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KARM VIGYANIYA

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कर्म – विज्ञानीय

निरुक्ति – ‘ क्रियते इति कर्म ‘ अर्थात् जो किया जाये वह ‘ कर्म ‘ है । ‘ क्रि विक्षेपे ‘ धुत में ‘ मनिन् ‘ प्रत्यय लगाने से ‘ कर्मन् ‘ शब्द बनता है , जिससे प्रथम वचन का रूप ‘ कर्म ‘ होता है । इसका अर्थ है ‘ क्रिया ‘ या ‘ गति ‘ ।

कर्म के लक्षण –
आचार्य चरक के मतानुसार जो संयोग और विभाग ( अलग होना ) में स्वतंत्र रूप से कारण हो और द्रव्य में आश्रित हो उसे ही ‘ कर्म ‘ कहते हैं । सृष्टि में सभी परिवर्तन या कर्म संयोग ( Addition ) और विभाग ( Separation ) के द्वारा ही होते हैं । ठीक इसी प्रकार प्रत्येक जीव में भी संयोग और विभाग की क्रिया अनवरत । ( Continuous ) चलती रहती है और शरीर के क्रिया कलाप चला करते हैं ।

कर्म का स्वरूप –
वैशेषिक दर्शन के अनुसार कर्म वह है जो एक द्रव्य में आश्रित हो , गुण से रहित हो और संयोग – विभाग के उत्पन्न करने में अपने से उत्तरभावी किसी भावपदार्थ की अपेक्षा न करता हुआ कारण हो उसे कर्म कहते हैं ।
कहने का तात्पर्य यह है कि –
१ . एक द्रव्य – अर्थात् जब कोई भी क्रिया होती है तब उसका आश्रय – द्रव्य केवल एक होता है । एक क्रिया उसी काल में अनेक द्रव्यों में नहीं हो सकती है , जैसे – संयोग – विभाग आदि । वह जिसका कर्म होगा उसी में पाया जायेगा । अत : कर्म एक द्रव्य के आश्रित ही होता है ।

•कर्म के भेद
कर्म दो प्रकार के होते हैं -१ . लौकिक और २. आध्यात्मिक

१. लौकिक कर्म – द्रव्याश्रित कम संयोग – विभाग में अनपेक्ष ( Neglected ) कारण होता है , जैसे—
( क ) उत्क्षेपण ( उपर फेंकना ) ,
( ख ) अपक्षेपण ( नीचे की ओर फेंकना) ,
( ग ) आकुंचन ( सिकुड़ना ) ,
( घ ) प्रसारण ( फैलना ) और
( ङ ) गमन ( गति करना ) ।

क . उत्क्षेपण ( Going Upward ) – इसका अर्थ है – उपर उठना या उपर जाना ।

ख . अपक्षेपण ( Going downward ) – अपक्षेपण का अर्थ है – नीचे की ओर जाना या नीचे गति करना । उत्क्षेपण के विपरीत गति को अपक्षेपण कहते हैं ।

ग . आकुञ्चन ( Contraction ) – इसका अर्थ है – सिकुड़ना या संकुचित होना ।

घ. प्रसारण ( Expansion ) – इसका अर्थ होता है – फैलाना ।
ङ . गमन ( Locomotion ) – इसका सामान्य अर्थ है – चलना । जिसके संयोग विभाग के कारण कर्म की दिशा तथा प्रदेश अनियत ( Indefinite ) हो उसे गमन कहते है । गमन कर्म के अन्तर्गत – भ्रमण , रेचन , स्पन्दन , उर्ध्वज्वलन तथा तिर्यग्गमन आदि सभी कर्म आ जाते है ।

२. आध्यात्मिक कर्म ( Spiritual ) – स्वस्थ्यवृत आदि से सम्बन्धित मंगल कर्म जो स्वस्थ और आतुर ( रोगी ) के लिये किया जाता है , उसे आध्यात्मिक कर्म कहते हैं ।

आचार्य चरक ने ‘ कर्म ‘ से पंचकर्म लिया है – जिसमें १. वमन ( Emesis ) , २. विरेचन ( Purgation ) , ३. शिरोविरेचन ( Nasal medication ) , ४. निरूह वस्ति ( Decoc tion enema ) और ५. अनुवासन ( स्नेहन- Oily enema ) वस्ति की गणना की गयी है ।

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