से ।
( छ ) द्रव्यगुण शास्त्र की दृष्टि से ।

( क ) अधिष्ठान भेद से – अधिष्ठान भेद से द्रव्यों के कर्म तीन प्रकार के होते हैं
( i ) स्थानिक कर्म ( Local action ) – जैसे – व्रणशोधन , चक्षुष्य , व्रणरोपण ।
( ii ) सार्वदैहिक कर्म ( Systemic action ) – जैसे -रसायन , वाजीकरण , रक्तभार वर्धन , रक्तभार शमन ।
( iii ) विशिष्ट कर्म ( Specific action )- सभी प्रभावजन्य कर्म ।
( ख ) बाह्य एवं आभ्यन्तर भेद से-
इस दृष्टि से कर्म के दो भेद हैं-
( i ) अन्त : परिमार्जन
( ii ) बहि : परिमार्जन ।

( ग ) प्राधान्य की दृष्टि से –
प्राधान्य की दृष्टि से कर्म के दो भेद होते हैं
( i ) प्रधान या मुख्य कर्म ( Direct action ) – किसी चिकित्सा कर्म के द्वारा या द्रव्य सेवन से शरीर के किसी विशेष संस्थान / अंग / प्रत्यंग पर जो विशिष्ट क्रिया होती है उसे प्रधान कर्म कहते हैं , यथा विकासी द्रव्य सेवन से ओज विश्लेषण , कटु रस से रसनोद्वेक ।
( ii ) अप्रधान या गौण कर्म ( Indirect action ) प्रधान कर्म हेतु किए गये द्रव्य सेवन से प्रतिक्रिया स्वरूप शरीर के किसी अन्य संस्थान / अंग / प्रत्यंग पर होने वाली क्रिया को गौण कर्म कहते हैं , यथा कटु रस से नेत्र , मुखादि से स्त्राव होना ; विकासी द्रव्य सेवन से स्नायु बन्धन शिथिल होना आदि ।
( घ ) चिकित्सा शास्त्र की दृष्टि से –
इस दृष्टिकोण से कर्म तीन प्रकार का बताया गया है-
( i ) संशमन
( ii ) संशोधन
( iii ) शस्त्र प्रणिधान ।

( i ) संशमन – इसे अन्तःपरिमार्जन भी कहते हैं । इसके अन्तर्गत आहार और औषध द्रव्यों की योजना एवं पथ्य आहार विहार का प्रयोग करके रोगों की चिकित्सा की जाती है ।
( ii ) संशोधन – इसके अन्तर्गत अन्त : परिमार्जन और बहि : परिमार्जन दोनों ही आते हैं । इसके अन्तर्गत शरीर में प्रवृद्ध दोषों को उनके स्थान के समीपस्थ छिद्र के रास्ते शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है । आयुर्वेद में वर्णित पञ्चकर्म संशोधन चिकित्सा के अन्तर्गत ही आते हैं । ये पांच कर्म निम्नलिखित हैं ( 1 ) वमन ( 2 ) विरेचन ( 3 ) निरूहण ( 4 ) अनुवासन ( 5 ) शिरोविरेचन ।

( iii ) शस्त्र प्रणिधान – इसके अन्तर्गत शरीर से शल्यापहरण एवं व्रणादि की चिकित्सा आती है । शल्यतन्त्र में इसके अन्तर्गत 8 प्रकार के शस्त्र कर्म और 24 प्रकार के यन्त्र कर्म बताए गए हैं ।

( च ) पञ्चकर्म की दृष्टि से –
इस दृष्टिकोण से कर्म के पांच भेद होते हैं
( i ) वमन
( ii ) विरेचन
( iii ) निरूहण
( iv ) अनुवासन
( v ) शिरोविरेचन
लेकिन धन्वन्तरि सम्प्रदाय के आचार्य निरूहण और अनुवासन कर्म को एक ही कर्म ( बस्ति कर्म ) के अन्तर्गत लेते हैं तथा पांचवां कर्म ‘ रक्त मोक्षण ‘ मानते हैं ।

( छ ) वैशेषिक दर्शन के अनुसार या लौकिक दृष्टि से –
वैशेषिक दर्शन में कर्म के पांच प्रकार बताए गए हैं
( i ) उत्क्षेपण अर्थात् ऊर्ध्वगति ( Upward movement )( ii ) अपक्षेपण अर्थात् अधोगति ( Downward movement )
( iii ) आकुञ्चन अर्थात् सिकुड़ना ( Contraction )
( iv ) प्रसारण अर्थात् फैलना ( Expansion )
( v ) गमन ( Forward or backward movement )

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