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KARMA PART -3

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कर्म

  1. स्तम्भन
"रौक्ष्यात् शैत्यात् कषायत्वात् लधुपाकात् च भवेत् । वातकृत् स्तम्भनं तत् स्याद् यथा वत्सक टुण्टुकौ "।। ( शा ० पू ० ख ० अ ०4 / 13 )

• जो द्रव्य रूक्ष – शीत गुण , कषाय रस युक्त और लघुपाकी ( शीघ्रपाकी ) होने के कारण वातकारक होते हैं उन्हें स्तम्भन कहते हैं , यथा – कुटज ( छाल ) , सोनापाठा ।

• पर्याय – पक्व ग्राही , संग्राहिक ( सुश्रुत एवं नागार्जुन ) ।
• स्तम्भक द्रव्यों के गुण – आचार्य चरक ने स्तम्भन द्रव्यों को प्रायः शीत , मन्द , मृदु , श्लक्ष्ण , रूक्ष , द्रव , स्थिर , लघु गुणों से युक्त हा है ।
• शार्ङ्गधर ने स्तम्भन द्रव्यों के गुण एवं दोषकर्म इस प्रकार बताये हैं – रस – कषाय , विपाक – कटु वीर्य – शीत, गुण – रूक्ष ,
• दोषकर्म – वातकारक ।

•भौतिक संघटन – सुश्रुत ने स्तम्भक द्रव्यों में वायु महाभूत जबकि नागार्जुन ने वायु और पृथ्वी महाभूत की प्रधानता कही है ।

•स्तम्भक द्रव्यों का कार्मुकत्व – वायु ( अथवा वायु + पृथ्वी ) महाभूत की प्रधानता के कारण स्तम्भक द्रव्य रूक्ष गुण युक्त होते हैं । रूक्षता के कारण ये द्रव्य शरीर में विद्यमान द्रव रूप दोष – धातु एवं मलों के द्रवांश का शोषण करके इनकी प्रवृत्ति को रोकते हैं ।

• उदाहरण – कुटज , सोनापाठा , लोध्रादिगण ( सुश्रुत ) आदि ।

•युनानी संज्ञा – हाबिस ।

  1. मदकारी
'"बुद्धिं लुम्पति यद् द्रव्यं मदकारि तदुच्यते । तमोगुण प्रधानं च यथा मद्यसुराऽऽदिकं"
।। ( शा ० सं ० पू ० ख ० अ ० 4/22 )

• जो द्रव्य तमगुण प्रधान होने के कारण बुद्धि ( कर्तव्य – अकर्तव्य का ज्ञान ) का नाश करके मद ( नशा ) उत्पन्न करे उसे ‘ मदकारी ‘ कहते हैं , जैसे – मद्य और नाना प्रकार के सुरा ।

• पर्याय – मदकारी , मदकृत , मादक , मादन , मदनीय , मद्य आदि ।

• मादक द्रव्यों के गुण – नागार्जुन ने मादक द्रव्यों के गुण इस प्रकार बताये हैं
• रस – सर्वरस ,विपाक – कटु, वीर्य – उष्ण, गुण – तीक्ष्ण , रूक्ष , लघु , विशद ।

• भौतिक संघटन- नागार्जुन के अनुसार मदकारी द्रव्यों में अग्नि और वायु महाभूत की प्रधानता होती है ।

•उदाहरण – भांग , अहिफेन , मद्य , विभिन्न सुरा आदि ।

  1. प्रमाथि
" निजवीर्येण यद् द्रव्यं स्त्रोतोभ्यो दोषसंचयम् । निरस्यति प्रमाथि स्यात् तद्यथा मरिचं वचा" ।।
( शा ० पू ० ख ० अ ० 4/24 )

• जो द्रव्य अपनी शक्ति से स्त्रोतों ( दोष – धातु – मलों का वहन करने वाले मार्गों ) से दोषों के संचय को दूर करे , उसे ‘ प्रमाथि ‘ कहते हैं ।

• प्रमाथि द्रव्यों के गुण एवं दोषकर्म-
• रस – कटु, विपाक- कटु ,वीर्य – उष्ण ,गुण – लघु , सूक्ष्म , तीक्ष्ण ।
• दोषकर्म – कफशामक

• भौतिक संघटन – प्रमाथि द्रव्यों में वायु और अग्नि महाभूत की प्रधानता होती है ।

• प्रमाथि द्रव्यों का कार्मुकत्व – प्रमाथि द्रव्यों में वायु और अग्नि महाभूत की प्रधानता के कारण ये लघु , सूक्ष्म और तीक्ष्ण गुण युक्त होते हैं । लघु और सूक्ष्म गुण के कारण ये द्रव्य शीघ्रता से देह के सूक्ष्म स्त्रोतों भी प्रवेश कर जाते हैं । तीक्ष्ण गुण के कारण स्त्रोतों में क्षोभ उत्पन्न करके वहाँ संचित दोष एवं मलों को बाहर निकाल देते हैं ।

• उदाहरण – मरिच , वचा , पिप्पली आदि ।

• आमयिक प्रयोग – संगात्मक स्त्रोतोदुष्टि जन्य व्याधियों में ।

• युनानी संज्ञा – मुफ़तिह ।

  1. व्यवायी

• परिभाषा

  • “पूर्व व्याप्य अखिलं कायं ततः पाकं च गच्छति । व्यवायि तद्यथा भंगा फेनं चाहिसमुद्भवम् ।।” ( शा ० पू ० स ० अ ० 4/20 )
    ये दोनों ही परिभाषाएं एक ही अर्थ का बोध कराती हैं- जो द्रव्य ( सेवन के उपरान्त ) अपक्व अवस्था में अर्थात् जठराग्नि के द्वारा परिपक्व होने के पूर्व ही अपने प्रभाव से सारे शरीर में व्याप्त हो जाए और उसके बाद उसका पाक होकर देह में उसके गुण कर्म दिखाई दे उस द्रव्य को ‘ व्यवायी ‘ कहते हैं ।
  • व्यवायी द्रव्यों के गुण व दोषकर्म
    रस- प्रायः तिक्त प्रधान ( वायु और आकाश महाभूत की प्रधानता के कारण )
    विपाक- कटु
    वीर्य – शीत
    गुण- लघु , सूक्ष्म
    दोषकर्म -कफवातशामक
    भौतिक संघटन- ये द्रव्य वायु और आकाश महाभूत गुणभूयिष्ठ होते हैं । उदाहरण – भांग , अहिफेन आदि ।
  1. विकासी

परिभाषा


" संधिवास्तु शिथिलान् यत् करोति विकासि तत् । विश्लेष्योजक धातुभ्यो यथा क्रमुककोदवाः ।।" ( शा ० पू ० स ० अ ० 4/21 )

जो द्रव्य सारे शरीर में व्यास होकर रहने वाले ओज को सुखाकर , शरीर में रस से लेकर वीर्य पर्यन्त धातुओं को अलग करके सन्धिबन्धनों को दौला करता है उसे ‘ विकासो ‘ कहते हैं , यथा- सुपारी , कोदो आदि ।

•विकासी द्रव्यों के गुण एवं दोषकर्म –
प्रायः कषाय रस प्रधान
विपाक कटु
वीर्य – शीत
गुण- लघु , रूक्ष , सूक्ष्म
दोषकर्म – वातकारक , कफशामक ।
भौतिक संघटन – विकासी द्रव्य वायु महाभूत गुणभूयिष्ठ होते हैं ।

  1. रसायन ( Rejuvinators )

परिभाषा
-“लाभोपायो हि शस्तानां रसादीनां रसायनम् ।” ( च ० चि ० अ ०1 / 8 )
शरीर में प्रशस्त रस – रक्तादि धातुओं की उपलब्धि जिस उपाय या साधन से हो , उसे रसायन कहते हैं ।

-रसायन सेवन के लाभ-
आचार्य चरक ने चिकित्सा स्थान के प्रथम अध्याय में रसायन सेवन के लाभ बताते हुए कहा है कि इनके सेवन से पुरूष दीर्घ आयु , तीव्र स्मरणशक्ति , उत्तम धारणशक्ति , आरोग्य , तरूणावस्था , उत्कृष्ट प्रभा , उत्तम सुन्दर स्वर , उच्चकोटि का शारीरिक तथा इन्द्रियबल , वाक्सिद्धि ( जो कह दे वह फलीभूत हो जाये ) , लोकवन्द्यता और कान्ति को प्राप्त करता है ।
भौतिक संघटन – आचार्य विश्वनाथ द्विवेदी जी ने रसायन द्रव्यों में पृथ्वी और जल महाभूत का प्राधान्य कहा है।

उदाहरण -अमृता गूगल हरीतकी रुदंती आदि।

  1. वाजीकरण ( Aphrodisiac )

” यस्माद् द्रव्याद् भवेत् स्त्रीषु हर्षो वाजीकरं च तत् ।।” ( शा ० सं ० पू ० अ ० 4/75 )

जिस द्रव्य के सेवन से पुरूष में स्त्री के साथ संसर्ग करने की शक्ति तथा उत्साह बढ़े उसे वाजीकरण कहते हैं ।

उदाहरण – शतावरी मूसली विदारीकंद कुचला जायफल अफीम कस्तूरी आदि।

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